पातञ्जल योगदर्शन (भाष्य सहित)
Patanjali Yoga Darshan
महर्षि पतञ्जलि / हरिकृष्णदास गोयन्दका द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसाधनपाद-२
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( २ ) स्वाध्याय—जिनसे अपने कर्तव्य-अकर्तव्यका बोध हो सके, ऐसे वेद, शास्त्र, महापुरुषोंके लेख आदिका पठन-पाठन और भगवान्के ॐकार आदि किसी नामका या गायत्रीका और किसी भी इष्टदेवताके मन्त्रका जप करना 'स्वाध्याय' है।
( ३ ) ईश्वर-प्रणिधान—ईश्वरके शरणापन्न हो जानेका नाम 'ईश्वर-प्रणिधान' है। उसके नाम, रूप, लीला, धाम, गुण और प्रभाव आदिका श्रवण, कीर्तन और मनन करना, समस्त कर्मोंको भगवान्के समर्पण कर देना, अपनेको भगवान्के हाथका यन्त्र बनाकर जिस प्रकार वह नचावे, वैसे ही नाचना, उसकी आज्ञाका पालन करना, उसीमें अनन्य प्रेम करना—ये सभी ईश्वर-प्रणिधानके अङ्ग हैं।
यद्यपि तप, स्वाध्याय और ईश्वर-प्रणिधान—ये तीनों ही यम, नियम आदि योगके अङ्गोंमें नियमोंके अन्तर्गत आ जाते हैं, तथापि इन तीनों साधनोंका विशेष महत्त्व और इनकी सुगमता दिखलानेके लिये पहले क्रियायोगके नामसे इनका अलग वर्णन किया गया है॥१॥
**सम्बन्ध—**उपर्युक्त क्रियायोगका फल बतलाते हैं—
समाधिभावनार्थः क्लेशतनूकरणार्थश्च ॥२॥
'(यह क्रियायोग) समाधिकी सिद्धि करनेवाला और अविद्यादि क्लेशोंको क्षीण करनेवाला है।'
**व्याख्या—**उपर्युक्त क्रियायोगके साधनसे साधकके अविद्यादि क्लेशोंका क्षय होकर उसको कैवल्य-अवस्थातक समाधिकी प्राप्ति हो सकती है ॥२॥