भारतकोश
पातञ्जल योगदर्शन (भाष्य सहित)

पातञ्जल योगदर्शन (भाष्य सहित)

Patanjali Yoga Darshan

महर्षि पतञ्जलि / हरिकृष्णदास गोयन्दका द्वारा

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समाधिपाद-१ ३७

**व्याख्या—**निर्वितर्क और निर्विचार समाधियाँ निर्विकल्प होनेपर भी निर्बीज नहीं हैं; ये सब-की-सब सबीज समाधि ही हैं; क्योंकि इनमें बीजरूपसे किसी-न-किसी ध्येय पदार्थको विषय करनेवाली चित्तवृत्तिका अस्तित्व-सा रहता है । अतः सम्पूर्ण वृत्तियोंका पूर्णतया निरोध न होनेके कारण इन समाधियोंमें पुरुषको कैवल्य-अवस्थाका लाभ नहीं होता ॥४६॥

**सम्बन्ध—**उक्त चार प्रकारकी समाधियोंमेंसे निर्विचार समाधि ही सबसे श्रेष्ठ है, यह प्रतिपादन करनेके लिये उसकी विशेष अवस्थाका फलसहित वर्णन करते हैं—

निर्विचारवैशारद्येऽध्यात्मप्रसादः ॥४७॥

‘निर्विचार समाधि अत्यन्त निर्मल होनेपर (योगीको) अध्यात्मप्रसादका लाभ होता है।’

**व्याख्या—**निर्विचार समाधिके अभ्याससे जब योगीके चित्तकी स्थिति सर्वथा शुद्ध हो जाती है, उसकी समाधि-स्थितिमें किसी प्रकारका भी किञ्चिन्मात्र भी मल नहीं रहता, उस समय योगीकी बुद्धि अत्यन्त स्वच्छ—निर्मल हो जाती है (योग० ३।५)॥४७॥

**सम्बन्ध—**अतः—

ऋतम्भरा तत्र प्रज्ञा ॥४८॥

‘उस समय (योगीकी) बुद्धि ऋतम्भरा होती है।’

**व्याख्या—**उस अवस्थामें योगीकी बुद्धि वस्तुके सत्य (असली) स्वरूपको ग्रहण करनेवाली होती है; उसमें संशय और भ्रमका लेश भी नहीं रहता ॥४८॥

**सम्बन्ध—**उक्त ऋतम्भरा प्रज्ञाकी विशेषताका वर्णन करते हैं—