पातञ्जल योगदर्शन (भाष्य सहित)
Patanjali Yoga Darshan
महर्षि पतञ्जलि / हरिकृष्णदास गोयन्दका द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३८ पातञ्जलयोगदर्शन
श्रुतानुमानप्रज्ञाभ्यामन्यविषया विशेषार्थत्वात् ॥४९॥
'श्रवण और अनुमानसे होनेवाली बुद्धिकी अपेक्षा इस बुद्धिका विषय विलक्षण है; क्योंकि यह विशेषार्थवाली है।'
व्याख्या—वेद, शास्त्र और आप्त पुरुषके वचनोंसे वस्तुका सामान्य ज्ञान होता है, पूर्ण ज्ञान नहीं होता। इसी प्रकार अनुमान-से भी साधारण ज्ञान ही होता है। बहुत-से सूक्ष्म पदार्थोंमें तो अनुमानकी पहुँच ही नहीं है। अतः वेद-शास्त्रोंमें किसी वस्तुके स्वरूपका वर्णन सुननेसे जो तद्विषयक निश्चय होता है, वह श्रुत-बुद्धि है; इसी प्रकार अनुमान (युक्ति) प्रमाणसे जो वस्तुके स्वरूपका निश्चय होता है, वह अनुमानबुद्धि है। ये दोनों प्रकारकी बुद्धिवृत्तियाँ वस्तुके स्वरूपको सामान्यरूपसे ही विषय करती हैं, उसके अङ्ग-प्रत्यङ्गोंसहित उसका पूर्ण ज्ञान इनसे नहीं होता। किंतु ऋतम्भरा प्रज्ञासे वस्तुके स्वरूपका यथार्थ और पूर्ण (अङ्ग-प्रत्यङ्गोंसहित) ज्ञान हो जाता है। अतः यह उन दोनों प्रकारकी बुद्धियोंसे अत्यन्त श्रेष्ठ है ॥४९॥
सम्बन्ध—इस ऋतम्भरा प्रज्ञाका और भी महत्त्व बतलाते हैं—
तज्जः संस्कारोऽन्यसंस्कारप्रतिबन्धी ॥५०॥
'उससे उत्पन्न होनेवाला संस्कार दूसरे संस्कारोंका बाध करनेवाला होता है।'
व्याख्या—मनुष्य जिस किसी भी वस्तुका अनुभव करता है, जो कुछ भी क्रिया करता है, उन सबके संस्कार अन्तःकरणमें इकट्ठे हुए रहते हैं, इन्हींको योगशास्त्रमें कर्माशय (योग० २। १२)