पातञ्जल योगदर्शन (भाष्य सहित)
Patanjali Yoga Darshan
महर्षि पतञ्जलि / हरिकृष्णदास गोयन्दका द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसमाधिपाद-१ २९
**व्याख्या—**जिन पुरुषोंके राग-द्वेष सर्वथा नष्ट हो चुके हैं, ऐसे विरक्त पुरुषोंको ध्येय बनाकर अभ्यास करनेवाला चित्त भी स्थिर हो जाता है ॥३७॥
**सम्बन्ध—**और भी अन्य उपाय बतलाते हैं—
स्वप्ननिद्राज्ञानालम्बनं वा ॥३८॥
'स्वप्न और निद्राके ज्ञानका अवलम्बन करनेवाला चित्त भी स्थिर हो सकता है।'
**व्याख्या—**स्वप्नमें कोई अलौकिक अनुभव हुआ हो, जैसे अपने इष्टदेवका दर्शन आदि, तो उसको स्मरण करके वैसा ही अभ्यास करनेसे मन स्थिर हो जाता है तथा गाढ़ निद्रामें केवल चित्तकी वृत्तियोंके अभावका ही ज्ञान रहता है, किसी भी पदार्थकी प्रतीति नहीं होती, उसी प्रकार समस्त वृत्तियोंका बाध करके वृत्तियोंके अभावके ज्ञानका अवलम्बन करनेसे अर्थात् उसीको लक्ष्य बनाकर अभ्यास करनेसे भी अनायास ही चित्त स्थिर हो सकता है। जिस कालमें तमोगुणका आविर्भाव होता हो, उस समय यह अभ्यास नहीं करना चाहिये। जिस समय चित्त और इन्द्रियोंमें सत्त्वगुण बढ़ा हुआ हो, उस समय यह साधन अधिक लाभप्रद हो सकता है ॥३८॥
**सम्बन्ध—**मनुष्योंकी रुचि भिन्न-भिन्न होती है; अतः अब सर्वसाधारणके उपयोगी साधनका वर्णन करते हुए इस प्रकरणका उपसंहार करते हैं—