भारतकोश
पातञ्जल योगदर्शन (भाष्य सहित)

पातञ्जल योगदर्शन (भाष्य सहित)

Patanjali Yoga Darshan

महर्षि पतञ्जलि / हरिकृष्णदास गोयन्दका द्वारा

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२८ पातञ्जलयोगदर्शन

विषयवती वा प्रवृत्तिरुत्पन्ना मनसः स्थितिनिबन्धनी ॥ ३५॥

'विषयवाली प्रवृत्ति उत्पन्न होकर वह भी मनकी स्थितिको बाँधनेवाली हो जाती है।'

व्याख्या—अभ्यास करते-करते साधकको दिव्य विषयोंका साक्षात् हो जाता है, उन दिव्य विषयोंका अनुभव करनेवाली वृत्तिका नाम विषयवती प्रवृत्ति है। ऐसी प्रवृत्ति उत्पन्न होनेसे साधकका योगमार्गमें विश्वास और उत्साह बढ़ जाता है; इस कारण यह आत्मचिन्तनके अभ्यासमें भी मनको स्थिर करनेमें हेतु बन जाती है ॥३५॥

सम्बन्ध—इसी प्रकारका और भी हेतु बतलाते हैं—

विशोका वा ज्योतिष्मती ॥ ३६॥

'इसके सिवा (यदि) शोकरहित ज्योतिष्मती प्रवृत्ति (उत्पन्न हो जाय तो वह) भी मनकी स्थिति करनेवाली होती है।'

व्याख्या—अभ्यास करते-करते साधकको यदि शोकरहित प्रकाशमय प्रवृत्तिका अनुभव हो जाय तो वह भी मनको स्थिर करनेवाली होती है ॥३६॥

सम्बन्ध—अब चित्तकी स्थिरताका अन्य उपाय बतलाते हैं—

वीतरागविषयं वा चित्तम् ॥ ३७॥

'वीतरागको विषय करनेवाला चित्त भी (स्थिर हो जाता है)।'