भारतकोश
पातञ्जल योगदर्शन (भाष्य सहित)

पातञ्जल योगदर्शन (भाष्य सहित)

Patanjali Yoga Darshan

महर्षि पतञ्जलि / हरिकृष्णदास गोयन्दका द्वारा

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समाधिपाद-१ ३५

एतयैव सविचारा निर्विचारा च सूक्ष्मविषया व्याख्याता ॥४४॥

'इसीसे (पूर्वोक्त सवितर्क और निर्वितर्कके वर्णनसे ही) सूक्ष्म पदार्थोंमें की जानेवाली सविचार और निर्विचार समाधि-का भी वर्णन किया गया।'

व्याख्या— जिस प्रकार स्थूल ध्येय पदार्थोंमें की जानेवाली समाधिके दो भेद हैं, उसी प्रकार सूक्ष्म ध्येय पदार्थोंसे सम्बन्ध रखनेवाली समाधिके भी दो भेद समझ लेने चाहिये अर्थात् जब किसी सूक्ष्म ध्येय पदार्थके स्वरूपका यथार्थ स्वरूप जाननेके लिये उसमें चित्तको स्थिर किया जाता है, तब पहले उसके नाम, रूप और ज्ञानके विकल्पोंसे मिला हुआ अनुभव होता है, वह स्थिति सविचार समाधि है; और उसके बाद जब नामका और ज्ञानका अर्थात् चित्तके निज स्वरूपका भी विस्मरण होकर केवल ध्येय पदार्थका ही अनुभव होता है, वह स्थिति निर्विचार समाधि है ॥४४॥

सम्बन्ध— अब सूक्ष्म पदार्थोंमें किन-किनकी गणना है, यह स्पष्ट करते हैं—

सूक्ष्मविषयत्वं चालिङ्गपर्यवसानम् ॥४५॥

'तथा सूक्ष्मविषयताकी अवधि प्रकृति हैं।'

व्याख्या— पृथ्वीका सूक्ष्म विषय गन्धतन्मात्रा, जलका रस-तन्मात्रा, तेजका रूपतन्मात्रा, वायुका स्पर्शतन्मात्रा और आकाश-का शब्दतन्मात्रा है एवं उन सबका और मनसहित इन्द्रियोंका सूक्ष्म विषय अहंकार, अहंकारका महत्तत्त्व और महत्तत्त्वका सूक्ष्म