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पातञ्जल योगदर्शन (भाष्य सहित)

Patanjali Yoga Darshan

महर्षि पतञ्जलि / हरिकृष्णदास गोयन्दका द्वारा

DevanagariHindipublished184 पृष्ठ

समाधिपाद-१ २७

मैत्रीकरुणामुदितोपेक्षाणां सुखदुःखपुण्यापुण्य-

विषयाणां भावनातश्चित्तप्रसादनम् ॥३३॥

'सुखी, दुःखी, पुण्यात्मा और पापात्मा—ये चारों जिनके क्रमसे विषय हैं, ऐसी मित्रता, दया, प्रसन्नता और उपेक्षाकी भावनासे चित्त स्वच्छ हो जाता है।'

व्याख्या—सुखी मनुष्योंमें मित्रताकी भावना करनेसे, दुखी मनुष्योंमें दयाकी भावना करनेसे, पुण्यात्मा पुरुषोंमें प्रसन्नताकी भावना करनेसे और पापियोंमें उपेक्षाकी भावना करनेसे चित्तके द्वेष, घृणा, ईर्ष्या और क्रोध आदि मलोंका नाश होकर चित्त शुद्ध—निर्मल हो जाता है। अतः साधकको इसका अभ्यास करना चाहिये ॥३३॥

सम्बन्ध—चित्तशुद्धिका दूसरा उपाय बतलाते हैं—

प्रच्छर्दनविधारणाभ्यां वा प्राणस्य ॥३४॥

'अथवा प्राणवायुको बारंबार बाहर निकालने और रोकनेके अभ्याससे भी चित्त निर्मल हो जाता है।'

व्याख्या—बारंबार प्राणवायुको शरीरसे बाहर निकालनेके अभ्याससे तथा यथाशक्ति बाहर रोके रखनेका अभ्यास करनेसे मनमें निर्मलता आ जाती है, इससे शरीरकी नाड़ियोंका मल भी नष्ट होता है ॥३४॥

सम्बन्ध—प्रसङ्गवश चित्तकी निर्मलताके उपाय बतलाकर अब मनको स्थिर करनेवाला अन्य हेतु बतलाते हैं—

२८ पातञ्जलयोगदर्शन

विषयवती वा प्रवृत्तिरुत्पन्ना मनसः स्थितिनिबन्धनी ॥ ३५॥

'विषयवाली प्रवृत्ति उत्पन्न होकर वह भी मनकी स्थितिको बाँधनेवाली हो जाती है।'

व्याख्या—अभ्यास करते-करते साधकको दिव्य विषयोंका साक्षात् हो जाता है, उन दिव्य विषयोंका अनुभव करनेवाली वृत्तिका नाम विषयवती प्रवृत्ति है। ऐसी प्रवृत्ति उत्पन्न होनेसे साधकका योगमार्गमें विश्वास और उत्साह बढ़ जाता है; इस कारण यह आत्मचिन्तनके अभ्यासमें भी मनको स्थिर करनेमें हेतु बन जाती है ॥३५॥

सम्बन्ध—इसी प्रकारका और भी हेतु बतलाते हैं—

विशोका वा ज्योतिष्मती ॥ ३६॥

'इसके सिवा (यदि) शोकरहित ज्योतिष्मती प्रवृत्ति (उत्पन्न हो जाय तो वह) भी मनकी स्थिति करनेवाली होती है।'

व्याख्या—अभ्यास करते-करते साधकको यदि शोकरहित प्रकाशमय प्रवृत्तिका अनुभव हो जाय तो वह भी मनको स्थिर करनेवाली होती है ॥३६॥

सम्बन्ध—अब चित्तकी स्थिरताका अन्य उपाय बतलाते हैं—

वीतरागविषयं वा चित्तम् ॥ ३७॥

'वीतरागको विषय करनेवाला चित्त भी (स्थिर हो जाता है)।'

समाधिपाद-१ २९

**व्याख्या—**जिन पुरुषोंके राग-द्वेष सर्वथा नष्ट हो चुके हैं, ऐसे विरक्त पुरुषोंको ध्येय बनाकर अभ्यास करनेवाला चित्त भी स्थिर हो जाता है ॥३७॥

**सम्बन्ध—**और भी अन्य उपाय बतलाते हैं—

स्वप्ननिद्राज्ञानालम्बनं वा ॥३८॥

'स्वप्न और निद्राके ज्ञानका अवलम्बन करनेवाला चित्त भी स्थिर हो सकता है।'

**व्याख्या—**स्वप्नमें कोई अलौकिक अनुभव हुआ हो, जैसे अपने इष्टदेवका दर्शन आदि, तो उसको स्मरण करके वैसा ही अभ्यास करनेसे मन स्थिर हो जाता है तथा गाढ़ निद्रामें केवल चित्तकी वृत्तियोंके अभावका ही ज्ञान रहता है, किसी भी पदार्थकी प्रतीति नहीं होती, उसी प्रकार समस्त वृत्तियोंका बाध करके वृत्तियोंके अभावके ज्ञानका अवलम्बन करनेसे अर्थात् उसीको लक्ष्य बनाकर अभ्यास करनेसे भी अनायास ही चित्त स्थिर हो सकता है। जिस कालमें तमोगुणका आविर्भाव होता हो, उस समय यह अभ्यास नहीं करना चाहिये। जिस समय चित्त और इन्द्रियोंमें सत्त्वगुण बढ़ा हुआ हो, उस समय यह साधन अधिक लाभप्रद हो सकता है ॥३८॥

**सम्बन्ध—**मनुष्योंकी रुचि भिन्न-भिन्न होती है; अतः अब सर्वसाधारणके उपयोगी साधनका वर्णन करते हुए इस प्रकरणका उपसंहार करते हैं—

३०पातञ्जलयोगदर्शन

यथाभिमतध्यानाद्वा ॥ ३९ ॥

'जिसको जो अभिमत हो, उसके ध्यानसे भी मन स्थिर हो जाता है।'

व्याख्या—उपर्युक्त साधनोंमेंसे कोई साधन किसी साधकके अनुकूल नहीं पड़ता हो तो उसे अपनी रुचिके अनुसार अपने इष्टका ध्यान करना चाहिये। अपनी रुचिके अनुसार अपने इष्टका ध्यान करनेसे भी मन स्थिर हो जाता है ॥ ३९॥

सम्बन्ध—चित्तकी स्थिरताके उपाय बतलाकर अब यह बतलाते हैं कि चित्तमें जब स्थिर होनेकी योग्यता परिपक्व हो जाती है, तब उसकी कैसी स्थिति होती है—

परमाणुपरममहत्त्वान्तोऽस्य वशीकारः ॥ ४० ॥

'(उस समय) इसका परमाणुसे लेकर परम महत्त्वतक वशीकार हो जाता है।'

व्याख्या—अभ्यास करते-करते जब साधकका चित्त भलीभाँति स्थितिकी योग्यता प्राप्त कर लेता है, उस समय साधक अपने चित्तको सूक्ष्म-से-सूक्ष्म पदार्थसे लेकर बड़े-से-बड़े महान् पदार्थतक चाहे जहाँ, चाहे जब तत्काल स्थिर कर सकता है। उसका अपने चित्तपर पूर्ण अधिकार हो जाता है। चित्तमें स्थिर होनेकी योग्यता परिपक्व हो जानेकी पहचान भी यही है ॥४०॥

सम्बन्ध—पहले बतलाये हुए उपायोंसे जब साधकका अपने चित्तपर अधिकार हो जाता है और चित्त अत्यन्त निर्मल होकर उसमें समाधिकी योग्यता आ जाती है, उसके बाद किस प्रकार

समाधिपाद-१ · ३१

क्रमसे संप्रज्ञात और निर्बीज समाधि सिद्ध होती है, उसका वर्णन आरम्भ करते हैं—

क्षीणवृत्तेरभिजातस्येव मणेर्ग्रहीतृग्रहणग्राह्येषु तत्स्थतदञ्जनतासमापत्तिः ॥४१॥

'जिसकी समस्त बाह्य वृत्तियाँ क्षीण हो चुकी हैं, ऐसे स्फटिकमणिकी भाँति निर्मल चित्तका जो ग्रहीता (पुरुष), ग्रहण (अन्तःकरण और इन्द्रियाँ) और ग्राह्य (पञ्चभूत और विषयों) में स्थित हो जाना और तदाकार हो जाना है, यही संप्रज्ञात समाधि है।'

व्याख्या—पूर्वोक्त अभ्यास करते-करते जब साधकका चित्त स्वच्छ स्फटिकमणिकी भाँति अति निर्मल हो जाता है, जब उसकी ध्येयसे अतिरिक्त बाह्य वृत्तियाँ शान्त हो जाती हैं, उस समय साधक इन्द्रियोंके स्थूल या सूक्ष्म विषयोंको (योग० ३ । ४४) या अन्तःकरण और इन्द्रियोंको (योग० ३ । ४७) अथवा बुद्धिस्थ पुरुषको (योग० ३ । ४९)—जिस किसी भी ध्येयको लक्ष्य बनाकर उसमें अपने चित्तको लगाता है तो वह चित्त उस ध्येय वस्तुमें स्थित होकर तदाकार हो जाता है। इसीको संप्रज्ञात समाधि कहते हैं; क्योंकि इस समाधिमें साधकको ध्येय वस्तुके स्वरूपका भली प्रकार ज्ञान हो जाता है, उसके विषयमें किसी प्रकारका संशय या भ्रम नहीं रहता।*


* इसी समाधिका वर्णन पहले सतरहवें सूत्रमें भी आया है, वहाँ वितर्क, विचार, आनन्द और अस्मिता—इन चारोंके सम्बन्धसे होनेवाले योगको संप्रज्ञात बतलाया है।

३२ पातञ्जलयोगदर्शन

सूत्रकारने अगले सूत्रोंमें न तो आनन्दानुगत समाधिकी चर्चा की है, न ग्रहण या इन्द्रियानुगतकी और न अस्मिता या पुरुषानुगतकी; इस कारण यद्यपि यह विषय स्पष्ट नहीं होता, परन्तु सूक्ष्म विषयकी हद अलिङ्गपर्यन्त बतला दी, इससे मन, इन्द्रियाँ और अस्मिताका उसीमें अन्तर्भाव माना जा सकता है। सम्भव है, इसीसे उन्होंने इन्द्रियानुगत और अस्मितानुगत समाधिके भेदोंका अलग वर्णन न किया हो; क्योंकि तीसरे पादके ४४ वें, ४७ वें और ४९ वें सूत्रमें जहाँ ग्राह्यविषयक, ग्रहण-विषयक और ग्रहीतृविषयक संयमका फल बताया है, वहाँ ग्राह्यके सूक्ष्मरूपमें तन्मात्राओंको और ग्रहणके सूक्ष्मरूपमें अस्मिताको ले लिया है। आनन्द भी मनका ग्राह्य विषय होनेके कारण इसको भी सूक्ष्म ग्राह्यविषयक समाधिके ही अन्तर्गत माना जा सकता है।*

अतः यहाँ यह मानना उचित मालूम होता है कि आकाशादि पञ्च महाभूत और उनका कार्य तो स्थूल ग्राह्य विषय है तथा तन्मात्रा और उनका सूक्ष्म कार्य सूक्ष्म ग्राह्य विषय है। इन्द्रियाँ और अन्तःकरण ग्रहणविषयक समाधिके


* कुछ टीकाकारोंका कहना है कि वितर्क और विचारके स्थानपर तो यहाँ 'ग्राह्य' शब्द है, आनन्दकी जगह 'ग्रहण' शब्द है और अस्मिताकी जगह 'ग्रहीता' शब्द है। दोनों स्थलोंके वर्णनकी एकता करनेके लिये उन लोगोंने उस सूत्रकी टीकामें आनन्दका अर्थ इन्द्रियाँ किया है और इस सूत्रमें 'ग्रहीता' का अर्थ अस्मिता किया है; किंतु व्यासभाष्यमें ऐसा नहीं किया गया है। उन्होंने वहाँ आनन्दका अर्थ आह्लाद और यहाँ 'ग्रहीता' का अर्थ साधारण पुरुष और मुक्त पुरुष—इस प्रकार किया है।

समाधिपाद-१ ३३

अन्तर्गत हैं, वे ग्राह्यविषयक समाधिमें तो नहीं आते; परंतु सूक्ष्म विषयकी हद अलिङ्गपर्यन्त बतला देनेसे ग्रहणविषयक समाधिका भी विचारानुगत समाधिमें ही अन्तर्भाव है। इसी प्रकार आनन्द नाम आह्लादका है। यह प्रकृति और पुरुषके संयोगसे उत्पन्न होनेवाला और मनके द्वारा ग्राह्य है। अतः वह सूक्ष्म विषयके अन्तर्गत आ जानेके कारण उसका भी ग्राह्य समाधिमें अन्तर्भाव है। एवं यहाँ जो गृहीतृविषयक समाधि बतायी गयी है, वह भी तीसरे पादके पैंतीसवें सूत्रके अनुसार प्रकृति-पुरुषके संयोग-कालमें ही पुरुषके स्वरूपमें की जाती है। अतः वह भी अस्मितानुगत समाधि ही है; क्योंकि उसका फल उसी सूत्रमें पुरुषका ज्ञान बतलाया गया है ॥४१॥

सम्बन्ध— सामान्यरूपसे संप्रज्ञात समाधिका स्वरूप बतला दिया, अब इसके भेदोंका वर्णन करते हैं—

तत्र शब्दार्थज्ञानविकल्पैः संकीर्णा सवितर्का समापत्तिः ॥४२॥

'उनमें शब्द, अर्थ और ज्ञान—इन तीनोंके विकल्पोंसे संकीर्ण—मिली हुई समाधि सवितर्क है।'

व्याख्या— ग्राह्य यानी मन और इन्द्रियोंद्वारा ग्रहण करनेमें आनेवाले पदार्थ दो प्रकारके होते हैं—(१) स्थूल, (२) सूक्ष्म। इनमेंसे किसी एक स्थूल पदार्थको लक्ष्य बनाकर उसके स्वरूपको जाननेके लिये जब योगी अपने चित्तको उसमें लगाता है, तब पहले-पहल होनेवाले अनुभवमें उस वस्तुके नाम, रूप और ज्ञानके विकल्पोंका मिश्रण रहता है। अर्थात् उसके स्वरूपके

पा० यो० द० ३—

३४ पातञ्जलयोगदर्शन

साथ-साथ उसके नाम और प्रतीतिकी भी चित्तमें स्फुरणा रहती है। अतः इस समाधिको सवितर्क समाधि कहते हैं। इसीका दूसरा नाम सविकल्प योग भी है ॥४२॥

**सम्बन्ध—**इसके बाद—

स्मृतिपरिशुद्धौ स्वरूपशून्येवार्थमात्रनिर्भासा निर्वितर्का ॥४३॥

'(शब्द और प्रतीतिकी) स्मृतिके भलीभाँति लुप्त हो जानेपर अपने रूपसे शून्य हुईके सदृश केवल ध्येयमात्रके स्वरूपको प्रत्यक्ष करानेवाली (चित्तकी स्थिति ही) निर्वितर्क समाधि है।'

**व्याख्या—**पहले बतलायी हुई स्थितिके बाद जब साधकके चित्तमें ध्येय वस्तुके नामकी स्मृति लुप्त हो जाती है और उसको विषय करनेवाली चित्तवृत्तिका भी स्मरण नहीं रहता, तब अपने स्वरूपका भी भान न रहनेके कारण स्वरूपके अभावकी-सी स्थिति हो जाती है, उस समय सब प्रकारके विकल्पोंका अभाव हो जाने- के कारण केवल ध्येय पदार्थके साथ तदाकार हुआ चित्त ध्येयको प्रकाशित करता है, उस अवस्थाका नाम 'निर्वितर्क' समाधि है। इसमें शब्द और प्रतीतिका कोई विकल्प नहीं रहता, अतः इसे 'निर्विकल्प' समाधि भी कहते हैं ॥४३॥

**सम्बन्ध—**इस प्रकार स्थूल ध्येय पदार्थोंमें होनेवाली संप्रज्ञात समाधिका भेद बतलाकर अब सूक्ष्म ध्येयमें होनेवाली सम्प्रज्ञात समाधिके भेद बतलाते हैं—

समाधिपाद-१ ३५

एतयैव सविचारा निर्विचारा च सूक्ष्मविषया व्याख्याता ॥४४॥

'इसीसे (पूर्वोक्त सवितर्क और निर्वितर्कके वर्णनसे ही) सूक्ष्म पदार्थोंमें की जानेवाली सविचार और निर्विचार समाधि-का भी वर्णन किया गया।'

व्याख्या— जिस प्रकार स्थूल ध्येय पदार्थोंमें की जानेवाली समाधिके दो भेद हैं, उसी प्रकार सूक्ष्म ध्येय पदार्थोंसे सम्बन्ध रखनेवाली समाधिके भी दो भेद समझ लेने चाहिये अर्थात् जब किसी सूक्ष्म ध्येय पदार्थके स्वरूपका यथार्थ स्वरूप जाननेके लिये उसमें चित्तको स्थिर किया जाता है, तब पहले उसके नाम, रूप और ज्ञानके विकल्पोंसे मिला हुआ अनुभव होता है, वह स्थिति सविचार समाधि है; और उसके बाद जब नामका और ज्ञानका अर्थात् चित्तके निज स्वरूपका भी विस्मरण होकर केवल ध्येय पदार्थका ही अनुभव होता है, वह स्थिति निर्विचार समाधि है ॥४४॥

सम्बन्ध— अब सूक्ष्म पदार्थोंमें किन-किनकी गणना है, यह स्पष्ट करते हैं—

सूक्ष्मविषयत्वं चालिङ्गपर्यवसानम् ॥४५॥

'तथा सूक्ष्मविषयताकी अवधि प्रकृति हैं।'

व्याख्या— पृथ्वीका सूक्ष्म विषय गन्धतन्मात्रा, जलका रस-तन्मात्रा, तेजका रूपतन्मात्रा, वायुका स्पर्शतन्मात्रा और आकाश-का शब्दतन्मात्रा है एवं उन सबका और मनसहित इन्द्रियोंका सूक्ष्म विषय अहंकार, अहंकारका महत्तत्त्व और महत्तत्त्वका सूक्ष्म

३६ पातञ्जलयोगदर्शन

विषय यानी कारण प्रकृति है। उससे आगे कोई सूक्ष्म पदार्थ नहीं है, वही सूक्ष्मताकी अवधि है। अतः प्रकृतिपर्यन्त किसी भी सूक्ष्म पदार्थको लक्ष्य बनाकर उसमें की हुई समाधिको सविचार और निर्विचार समाधिके अन्तर्गत समझ लेना चाहिये। यद्यपि पुरुष प्रकृतिसे भी सूक्ष्म है, पर वह दृश्य पदार्थोंमें नहीं है, अतः तद्विषयक समाधि इसमें नहीं आनी चाहिये; तथापि ग्रहीतृविषयक समाधि बुद्धिमें प्रतिबिम्बित पुरुषके रूपमें की जाती है (योग० ३।३५)। अतः उसको निर्विचार समाधिके अन्तर्गत मान लेनेमें कोई आपत्ति मालूम नहीं होती।

इस प्रकार यहाँ सूक्ष्म विषयकी सीमा प्रकृतिपर्यन्त बतला देनेके कारण मन, इन्द्रियाँ तथा आनन्द और अस्मिताका भी उसमें अन्तर्भाव प्रतीत होता है; फिर सतरहवें सूत्रमें कहे हुए आनन्द और अस्मिताको और इकतालीसवें सूत्रमें ग्रहण नामसे कहे हुए मन और इन्द्रियोंको और ग्रहीता नामसे कहे हुए प्रकृतिस्थ पुरुषको टीकाकारोंने 'विचार' शब्दवाच्य सूक्ष्म विषयसे अलग कैसे कहा और सूत्रकारोंने तद्विषयक समाधिके भेदोंका वर्णन क्यों नहीं किया, यह विचारणीय है ॥४५॥

सम्बन्ध—इकतालीसवें सूत्रसे पैंतालीसवेंतक संप्रज्ञात समाधि- का भेद बतलाकर अब उन सब प्रकारकी समाधियोंका सहेतुक दूसरा नाम बतलाते हैं—

ता एव सबीजः समाधिः ॥४६॥

‘वे सब-की-सब सबीज समाधि हैं।’

समाधिपाद-१ ३७

**व्याख्या—**निर्वितर्क और निर्विचार समाधियाँ निर्विकल्प होनेपर भी निर्बीज नहीं हैं; ये सब-की-सब सबीज समाधि ही हैं; क्योंकि इनमें बीजरूपसे किसी-न-किसी ध्येय पदार्थको विषय करनेवाली चित्तवृत्तिका अस्तित्व-सा रहता है । अतः सम्पूर्ण वृत्तियोंका पूर्णतया निरोध न होनेके कारण इन समाधियोंमें पुरुषको कैवल्य-अवस्थाका लाभ नहीं होता ॥४६॥

**सम्बन्ध—**उक्त चार प्रकारकी समाधियोंमेंसे निर्विचार समाधि ही सबसे श्रेष्ठ है, यह प्रतिपादन करनेके लिये उसकी विशेष अवस्थाका फलसहित वर्णन करते हैं—

निर्विचारवैशारद्येऽध्यात्मप्रसादः ॥४७॥

‘निर्विचार समाधि अत्यन्त निर्मल होनेपर (योगीको) अध्यात्मप्रसादका लाभ होता है।’

**व्याख्या—**निर्विचार समाधिके अभ्याससे जब योगीके चित्तकी स्थिति सर्वथा शुद्ध हो जाती है, उसकी समाधि-स्थितिमें किसी प्रकारका भी किञ्चिन्मात्र भी मल नहीं रहता, उस समय योगीकी बुद्धि अत्यन्त स्वच्छ—निर्मल हो जाती है (योग० ३।५)॥४७॥

**सम्बन्ध—**अतः—

ऋतम्भरा तत्र प्रज्ञा ॥४८॥

‘उस समय (योगीकी) बुद्धि ऋतम्भरा होती है।’

**व्याख्या—**उस अवस्थामें योगीकी बुद्धि वस्तुके सत्य (असली) स्वरूपको ग्रहण करनेवाली होती है; उसमें संशय और भ्रमका लेश भी नहीं रहता ॥४८॥

**सम्बन्ध—**उक्त ऋतम्भरा प्रज्ञाकी विशेषताका वर्णन करते हैं—

३८ पातञ्जलयोगदर्शन

श्रुतानुमानप्रज्ञाभ्यामन्यविषया विशेषार्थत्वात् ॥४९॥

'श्रवण और अनुमानसे होनेवाली बुद्धिकी अपेक्षा इस बुद्धिका विषय विलक्षण है; क्योंकि यह विशेषार्थवाली है।'

व्याख्या—वेद, शास्त्र और आप्त पुरुषके वचनोंसे वस्तुका सामान्य ज्ञान होता है, पूर्ण ज्ञान नहीं होता। इसी प्रकार अनुमान-से भी साधारण ज्ञान ही होता है। बहुत-से सूक्ष्म पदार्थोंमें तो अनुमानकी पहुँच ही नहीं है। अतः वेद-शास्त्रोंमें किसी वस्तुके स्वरूपका वर्णन सुननेसे जो तद्विषयक निश्चय होता है, वह श्रुत-बुद्धि है; इसी प्रकार अनुमान (युक्ति) प्रमाणसे जो वस्तुके स्वरूपका निश्चय होता है, वह अनुमानबुद्धि है। ये दोनों प्रकारकी बुद्धिवृत्तियाँ वस्तुके स्वरूपको सामान्यरूपसे ही विषय करती हैं, उसके अङ्ग-प्रत्यङ्गोंसहित उसका पूर्ण ज्ञान इनसे नहीं होता। किंतु ऋतम्भरा प्रज्ञासे वस्तुके स्वरूपका यथार्थ और पूर्ण (अङ्ग-प्रत्यङ्गोंसहित) ज्ञान हो जाता है। अतः यह उन दोनों प्रकारकी बुद्धियोंसे अत्यन्त श्रेष्ठ है ॥४९॥

सम्बन्ध—इस ऋतम्भरा प्रज्ञाका और भी महत्त्व बतलाते हैं—

तज्जः संस्कारोऽन्यसंस्कारप्रतिबन्धी ॥५०॥

'उससे उत्पन्न होनेवाला संस्कार दूसरे संस्कारोंका बाध करनेवाला होता है।'

व्याख्या—मनुष्य जिस किसी भी वस्तुका अनुभव करता है, जो कुछ भी क्रिया करता है, उन सबके संस्कार अन्तःकरणमें इकट्ठे हुए रहते हैं, इन्हींको योगशास्त्रमें कर्माशय (योग० २। १२)

समाधिपाद-१ ३९

के नामसे कहा है । ये ही मनुष्यको संसारचक्रमें भटकानेवाले मुख्य कारण हैं ( योग० २ । १३ ) ; इनके नाशसे ही मनुष्य मुक्तिलाभ कर सकता है । अतः उक्त बुद्धिका महत्त्व प्रकट करते हुए सूत्रकार कहते हैं कि इस बुद्धिके प्रकट होनेपर जब मनुष्यको प्रकृतिके यथार्थ रूपका भान हो जाता है, तब उसका प्रकृतिमें और उसके कार्योंमें स्वभावसे ही वैराग्य हो जाता है । उस वैराग्यके संस्कार पूर्व इकट्ठे हुए सब प्रकारके राग-द्वेषमय संस्कारोंका नाश कर डालते हैं, इससे योगी शीघ्र ही मुक्तावस्थाके समीप पहुँच जाता है ॥५०॥

सम्बन्ध—अब निर्बीज समाधिरूप कैवल्य-अवस्थाका वर्णन करते हुए इस पादकी समाप्ति करते हैं—

तस्यापि निरोधे सर्वनिरोधान्निर्बीजः समाधिः ॥५१॥

'उसका भी निरोध हो जानेपर सबका निरोध हो जानेके कारण निर्बीज समाधि हो जाती है ।'

व्याख्या—जब ऋतम्भरा प्रज्ञाजनित संस्कारके प्रभावसे अन्य सब प्रकारके संस्कारोंका अभाव हो जाता है; उसके बाद उस ऋतम्भरा प्रज्ञासे उत्पन्न संस्कारोंमें भी आसक्ति न रहनेके कारण उनका भी निरोध हो जाता है । उनका निरोध होते ही समस्त संस्कारोंका निरोध अपने-आप हो जाता है । अतः संसारके बीजका सर्वथा अभाव हो जानेसे इस अवस्थाका नाम निर्बीज समाधि है । इसीको कैवल्य-अवस्था भी कहते हैं ॥५१॥


ॐ श्रीपरमात्मने नमः

साधनपाद-२

पहले पादमें योगका स्वरूप, उसके भेद और उसके फलका संक्षेपमें वर्णन किया गया। साथ ही उसके उपायभूत अभ्यास और वैराग्यका तथा ईश्वरप्रणिधान आदि दूसरे साधनोंका भी वर्णन किया गया। किन्तु उसमें बतलायी हुई रीतिसे निर्बीज समाधि वही साधक प्राप्त कर सकता है, जिसका अन्तःकरण स्वभावसे ही शुद्ध है एवं जो योगसाधनामें तत्पर है। अतः अब साधारण साधकोंके लिये क्रमशः अन्तःकरणकी शुद्धिपूर्वक निर्बीज समाधि प्राप्त करनेका उपाय बतलानेके लिये साधनपाद नामक दूसरे पादका आरम्भ किया जाता है—

तपःस्वाध्यायेश्वरप्रणिधानानि क्रियायोगः ॥ १ ॥

‘तप, स्वाध्याय और ईश्वर-शरणागति—ये तीनों क्रिया-योग हैं।’

**व्याख्या—(१) तप—**अपने वर्ण, आश्रम, परिस्थिति और योग्यताके अनुसार स्वधर्मका पालन करना और उसके पालनमें जो शारीरिक या मानसिक अधिक-से-अधिक कष्ट प्राप्त हो, उसे सहर्ष सहन करना—इसका नाम ‘तप’ है। व्रत, उपवास आदि भी इसीमें आ जाते हैं। निष्कामभावसे इस तपका पालन करनेसे मनुष्यका अन्तःकरण अनायास ही शुद्ध हो जाता है; यह गीतोक्त कर्मयोगका ही अङ्ग है।

साधनपाद-२
४१

( २ ) स्वाध्याय—जिनसे अपने कर्तव्य-अकर्तव्यका बोध हो सके, ऐसे वेद, शास्त्र, महापुरुषोंके लेख आदिका पठन-पाठन और भगवान्‌के ॐकार आदि किसी नामका या गायत्रीका और किसी भी इष्टदेवताके मन्त्रका जप करना 'स्वाध्याय' है।

( ३ ) ईश्वर-प्रणिधान—ईश्वरके शरणापन्न हो जानेका नाम 'ईश्वर-प्रणिधान' है। उसके नाम, रूप, लीला, धाम, गुण और प्रभाव आदिका श्रवण, कीर्तन और मनन करना, समस्त कर्मोंको भगवान्‌के समर्पण कर देना, अपनेको भगवान्‌के हाथका यन्त्र बनाकर जिस प्रकार वह नचावे, वैसे ही नाचना, उसकी आज्ञाका पालन करना, उसीमें अनन्य प्रेम करना—ये सभी ईश्वर-प्रणिधानके अङ्ग हैं।

यद्यपि तप, स्वाध्याय और ईश्वर-प्रणिधान—ये तीनों ही यम, नियम आदि योगके अङ्गोंमें नियमोंके अन्तर्गत आ जाते हैं, तथापि इन तीनों साधनोंका विशेष महत्त्व और इनकी सुगमता दिखलानेके लिये पहले क्रियायोगके नामसे इनका अलग वर्णन किया गया है॥१॥

**सम्बन्ध—**उपर्युक्त क्रियायोगका फल बतलाते हैं—

समाधिभावनार्थः क्लेशतनूकरणार्थश्च ॥२॥

'(यह क्रियायोग) समाधिकी सिद्धि करनेवाला और अविद्यादि क्लेशोंको क्षीण करनेवाला है।'

**व्याख्या—**उपर्युक्त क्रियायोगके साधनसे साधकके अविद्यादि क्लेशोंका क्षय होकर उसको कैवल्य-अवस्थातक समाधिकी प्राप्ति हो सकती है ॥२॥

४२ पातञ्जलयोगदर्शन

सम्बन्ध—दूसरे सूत्रमें क्रियायोगका फल समाधिसिद्धि और क्लेशोंका क्षय बतलाया गया, उनमेंसे समाधिके लक्षण और फलका वर्णन तो पहले पादमें हो चुका; परन्तु क्लेश कितने हैं, उनके नाम क्या हैं, वे किस-किस अवस्थामें रहते हैं, उनका क्षय कैसे होता है और उनका नाश क्यों करना चाहिये—इन सब बातोंका वर्णन नहीं हुआ। अतः प्रसङ्गानुसार इस प्रकरणका आरम्भ करते हैं—

अविद्यास्मितारागद्वेषाभिनिवेशाः क्लेशाः ॥३॥

‘अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष और अभिनिवेश (ये पाँचों) क्लेश हैं।’

व्याख्या—ये अविद्यादि पाँचों ही जीवमात्रको संसारचक्रमें घुमानेवाले महादुःखदायक हैं, इस कारण सूत्रकारने इनका नाम ‘क्लेश’ रक्खा है।

कितने टीकाकारोंका तो कहना है कि ये पाँचों क्लेश पाँच प्रकारका विपर्ययज्ञान है। कुछ इनमेंसे केवल अविद्या और विपर्ययवृत्तिकी ही एकता करते हैं। किन्तु ये दोनों बातें ही युक्ति-सङ्गत नहीं मालूम होतीं; क्योंकि प्रमाणवृत्तिमें विपर्ययवृत्तिका अभाव है, पर अविद्यादि पाँचों क्लेश वहाँ भी विद्यमान रहते हैं। ऋतम्भरा प्रज्ञामें विपर्ययका लेश भी नहीं स्वीकार किया जा सकता, परन्तु जिस अविद्यारूप क्लेशको द्रष्टा और दृश्यके संयोगका हेतु माना गया है, वह तो वहाँ भी रहता ही है; अन्यथा संयोगके अभावसे हेयका नाश होकर साधकको उसी क्षण कैवल्य-अवस्थाकी प्राप्ति हो

साधनपाद-२ ४३

जानी चाहिये थी। इसके सिवा एक बात और भी है। इस ग्रन्थमें कैवल्य-स्थितिको प्राप्त सिद्ध योगीके कर्म अशुक्ल और अकृष्ण अर्थात् पुण्य-पापके संस्कारोंसे रहित माने गये हैं ( योग० ४ । ७ ) इससे यह सिद्ध होता है कि जीवन्मुक्त योगीद्वारा भी कर्म अवश्य किये जाते हैं। तब यह भी मानना पड़ेगा कि व्युत्थान-अवस्थामें जब वह कर्म करता है तो विपर्यय वृत्तिका प्रादुर्भाव भी स्वाभाविक होता है; क्योंकि पाँचों ही वृत्तियाँ चित्तका धर्म है और व्युत्थान-अवस्थामें चित्त विद्यमान रहता है, यह स्वीकार करना ही पड़ेगा। किन्तु जीवन्मुक्त योगीमें अविद्या भी रहती है, यह नहीं माना जा सकता; क्योंकि यदि अविद्या वर्तमान है तो वह जीवन्मुक्त ही कैसा ? इसी तरह और भी बहुत-से कारण हैं ( देखिये योग० १ । ८ की टीका ), जिनसे विपर्यय और अविद्याकी एकता माननेमें सिद्धान्तकी हानि होती है। अतः विद्वान् सज्जनोंको इसपर विचार करना चाहिये ॥३॥

**सम्बन्ध—**अब क्लेशोंकी अवस्थाके भेद बतलाते हुए यह बात कहते हैं कि इन सबका मूल कारण अविद्यारूप क्लेश है—

अविद्या क्षेत्रमुत्तरेषां प्रसुप्ततनुविच्छिन्नोदाराणाम् ॥४॥

‘जो प्रसुप्त, तनु, विच्छिन्न और उदार—( इस प्रकार चार ) अवस्थाओंमें ( वर्तमान ) रहनेवाले हैं एवं जिनका वर्णन ( तीसरे सूत्रमें ) अविद्याके बाद किया गया है, उन ( अस्मितादि चारों क्लेशों ) का कारण अविद्या है।’

**व्याख्या—( १ ) प्रसुप्त—**चित्तमें विद्यमान रहते हुए भी जिस समय

४४ पातञ्जलयोगदर्शन

जो क्लेश अपना कार्य नहीं करता, उस समय उसे 'प्रसुप्त' कहा जाता है। प्रलयकाल और सुषुप्तिमें चारों ही क्लेशोंकी प्रसुप्त-अवस्था रहती है।

(२) तनु—क्लेशोंमें जो कार्य करनेकी शक्ति है, उसका जब योगके साधनोंद्वारा हास कर दिया जाता है, तब वे हीनशक्तिवाले क्लेश 'तनु' कहलाते हैं। देखनेमें भी आता है कि ये राग-द्वेषादि क्लेश साधारण मनुष्योंकी भाँति साधकोंपर अपना आधिपत्य नहीं जमा सकते अर्थात् साधारण मनुष्योंकी अपेक्षा साधकोंपर उनका प्रभाव बहुत कम पड़ता है।

(३) विच्छिन्न—जब कोई क्लेश उदार होता है, उस समय दूसरा क्लेश दब जाता है, वह उसकी 'विच्छिन्नावस्था' है। जैसे रागकी उदार अवस्थाके क्षणमें द्वेष दब जाता है और द्वेषकी उदार अवस्थाके क्षणमें राग दबा रहता है।

(४) उदार—जिस समय जो क्लेश अपना कार्य पूर्णतया कर रहा हो, उस समय वही 'उदार' कहलाता है।

उपर्युक्त पाँच क्लेशोंमेंसे अस्मितादि चार क्लेशोंके ही प्रसुप्तादि चार अवस्थाभेद बतलाये गये हैं, अविद्याके नहीं; क्योंकि वह अन्य चारोंकी कारण है, उसके नाशसे सबका सदाके लिये समूल नाश हो जाता है ॥४॥

**सम्बन्ध—**अब अविद्याका स्वरूप बतलाते हैं—

अनित्याशुचिदुःखानात्मसु नित्यशुचिसुखात्म-ख्यातिरविद्या ॥५॥

साधनपाद-२ ४५

'अनित्य, अपवित्र, दुःख और अनात्मामें नित्य, पवित्र, सुख और आत्मभावकी प्रतीति ही 'अविद्या' है।'

व्याख्या—इस लोक और परलोकके समस्त भोग और भोगोंका आयतन यह मनुष्य-शरीर भी अनित्य है, इस बातको प्रत्यक्षादि प्रमाणोंद्वारा समझकर भी जिसके प्रभावसे मनुष्य उनमें नित्यत्वबुद्धि करके राग-द्वेषादि कर लेता है, यह अनित्यमें नित्यकी अनुभूतिरूप अविद्या है।

इसी प्रकार हाड़, मांस, मज्जा आदि अपवित्र धातुओंके समुदायरूप अपने और स्त्री आदिके शरीरोंको प्रत्यक्षादि प्रमाणोंद्वारा अपवित्र समझते हुए भी जिसके कारण मनुष्य अपने शरीरमें पवित्रताका अभिमान करता है और स्त्री-पुत्र आदिके शरीरोंसे प्यार करता है, यह अपवित्रमें पवित्रकी अनुभूतिरूप अविद्या है।

वैसे ही प्रत्यक्षादि प्रमाणोंद्वारा विचार करनेपर सभी भोग दुःखरूप हैं—यह बात विचारशील साधकके समझमें आ जाती है (योग० २।१५)। इसपर भी मनुष्य उन भोगोंको सुखदायक समझकर उनके भोगनेमें प्रवृत्त हुआ रहता है, यही दुःखमें सुखकी अनुभूतिरूप अविद्या है।

तथा जड शरीर आत्मा नहीं है, यह बात थोड़ा-सा विचार करते ही समझमें आ जाती है, तथापि मनुष्य इसीको अपना स्वरूप माने रहता है, 'आत्मा इससे सर्वथा असङ्ग और चेतन है'—इस बातको अनुभव नहीं कर सकता, इसका नाम अनात्मामें आत्मभावकी अनुभूतिरूप अविद्या है।

४६पातञ्जलयोगदर्शन

प्रत्यक्ष, अनुमान और आगम प्रमाणसे वस्तुस्थितिका सामान्य ज्ञान हो जानेपर विपर्ययवृत्ति नहीं रहती, तो भी अविद्याका नाश नहीं होता; इससे यह सिद्ध होता है कि चित्तकी विपर्ययवृत्तिका नाम अविद्या नहीं है ॥५॥

सम्बन्ध—अब अस्मिताका स्वरूप बतलाते हैं—

दृग्दर्शनशक्त्योरेकात्मतेवास्मिता ॥६॥

'दृक्-शक्ति और दर्शनशक्ति-इन दोनोंका एकरूप-सा हो जाना 'अस्मिता' है।'

व्याख्या—दृक्-शक्ति अर्थात् द्रष्टा पुरुष और दर्शन-शक्ति अर्थात् बुद्धि—ये दोनों सर्वथा भिन्न और विलक्षण हैं। द्रष्टा चेतन है और बुद्धि जड है। इनकी एकता हो ही नहीं सकती। तथापि अविद्याके कारण दोनोंकी एकता-सी हो रही है (योग० २। २४)। इसीको द्रष्टा और दृश्यका संयोग कहते हैं। यही प्रकृति और पुरुषके स्वरूपकी उपलब्धिका हेतु माना गया है (योग० २। २३)। इस संयोगके रहते हुए ही पुरुष और बुद्धिका भिन्न-भिन्न स्वरूप विचारके द्वारा समझमें आता है, परन्तु जबतक निर्बीज समाधिद्वारा अविद्याका सर्वथा नाश नहीं कर दिया जाता, तबतक संयोगका अभाव नहीं होता। इस कारण इनके शुद्ध स्वरूपका अनुभव नहीं होता। अतः साधकको चाहिये कि तत्परतासे उत्साहपूर्वक योग-साधनमें लगकर शीघ्र ही अविद्याके नाशद्वारा संयोगरूप अस्मिता नामक क्लेशका नाश कर दे और कैवल्य-स्थितिको प्राप्त कर ले।६।