पातञ्जल योगदर्शन (भाष्य सहित)
Patanjali Yoga Darshan
महर्षि पतञ्जलि / हरिकृष्णदास गोयन्दका द्वारा
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जो क्लेश अपना कार्य नहीं करता, उस समय उसे 'प्रसुप्त' कहा जाता है। प्रलयकाल और सुषुप्तिमें चारों ही क्लेशोंकी प्रसुप्त-अवस्था रहती है।
(२) तनु—क्लेशोंमें जो कार्य करनेकी शक्ति है, उसका जब योगके साधनोंद्वारा हास कर दिया जाता है, तब वे हीनशक्तिवाले क्लेश 'तनु' कहलाते हैं। देखनेमें भी आता है कि ये राग-द्वेषादि क्लेश साधारण मनुष्योंकी भाँति साधकोंपर अपना आधिपत्य नहीं जमा सकते अर्थात् साधारण मनुष्योंकी अपेक्षा साधकोंपर उनका प्रभाव बहुत कम पड़ता है।
(३) विच्छिन्न—जब कोई क्लेश उदार होता है, उस समय दूसरा क्लेश दब जाता है, वह उसकी 'विच्छिन्नावस्था' है। जैसे रागकी उदार अवस्थाके क्षणमें द्वेष दब जाता है और द्वेषकी उदार अवस्थाके क्षणमें राग दबा रहता है।
(४) उदार—जिस समय जो क्लेश अपना कार्य पूर्णतया कर रहा हो, उस समय वही 'उदार' कहलाता है।
उपर्युक्त पाँच क्लेशोंमेंसे अस्मितादि चार क्लेशोंके ही प्रसुप्तादि चार अवस्थाभेद बतलाये गये हैं, अविद्याके नहीं; क्योंकि वह अन्य चारोंकी कारण है, उसके नाशसे सबका सदाके लिये समूल नाश हो जाता है ॥४॥
**सम्बन्ध—**अब अविद्याका स्वरूप बतलाते हैं—