भारतकोश
पातञ्जल योगदर्शन (भाष्य सहित)

पातञ्जल योगदर्शन (भाष्य सहित)

Patanjali Yoga Darshan

महर्षि पतञ्जलि / हरिकृष्णदास गोयन्दका द्वारा

DevanagariHindipublished184 पृष्ठ

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साधनपाद-२ ४३

जानी चाहिये थी। इसके सिवा एक बात और भी है। इस ग्रन्थमें कैवल्य-स्थितिको प्राप्त सिद्ध योगीके कर्म अशुक्ल और अकृष्ण अर्थात् पुण्य-पापके संस्कारोंसे रहित माने गये हैं ( योग० ४ । ७ ) इससे यह सिद्ध होता है कि जीवन्मुक्त योगीद्वारा भी कर्म अवश्य किये जाते हैं। तब यह भी मानना पड़ेगा कि व्युत्थान-अवस्थामें जब वह कर्म करता है तो विपर्यय वृत्तिका प्रादुर्भाव भी स्वाभाविक होता है; क्योंकि पाँचों ही वृत्तियाँ चित्तका धर्म है और व्युत्थान-अवस्थामें चित्त विद्यमान रहता है, यह स्वीकार करना ही पड़ेगा। किन्तु जीवन्मुक्त योगीमें अविद्या भी रहती है, यह नहीं माना जा सकता; क्योंकि यदि अविद्या वर्तमान है तो वह जीवन्मुक्त ही कैसा ? इसी तरह और भी बहुत-से कारण हैं ( देखिये योग० १ । ८ की टीका ), जिनसे विपर्यय और अविद्याकी एकता माननेमें सिद्धान्तकी हानि होती है। अतः विद्वान् सज्जनोंको इसपर विचार करना चाहिये ॥३॥

**सम्बन्ध—**अब क्लेशोंकी अवस्थाके भेद बतलाते हुए यह बात कहते हैं कि इन सबका मूल कारण अविद्यारूप क्लेश है—

अविद्या क्षेत्रमुत्तरेषां प्रसुप्ततनुविच्छिन्नोदाराणाम् ॥४॥

‘जो प्रसुप्त, तनु, विच्छिन्न और उदार—( इस प्रकार चार ) अवस्थाओंमें ( वर्तमान ) रहनेवाले हैं एवं जिनका वर्णन ( तीसरे सूत्रमें ) अविद्याके बाद किया गया है, उन ( अस्मितादि चारों क्लेशों ) का कारण अविद्या है।’

**व्याख्या—( १ ) प्रसुप्त—**चित्तमें विद्यमान रहते हुए भी जिस समय

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