पातञ्जल योगदर्शन (भाष्य सहित)
Patanjali Yoga Darshan
महर्षि पतञ्जलि / हरिकृष्णदास गोयन्दका द्वारा
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साथ-साथ उसके नाम और प्रतीतिकी भी चित्तमें स्फुरणा रहती है। अतः इस समाधिको सवितर्क समाधि कहते हैं। इसीका दूसरा नाम सविकल्प योग भी है ॥४२॥
**सम्बन्ध—**इसके बाद—
स्मृतिपरिशुद्धौ स्वरूपशून्येवार्थमात्रनिर्भासा निर्वितर्का ॥४३॥
'(शब्द और प्रतीतिकी) स्मृतिके भलीभाँति लुप्त हो जानेपर अपने रूपसे शून्य हुईके सदृश केवल ध्येयमात्रके स्वरूपको प्रत्यक्ष करानेवाली (चित्तकी स्थिति ही) निर्वितर्क समाधि है।'
**व्याख्या—**पहले बतलायी हुई स्थितिके बाद जब साधकके चित्तमें ध्येय वस्तुके नामकी स्मृति लुप्त हो जाती है और उसको विषय करनेवाली चित्तवृत्तिका भी स्मरण नहीं रहता, तब अपने स्वरूपका भी भान न रहनेके कारण स्वरूपके अभावकी-सी स्थिति हो जाती है, उस समय सब प्रकारके विकल्पोंका अभाव हो जाने- के कारण केवल ध्येय पदार्थके साथ तदाकार हुआ चित्त ध्येयको प्रकाशित करता है, उस अवस्थाका नाम 'निर्वितर्क' समाधि है। इसमें शब्द और प्रतीतिका कोई विकल्प नहीं रहता, अतः इसे 'निर्विकल्प' समाधि भी कहते हैं ॥४३॥
**सम्बन्ध—**इस प्रकार स्थूल ध्येय पदार्थोंमें होनेवाली संप्रज्ञात समाधिका भेद बतलाकर अब सूक्ष्म ध्येयमें होनेवाली सम्प्रज्ञात समाधिके भेद बतलाते हैं—