पातञ्जल योगदर्शन (भाष्य सहित)
Patanjali Yoga Darshan
महर्षि पतञ्जलि / हरिकृष्णदास गोयन्दका द्वारा
पृष्ठ 46, कुल 184 में से
संदर्भ में पढ़ें| ३० | पातञ्जलयोगदर्शन |
|---|
यथाभिमतध्यानाद्वा ॥ ३९ ॥
'जिसको जो अभिमत हो, उसके ध्यानसे भी मन स्थिर हो जाता है।'
व्याख्या—उपर्युक्त साधनोंमेंसे कोई साधन किसी साधकके अनुकूल नहीं पड़ता हो तो उसे अपनी रुचिके अनुसार अपने इष्टका ध्यान करना चाहिये। अपनी रुचिके अनुसार अपने इष्टका ध्यान करनेसे भी मन स्थिर हो जाता है ॥ ३९॥
सम्बन्ध—चित्तकी स्थिरताके उपाय बतलाकर अब यह बतलाते हैं कि चित्तमें जब स्थिर होनेकी योग्यता परिपक्व हो जाती है, तब उसकी कैसी स्थिति होती है—
परमाणुपरममहत्त्वान्तोऽस्य वशीकारः ॥ ४० ॥
'(उस समय) इसका परमाणुसे लेकर परम महत्त्वतक वशीकार हो जाता है।'
व्याख्या—अभ्यास करते-करते जब साधकका चित्त भलीभाँति स्थितिकी योग्यता प्राप्त कर लेता है, उस समय साधक अपने चित्तको सूक्ष्म-से-सूक्ष्म पदार्थसे लेकर बड़े-से-बड़े महान् पदार्थतक चाहे जहाँ, चाहे जब तत्काल स्थिर कर सकता है। उसका अपने चित्तपर पूर्ण अधिकार हो जाता है। चित्तमें स्थिर होनेकी योग्यता परिपक्व हो जानेकी पहचान भी यही है ॥४०॥
सम्बन्ध—पहले बतलाये हुए उपायोंसे जब साधकका अपने चित्तपर अधिकार हो जाता है और चित्त अत्यन्त निर्मल होकर उसमें समाधिकी योग्यता आ जाती है, उसके बाद किस प्रकार