पातञ्जल योगदर्शन (भाष्य सहित)
Patanjali Yoga Darshan
महर्षि पतञ्जलि / हरिकृष्णदास गोयन्दका द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसमाधिपाद-१ २७
मैत्रीकरुणामुदितोपेक्षाणां सुखदुःखपुण्यापुण्य-
विषयाणां भावनातश्चित्तप्रसादनम् ॥३३॥
'सुखी, दुःखी, पुण्यात्मा और पापात्मा—ये चारों जिनके क्रमसे विषय हैं, ऐसी मित्रता, दया, प्रसन्नता और उपेक्षाकी भावनासे चित्त स्वच्छ हो जाता है।'
व्याख्या—सुखी मनुष्योंमें मित्रताकी भावना करनेसे, दुखी मनुष्योंमें दयाकी भावना करनेसे, पुण्यात्मा पुरुषोंमें प्रसन्नताकी भावना करनेसे और पापियोंमें उपेक्षाकी भावना करनेसे चित्तके द्वेष, घृणा, ईर्ष्या और क्रोध आदि मलोंका नाश होकर चित्त शुद्ध—निर्मल हो जाता है। अतः साधकको इसका अभ्यास करना चाहिये ॥३३॥
सम्बन्ध—चित्तशुद्धिका दूसरा उपाय बतलाते हैं—
प्रच्छर्दनविधारणाभ्यां वा प्राणस्य ॥३४॥
'अथवा प्राणवायुको बारंबार बाहर निकालने और रोकनेके अभ्याससे भी चित्त निर्मल हो जाता है।'
व्याख्या—बारंबार प्राणवायुको शरीरसे बाहर निकालनेके अभ्याससे तथा यथाशक्ति बाहर रोके रखनेका अभ्यास करनेसे मनमें निर्मलता आ जाती है, इससे शरीरकी नाड़ियोंका मल भी नष्ट होता है ॥३४॥
सम्बन्ध—प्रसङ्गवश चित्तकी निर्मलताके उपाय बतलाकर अब मनको स्थिर करनेवाला अन्य हेतु बतलाते हैं—