भारतकोश
पातञ्जल योगदर्शन (भाष्य सहित)

पातञ्जल योगदर्शन (भाष्य सहित)

Patanjali Yoga Darshan

महर्षि पतञ्जलि / हरिकृष्णदास गोयन्दका द्वारा

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ॐ श्रीपरमात्मने नमः

साधनपाद-२

पहले पादमें योगका स्वरूप, उसके भेद और उसके फलका संक्षेपमें वर्णन किया गया। साथ ही उसके उपायभूत अभ्यास और वैराग्यका तथा ईश्वरप्रणिधान आदि दूसरे साधनोंका भी वर्णन किया गया। किन्तु उसमें बतलायी हुई रीतिसे निर्बीज समाधि वही साधक प्राप्त कर सकता है, जिसका अन्तःकरण स्वभावसे ही शुद्ध है एवं जो योगसाधनामें तत्पर है। अतः अब साधारण साधकोंके लिये क्रमशः अन्तःकरणकी शुद्धिपूर्वक निर्बीज समाधि प्राप्त करनेका उपाय बतलानेके लिये साधनपाद नामक दूसरे पादका आरम्भ किया जाता है—

तपःस्वाध्यायेश्वरप्रणिधानानि क्रियायोगः ॥ १ ॥

‘तप, स्वाध्याय और ईश्वर-शरणागति—ये तीनों क्रिया-योग हैं।’

**व्याख्या—(१) तप—**अपने वर्ण, आश्रम, परिस्थिति और योग्यताके अनुसार स्वधर्मका पालन करना और उसके पालनमें जो शारीरिक या मानसिक अधिक-से-अधिक कष्ट प्राप्त हो, उसे सहर्ष सहन करना—इसका नाम ‘तप’ है। व्रत, उपवास आदि भी इसीमें आ जाते हैं। निष्कामभावसे इस तपका पालन करनेसे मनुष्यका अन्तःकरण अनायास ही शुद्ध हो जाता है; यह गीतोक्त कर्मयोगका ही अङ्ग है।