पातञ्जल योगदर्शन (भाष्य सहित)
Patanjali Yoga Darshan
महर्षि पतञ्जलि / हरिकृष्णदास गोयन्दका द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसमाधिपाद-१ · ३१
क्रमसे संप्रज्ञात और निर्बीज समाधि सिद्ध होती है, उसका वर्णन आरम्भ करते हैं—
क्षीणवृत्तेरभिजातस्येव मणेर्ग्रहीतृग्रहणग्राह्येषु तत्स्थतदञ्जनतासमापत्तिः ॥४१॥
'जिसकी समस्त बाह्य वृत्तियाँ क्षीण हो चुकी हैं, ऐसे स्फटिकमणिकी भाँति निर्मल चित्तका जो ग्रहीता (पुरुष), ग्रहण (अन्तःकरण और इन्द्रियाँ) और ग्राह्य (पञ्चभूत और विषयों) में स्थित हो जाना और तदाकार हो जाना है, यही संप्रज्ञात समाधि है।'
व्याख्या—पूर्वोक्त अभ्यास करते-करते जब साधकका चित्त स्वच्छ स्फटिकमणिकी भाँति अति निर्मल हो जाता है, जब उसकी ध्येयसे अतिरिक्त बाह्य वृत्तियाँ शान्त हो जाती हैं, उस समय साधक इन्द्रियोंके स्थूल या सूक्ष्म विषयोंको (योग० ३ । ४४) या अन्तःकरण और इन्द्रियोंको (योग० ३ । ४७) अथवा बुद्धिस्थ पुरुषको (योग० ३ । ४९)—जिस किसी भी ध्येयको लक्ष्य बनाकर उसमें अपने चित्तको लगाता है तो वह चित्त उस ध्येय वस्तुमें स्थित होकर तदाकार हो जाता है। इसीको संप्रज्ञात समाधि कहते हैं; क्योंकि इस समाधिमें साधकको ध्येय वस्तुके स्वरूपका भली प्रकार ज्ञान हो जाता है, उसके विषयमें किसी प्रकारका संशय या भ्रम नहीं रहता।*
* इसी समाधिका वर्णन पहले सतरहवें सूत्रमें भी आया है, वहाँ वितर्क, विचार, आनन्द और अस्मिता—इन चारोंके सम्बन्धसे होनेवाले योगको संप्रज्ञात बतलाया है।