भारतकोश
पातञ्जल योगदर्शन (भाष्य सहित)

पातञ्जल योगदर्शन (भाष्य सहित)

Patanjali Yoga Darshan

महर्षि पतञ्जलि / हरिकृष्णदास गोयन्दका द्वारा

DevanagariHindipublished184 पृष्ठ

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३६ पातञ्जलयोगदर्शन

विषय यानी कारण प्रकृति है। उससे आगे कोई सूक्ष्म पदार्थ नहीं है, वही सूक्ष्मताकी अवधि है। अतः प्रकृतिपर्यन्त किसी भी सूक्ष्म पदार्थको लक्ष्य बनाकर उसमें की हुई समाधिको सविचार और निर्विचार समाधिके अन्तर्गत समझ लेना चाहिये। यद्यपि पुरुष प्रकृतिसे भी सूक्ष्म है, पर वह दृश्य पदार्थोंमें नहीं है, अतः तद्विषयक समाधि इसमें नहीं आनी चाहिये; तथापि ग्रहीतृविषयक समाधि बुद्धिमें प्रतिबिम्बित पुरुषके रूपमें की जाती है (योग० ३।३५)। अतः उसको निर्विचार समाधिके अन्तर्गत मान लेनेमें कोई आपत्ति मालूम नहीं होती।

इस प्रकार यहाँ सूक्ष्म विषयकी सीमा प्रकृतिपर्यन्त बतला देनेके कारण मन, इन्द्रियाँ तथा आनन्द और अस्मिताका भी उसमें अन्तर्भाव प्रतीत होता है; फिर सतरहवें सूत्रमें कहे हुए आनन्द और अस्मिताको और इकतालीसवें सूत्रमें ग्रहण नामसे कहे हुए मन और इन्द्रियोंको और ग्रहीता नामसे कहे हुए प्रकृतिस्थ पुरुषको टीकाकारोंने 'विचार' शब्दवाच्य सूक्ष्म विषयसे अलग कैसे कहा और सूत्रकारोंने तद्विषयक समाधिके भेदोंका वर्णन क्यों नहीं किया, यह विचारणीय है ॥४५॥

सम्बन्ध—इकतालीसवें सूत्रसे पैंतालीसवेंतक संप्रज्ञात समाधि- का भेद बतलाकर अब उन सब प्रकारकी समाधियोंका सहेतुक दूसरा नाम बतलाते हैं—

ता एव सबीजः समाधिः ॥४६॥

‘वे सब-की-सब सबीज समाधि हैं।’

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