भारतकोश
पातञ्जल योगदर्शन (भाष्य सहित)

पातञ्जल योगदर्शन (भाष्य सहित)

Patanjali Yoga Darshan

महर्षि पतञ्जलि / हरिकृष्णदास गोयन्दका द्वारा

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समाधिपाद-१ ३३

अन्तर्गत हैं, वे ग्राह्यविषयक समाधिमें तो नहीं आते; परंतु सूक्ष्म विषयकी हद अलिङ्गपर्यन्त बतला देनेसे ग्रहणविषयक समाधिका भी विचारानुगत समाधिमें ही अन्तर्भाव है। इसी प्रकार आनन्द नाम आह्लादका है। यह प्रकृति और पुरुषके संयोगसे उत्पन्न होनेवाला और मनके द्वारा ग्राह्य है। अतः वह सूक्ष्म विषयके अन्तर्गत आ जानेके कारण उसका भी ग्राह्य समाधिमें अन्तर्भाव है। एवं यहाँ जो गृहीतृविषयक समाधि बतायी गयी है, वह भी तीसरे पादके पैंतीसवें सूत्रके अनुसार प्रकृति-पुरुषके संयोग-कालमें ही पुरुषके स्वरूपमें की जाती है। अतः वह भी अस्मितानुगत समाधि ही है; क्योंकि उसका फल उसी सूत्रमें पुरुषका ज्ञान बतलाया गया है ॥४१॥

सम्बन्ध— सामान्यरूपसे संप्रज्ञात समाधिका स्वरूप बतला दिया, अब इसके भेदोंका वर्णन करते हैं—

तत्र शब्दार्थज्ञानविकल्पैः संकीर्णा सवितर्का समापत्तिः ॥४२॥

'उनमें शब्द, अर्थ और ज्ञान—इन तीनोंके विकल्पोंसे संकीर्ण—मिली हुई समाधि सवितर्क है।'

व्याख्या— ग्राह्य यानी मन और इन्द्रियोंद्वारा ग्रहण करनेमें आनेवाले पदार्थ दो प्रकारके होते हैं—(१) स्थूल, (२) सूक्ष्म। इनमेंसे किसी एक स्थूल पदार्थको लक्ष्य बनाकर उसके स्वरूपको जाननेके लिये जब योगी अपने चित्तको उसमें लगाता है, तब पहले-पहल होनेवाले अनुभवमें उस वस्तुके नाम, रूप और ज्ञानके विकल्पोंका मिश्रण रहता है। अर्थात् उसके स्वरूपके

पा० यो० द० ३—