पातञ्जल योगदर्शन (भाष्य सहित)
Patanjali Yoga Darshan
महर्षि पतञ्जलि / हरिकृष्णदास गोयन्दका द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसमाधिपाद-१ ३९
के नामसे कहा है । ये ही मनुष्यको संसारचक्रमें भटकानेवाले मुख्य कारण हैं ( योग० २ । १३ ) ; इनके नाशसे ही मनुष्य मुक्तिलाभ कर सकता है । अतः उक्त बुद्धिका महत्त्व प्रकट करते हुए सूत्रकार कहते हैं कि इस बुद्धिके प्रकट होनेपर जब मनुष्यको प्रकृतिके यथार्थ रूपका भान हो जाता है, तब उसका प्रकृतिमें और उसके कार्योंमें स्वभावसे ही वैराग्य हो जाता है । उस वैराग्यके संस्कार पूर्व इकट्ठे हुए सब प्रकारके राग-द्वेषमय संस्कारोंका नाश कर डालते हैं, इससे योगी शीघ्र ही मुक्तावस्थाके समीप पहुँच जाता है ॥५०॥
सम्बन्ध—अब निर्बीज समाधिरूप कैवल्य-अवस्थाका वर्णन करते हुए इस पादकी समाप्ति करते हैं—
तस्यापि निरोधे सर्वनिरोधान्निर्बीजः समाधिः ॥५१॥
'उसका भी निरोध हो जानेपर सबका निरोध हो जानेके कारण निर्बीज समाधि हो जाती है ।'
व्याख्या—जब ऋतम्भरा प्रज्ञाजनित संस्कारके प्रभावसे अन्य सब प्रकारके संस्कारोंका अभाव हो जाता है; उसके बाद उस ऋतम्भरा प्रज्ञासे उत्पन्न संस्कारोंमें भी आसक्ति न रहनेके कारण उनका भी निरोध हो जाता है । उनका निरोध होते ही समस्त संस्कारोंका निरोध अपने-आप हो जाता है । अतः संसारके बीजका सर्वथा अभाव हो जानेसे इस अवस्थाका नाम निर्बीज समाधि है । इसीको कैवल्य-अवस्था भी कहते हैं ॥५१॥