पातञ्जल योगदर्शन (भाष्य सहित)
Patanjali Yoga Darshan
महर्षि पतञ्जलि / हरिकृष्णदास गोयन्दका द्वारा
समाधिपाद-१ ३७
**व्याख्या—**निर्वितर्क और निर्विचार समाधियाँ निर्विकल्प होनेपर भी निर्बीज नहीं हैं; ये सब-की-सब सबीज समाधि ही हैं; क्योंकि इनमें बीजरूपसे किसी-न-किसी ध्येय पदार्थको विषय करनेवाली चित्तवृत्तिका अस्तित्व-सा रहता है । अतः सम्पूर्ण वृत्तियोंका पूर्णतया निरोध न होनेके कारण इन समाधियोंमें पुरुषको कैवल्य-अवस्थाका लाभ नहीं होता ॥४६॥
**सम्बन्ध—**उक्त चार प्रकारकी समाधियोंमेंसे निर्विचार समाधि ही सबसे श्रेष्ठ है, यह प्रतिपादन करनेके लिये उसकी विशेष अवस्थाका फलसहित वर्णन करते हैं—
निर्विचारवैशारद्येऽध्यात्मप्रसादः ॥४७॥
‘निर्विचार समाधि अत्यन्त निर्मल होनेपर (योगीको) अध्यात्मप्रसादका लाभ होता है।’
**व्याख्या—**निर्विचार समाधिके अभ्याससे जब योगीके चित्तकी स्थिति सर्वथा शुद्ध हो जाती है, उसकी समाधि-स्थितिमें किसी प्रकारका भी किञ्चिन्मात्र भी मल नहीं रहता, उस समय योगीकी बुद्धि अत्यन्त स्वच्छ—निर्मल हो जाती है (योग० ३।५)॥४७॥
**सम्बन्ध—**अतः—
ऋतम्भरा तत्र प्रज्ञा ॥४८॥
‘उस समय (योगीकी) बुद्धि ऋतम्भरा होती है।’
**व्याख्या—**उस अवस्थामें योगीकी बुद्धि वस्तुके सत्य (असली) स्वरूपको ग्रहण करनेवाली होती है; उसमें संशय और भ्रमका लेश भी नहीं रहता ॥४८॥
**सम्बन्ध—**उक्त ऋतम्भरा प्रज्ञाकी विशेषताका वर्णन करते हैं—
३८ पातञ्जलयोगदर्शन
श्रुतानुमानप्रज्ञाभ्यामन्यविषया विशेषार्थत्वात् ॥४९॥
'श्रवण और अनुमानसे होनेवाली बुद्धिकी अपेक्षा इस बुद्धिका विषय विलक्षण है; क्योंकि यह विशेषार्थवाली है।'
व्याख्या—वेद, शास्त्र और आप्त पुरुषके वचनोंसे वस्तुका सामान्य ज्ञान होता है, पूर्ण ज्ञान नहीं होता। इसी प्रकार अनुमान-से भी साधारण ज्ञान ही होता है। बहुत-से सूक्ष्म पदार्थोंमें तो अनुमानकी पहुँच ही नहीं है। अतः वेद-शास्त्रोंमें किसी वस्तुके स्वरूपका वर्णन सुननेसे जो तद्विषयक निश्चय होता है, वह श्रुत-बुद्धि है; इसी प्रकार अनुमान (युक्ति) प्रमाणसे जो वस्तुके स्वरूपका निश्चय होता है, वह अनुमानबुद्धि है। ये दोनों प्रकारकी बुद्धिवृत्तियाँ वस्तुके स्वरूपको सामान्यरूपसे ही विषय करती हैं, उसके अङ्ग-प्रत्यङ्गोंसहित उसका पूर्ण ज्ञान इनसे नहीं होता। किंतु ऋतम्भरा प्रज्ञासे वस्तुके स्वरूपका यथार्थ और पूर्ण (अङ्ग-प्रत्यङ्गोंसहित) ज्ञान हो जाता है। अतः यह उन दोनों प्रकारकी बुद्धियोंसे अत्यन्त श्रेष्ठ है ॥४९॥
सम्बन्ध—इस ऋतम्भरा प्रज्ञाका और भी महत्त्व बतलाते हैं—
तज्जः संस्कारोऽन्यसंस्कारप्रतिबन्धी ॥५०॥
'उससे उत्पन्न होनेवाला संस्कार दूसरे संस्कारोंका बाध करनेवाला होता है।'
व्याख्या—मनुष्य जिस किसी भी वस्तुका अनुभव करता है, जो कुछ भी क्रिया करता है, उन सबके संस्कार अन्तःकरणमें इकट्ठे हुए रहते हैं, इन्हींको योगशास्त्रमें कर्माशय (योग० २। १२)
समाधिपाद-१ ३९
के नामसे कहा है । ये ही मनुष्यको संसारचक्रमें भटकानेवाले मुख्य कारण हैं ( योग० २ । १३ ) ; इनके नाशसे ही मनुष्य मुक्तिलाभ कर सकता है । अतः उक्त बुद्धिका महत्त्व प्रकट करते हुए सूत्रकार कहते हैं कि इस बुद्धिके प्रकट होनेपर जब मनुष्यको प्रकृतिके यथार्थ रूपका भान हो जाता है, तब उसका प्रकृतिमें और उसके कार्योंमें स्वभावसे ही वैराग्य हो जाता है । उस वैराग्यके संस्कार पूर्व इकट्ठे हुए सब प्रकारके राग-द्वेषमय संस्कारोंका नाश कर डालते हैं, इससे योगी शीघ्र ही मुक्तावस्थाके समीप पहुँच जाता है ॥५०॥
सम्बन्ध—अब निर्बीज समाधिरूप कैवल्य-अवस्थाका वर्णन करते हुए इस पादकी समाप्ति करते हैं—
तस्यापि निरोधे सर्वनिरोधान्निर्बीजः समाधिः ॥५१॥
'उसका भी निरोध हो जानेपर सबका निरोध हो जानेके कारण निर्बीज समाधि हो जाती है ।'
व्याख्या—जब ऋतम्भरा प्रज्ञाजनित संस्कारके प्रभावसे अन्य सब प्रकारके संस्कारोंका अभाव हो जाता है; उसके बाद उस ऋतम्भरा प्रज्ञासे उत्पन्न संस्कारोंमें भी आसक्ति न रहनेके कारण उनका भी निरोध हो जाता है । उनका निरोध होते ही समस्त संस्कारोंका निरोध अपने-आप हो जाता है । अतः संसारके बीजका सर्वथा अभाव हो जानेसे इस अवस्थाका नाम निर्बीज समाधि है । इसीको कैवल्य-अवस्था भी कहते हैं ॥५१॥
ॐ श्रीपरमात्मने नमः
साधनपाद-२
पहले पादमें योगका स्वरूप, उसके भेद और उसके फलका संक्षेपमें वर्णन किया गया। साथ ही उसके उपायभूत अभ्यास और वैराग्यका तथा ईश्वरप्रणिधान आदि दूसरे साधनोंका भी वर्णन किया गया। किन्तु उसमें बतलायी हुई रीतिसे निर्बीज समाधि वही साधक प्राप्त कर सकता है, जिसका अन्तःकरण स्वभावसे ही शुद्ध है एवं जो योगसाधनामें तत्पर है। अतः अब साधारण साधकोंके लिये क्रमशः अन्तःकरणकी शुद्धिपूर्वक निर्बीज समाधि प्राप्त करनेका उपाय बतलानेके लिये साधनपाद नामक दूसरे पादका आरम्भ किया जाता है—
तपःस्वाध्यायेश्वरप्रणिधानानि क्रियायोगः ॥ १ ॥
‘तप, स्वाध्याय और ईश्वर-शरणागति—ये तीनों क्रिया-योग हैं।’
**व्याख्या—(१) तप—**अपने वर्ण, आश्रम, परिस्थिति और योग्यताके अनुसार स्वधर्मका पालन करना और उसके पालनमें जो शारीरिक या मानसिक अधिक-से-अधिक कष्ट प्राप्त हो, उसे सहर्ष सहन करना—इसका नाम ‘तप’ है। व्रत, उपवास आदि भी इसीमें आ जाते हैं। निष्कामभावसे इस तपका पालन करनेसे मनुष्यका अन्तःकरण अनायास ही शुद्ध हो जाता है; यह गीतोक्त कर्मयोगका ही अङ्ग है।
साधनपाद-२
४१
( २ ) स्वाध्याय—जिनसे अपने कर्तव्य-अकर्तव्यका बोध हो सके, ऐसे वेद, शास्त्र, महापुरुषोंके लेख आदिका पठन-पाठन और भगवान्के ॐकार आदि किसी नामका या गायत्रीका और किसी भी इष्टदेवताके मन्त्रका जप करना 'स्वाध्याय' है।
( ३ ) ईश्वर-प्रणिधान—ईश्वरके शरणापन्न हो जानेका नाम 'ईश्वर-प्रणिधान' है। उसके नाम, रूप, लीला, धाम, गुण और प्रभाव आदिका श्रवण, कीर्तन और मनन करना, समस्त कर्मोंको भगवान्के समर्पण कर देना, अपनेको भगवान्के हाथका यन्त्र बनाकर जिस प्रकार वह नचावे, वैसे ही नाचना, उसकी आज्ञाका पालन करना, उसीमें अनन्य प्रेम करना—ये सभी ईश्वर-प्रणिधानके अङ्ग हैं।
यद्यपि तप, स्वाध्याय और ईश्वर-प्रणिधान—ये तीनों ही यम, नियम आदि योगके अङ्गोंमें नियमोंके अन्तर्गत आ जाते हैं, तथापि इन तीनों साधनोंका विशेष महत्त्व और इनकी सुगमता दिखलानेके लिये पहले क्रियायोगके नामसे इनका अलग वर्णन किया गया है॥१॥
**सम्बन्ध—**उपर्युक्त क्रियायोगका फल बतलाते हैं—
समाधिभावनार्थः क्लेशतनूकरणार्थश्च ॥२॥
'(यह क्रियायोग) समाधिकी सिद्धि करनेवाला और अविद्यादि क्लेशोंको क्षीण करनेवाला है।'
**व्याख्या—**उपर्युक्त क्रियायोगके साधनसे साधकके अविद्यादि क्लेशोंका क्षय होकर उसको कैवल्य-अवस्थातक समाधिकी प्राप्ति हो सकती है ॥२॥
४२ पातञ्जलयोगदर्शन
सम्बन्ध—दूसरे सूत्रमें क्रियायोगका फल समाधिसिद्धि और क्लेशोंका क्षय बतलाया गया, उनमेंसे समाधिके लक्षण और फलका वर्णन तो पहले पादमें हो चुका; परन्तु क्लेश कितने हैं, उनके नाम क्या हैं, वे किस-किस अवस्थामें रहते हैं, उनका क्षय कैसे होता है और उनका नाश क्यों करना चाहिये—इन सब बातोंका वर्णन नहीं हुआ। अतः प्रसङ्गानुसार इस प्रकरणका आरम्भ करते हैं—
अविद्यास्मितारागद्वेषाभिनिवेशाः क्लेशाः ॥३॥
‘अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष और अभिनिवेश (ये पाँचों) क्लेश हैं।’
व्याख्या—ये अविद्यादि पाँचों ही जीवमात्रको संसारचक्रमें घुमानेवाले महादुःखदायक हैं, इस कारण सूत्रकारने इनका नाम ‘क्लेश’ रक्खा है।
कितने टीकाकारोंका तो कहना है कि ये पाँचों क्लेश पाँच प्रकारका विपर्ययज्ञान है। कुछ इनमेंसे केवल अविद्या और विपर्ययवृत्तिकी ही एकता करते हैं। किन्तु ये दोनों बातें ही युक्ति-सङ्गत नहीं मालूम होतीं; क्योंकि प्रमाणवृत्तिमें विपर्ययवृत्तिका अभाव है, पर अविद्यादि पाँचों क्लेश वहाँ भी विद्यमान रहते हैं। ऋतम्भरा प्रज्ञामें विपर्ययका लेश भी नहीं स्वीकार किया जा सकता, परन्तु जिस अविद्यारूप क्लेशको द्रष्टा और दृश्यके संयोगका हेतु माना गया है, वह तो वहाँ भी रहता ही है; अन्यथा संयोगके अभावसे हेयका नाश होकर साधकको उसी क्षण कैवल्य-अवस्थाकी प्राप्ति हो
साधनपाद-२ ४३
जानी चाहिये थी। इसके सिवा एक बात और भी है। इस ग्रन्थमें कैवल्य-स्थितिको प्राप्त सिद्ध योगीके कर्म अशुक्ल और अकृष्ण अर्थात् पुण्य-पापके संस्कारोंसे रहित माने गये हैं ( योग० ४ । ७ ) इससे यह सिद्ध होता है कि जीवन्मुक्त योगीद्वारा भी कर्म अवश्य किये जाते हैं। तब यह भी मानना पड़ेगा कि व्युत्थान-अवस्थामें जब वह कर्म करता है तो विपर्यय वृत्तिका प्रादुर्भाव भी स्वाभाविक होता है; क्योंकि पाँचों ही वृत्तियाँ चित्तका धर्म है और व्युत्थान-अवस्थामें चित्त विद्यमान रहता है, यह स्वीकार करना ही पड़ेगा। किन्तु जीवन्मुक्त योगीमें अविद्या भी रहती है, यह नहीं माना जा सकता; क्योंकि यदि अविद्या वर्तमान है तो वह जीवन्मुक्त ही कैसा ? इसी तरह और भी बहुत-से कारण हैं ( देखिये योग० १ । ८ की टीका ), जिनसे विपर्यय और अविद्याकी एकता माननेमें सिद्धान्तकी हानि होती है। अतः विद्वान् सज्जनोंको इसपर विचार करना चाहिये ॥३॥
**सम्बन्ध—**अब क्लेशोंकी अवस्थाके भेद बतलाते हुए यह बात कहते हैं कि इन सबका मूल कारण अविद्यारूप क्लेश है—
अविद्या क्षेत्रमुत्तरेषां प्रसुप्ततनुविच्छिन्नोदाराणाम् ॥४॥
‘जो प्रसुप्त, तनु, विच्छिन्न और उदार—( इस प्रकार चार ) अवस्थाओंमें ( वर्तमान ) रहनेवाले हैं एवं जिनका वर्णन ( तीसरे सूत्रमें ) अविद्याके बाद किया गया है, उन ( अस्मितादि चारों क्लेशों ) का कारण अविद्या है।’
**व्याख्या—( १ ) प्रसुप्त—**चित्तमें विद्यमान रहते हुए भी जिस समय
४४ पातञ्जलयोगदर्शन
जो क्लेश अपना कार्य नहीं करता, उस समय उसे 'प्रसुप्त' कहा जाता है। प्रलयकाल और सुषुप्तिमें चारों ही क्लेशोंकी प्रसुप्त-अवस्था रहती है।
(२) तनु—क्लेशोंमें जो कार्य करनेकी शक्ति है, उसका जब योगके साधनोंद्वारा हास कर दिया जाता है, तब वे हीनशक्तिवाले क्लेश 'तनु' कहलाते हैं। देखनेमें भी आता है कि ये राग-द्वेषादि क्लेश साधारण मनुष्योंकी भाँति साधकोंपर अपना आधिपत्य नहीं जमा सकते अर्थात् साधारण मनुष्योंकी अपेक्षा साधकोंपर उनका प्रभाव बहुत कम पड़ता है।
(३) विच्छिन्न—जब कोई क्लेश उदार होता है, उस समय दूसरा क्लेश दब जाता है, वह उसकी 'विच्छिन्नावस्था' है। जैसे रागकी उदार अवस्थाके क्षणमें द्वेष दब जाता है और द्वेषकी उदार अवस्थाके क्षणमें राग दबा रहता है।
(४) उदार—जिस समय जो क्लेश अपना कार्य पूर्णतया कर रहा हो, उस समय वही 'उदार' कहलाता है।
उपर्युक्त पाँच क्लेशोंमेंसे अस्मितादि चार क्लेशोंके ही प्रसुप्तादि चार अवस्थाभेद बतलाये गये हैं, अविद्याके नहीं; क्योंकि वह अन्य चारोंकी कारण है, उसके नाशसे सबका सदाके लिये समूल नाश हो जाता है ॥४॥
**सम्बन्ध—**अब अविद्याका स्वरूप बतलाते हैं—
अनित्याशुचिदुःखानात्मसु नित्यशुचिसुखात्म-ख्यातिरविद्या ॥५॥
साधनपाद-२ ४५
'अनित्य, अपवित्र, दुःख और अनात्मामें नित्य, पवित्र, सुख और आत्मभावकी प्रतीति ही 'अविद्या' है।'
व्याख्या—इस लोक और परलोकके समस्त भोग और भोगोंका आयतन यह मनुष्य-शरीर भी अनित्य है, इस बातको प्रत्यक्षादि प्रमाणोंद्वारा समझकर भी जिसके प्रभावसे मनुष्य उनमें नित्यत्वबुद्धि करके राग-द्वेषादि कर लेता है, यह अनित्यमें नित्यकी अनुभूतिरूप अविद्या है।
इसी प्रकार हाड़, मांस, मज्जा आदि अपवित्र धातुओंके समुदायरूप अपने और स्त्री आदिके शरीरोंको प्रत्यक्षादि प्रमाणोंद्वारा अपवित्र समझते हुए भी जिसके कारण मनुष्य अपने शरीरमें पवित्रताका अभिमान करता है और स्त्री-पुत्र आदिके शरीरोंसे प्यार करता है, यह अपवित्रमें पवित्रकी अनुभूतिरूप अविद्या है।
वैसे ही प्रत्यक्षादि प्रमाणोंद्वारा विचार करनेपर सभी भोग दुःखरूप हैं—यह बात विचारशील साधकके समझमें आ जाती है (योग० २।१५)। इसपर भी मनुष्य उन भोगोंको सुखदायक समझकर उनके भोगनेमें प्रवृत्त हुआ रहता है, यही दुःखमें सुखकी अनुभूतिरूप अविद्या है।
तथा जड शरीर आत्मा नहीं है, यह बात थोड़ा-सा विचार करते ही समझमें आ जाती है, तथापि मनुष्य इसीको अपना स्वरूप माने रहता है, 'आत्मा इससे सर्वथा असङ्ग और चेतन है'—इस बातको अनुभव नहीं कर सकता, इसका नाम अनात्मामें आत्मभावकी अनुभूतिरूप अविद्या है।
| ४६ | पातञ्जलयोगदर्शन |
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प्रत्यक्ष, अनुमान और आगम प्रमाणसे वस्तुस्थितिका सामान्य ज्ञान हो जानेपर विपर्ययवृत्ति नहीं रहती, तो भी अविद्याका नाश नहीं होता; इससे यह सिद्ध होता है कि चित्तकी विपर्ययवृत्तिका नाम अविद्या नहीं है ॥५॥
सम्बन्ध—अब अस्मिताका स्वरूप बतलाते हैं—
दृग्दर्शनशक्त्योरेकात्मतेवास्मिता ॥६॥
'दृक्-शक्ति और दर्शनशक्ति-इन दोनोंका एकरूप-सा हो जाना 'अस्मिता' है।'
व्याख्या—दृक्-शक्ति अर्थात् द्रष्टा पुरुष और दर्शन-शक्ति अर्थात् बुद्धि—ये दोनों सर्वथा भिन्न और विलक्षण हैं। द्रष्टा चेतन है और बुद्धि जड है। इनकी एकता हो ही नहीं सकती। तथापि अविद्याके कारण दोनोंकी एकता-सी हो रही है (योग० २। २४)। इसीको द्रष्टा और दृश्यका संयोग कहते हैं। यही प्रकृति और पुरुषके स्वरूपकी उपलब्धिका हेतु माना गया है (योग० २। २३)। इस संयोगके रहते हुए ही पुरुष और बुद्धिका भिन्न-भिन्न स्वरूप विचारके द्वारा समझमें आता है, परन्तु जबतक निर्बीज समाधिद्वारा अविद्याका सर्वथा नाश नहीं कर दिया जाता, तबतक संयोगका अभाव नहीं होता। इस कारण इनके शुद्ध स्वरूपका अनुभव नहीं होता। अतः साधकको चाहिये कि तत्परतासे उत्साहपूर्वक योग-साधनमें लगकर शीघ्र ही अविद्याके नाशद्वारा संयोगरूप अस्मिता नामक क्लेशका नाश कर दे और कैवल्य-स्थितिको प्राप्त कर ले।६।
२. द्वितीय पाद — साधनपाद (सूत्र १-५५)
साधनपाद-२ ४७
सम्बन्ध—अब राग नामक क्लेशका स्वरूप बतलाते हैं—
सुखानुशयी रागः ॥७॥
‘सुखकी प्रतीतिके पीछे रहनेवाला क्लेश ‘राग’ है।’
व्याख्या—प्रकृतिस्थ जीवको जब कभी जिस किसी अनुकूल पदार्थमें सुखकी प्रतीति हुई है या होती है, उसमें और उसके निमित्तोंमें उसकी आसक्ति (प्रीति) हो जाती है, उसीको ‘राग’ कहते हैं। अतः इस राग नामक क्लेशको सुखकी प्रतीतिके साथ-साथ रहनेवाला कहा गया है ॥७॥
सम्बन्ध—द्वेष नामक क्लेशका स्वरूप बतलाते हैं—
दुःखानुशयी द्वेषः ॥८॥
‘दुःखकी प्रतीतिके पीछे रहनेवाला क्लेश ‘द्वेष’ है।’
व्याख्या—मनुष्यको जब कभी जिस किसी प्रतिकूल पदार्थमें दुःखकी प्रतीति हुई है या होती है, उसमें और उसके निमित्तोंमें उसका द्वेष हो जाता है; अतः यह द्वेषरूप क्लेश दुःखकी प्रतीति-के पीछे यानी साथ-साथ रहनेवाला है ॥८॥
सम्बन्ध—अब अभिनिवेश नामक क्लेशका स्वरूप बतलाते हैं—
स्वरसवाही विदुषोऽपि तथारूढोऽभिनिवेशः ॥९॥
‘जो परम्परागत स्वभावसे चला आ रहा है एवं जो मूढ़ों-की भाँति विवेकशील पुरुषोंमें भी विद्यमान देखा जाता है, वह (मरणभयरूप) क्लेश ‘अभिनिवेश’ है।’
४८ पातञ्जलयोगदर्शन
**व्याख्या—**यह मरणभयरूप क्लेश सभी प्राणियोंमें अनादि-कालसे स्वाभाविक है; अतः कोई भी जीव यह नहीं चाहता कि मैं न रहूँ, सभी अपनी विद्यमानता चाहते हैं। एक छोटे-से-छोटा कीट भी मरणसे डरकर अपनी रक्षाका उपाय करता है। (इससे पूर्वजन्मकी सिद्धि होती है; क्योंकि यदि मरण-दुःख पहले अनुभव किया हुआ नहीं होता तो उसका भय कैसे होता?) यह मरणभय जीवोंके अन्तःकरणमें इतना गहरा बैठा हुआ है कि मूर्खके जैसा ही विवेकशीलपर भी इसका प्रभाव पड़ता है; इसीलिये इसका नाम 'अभिनिवेश' अर्थात् 'अत्यन्त गहराईमें प्रविष्ट' रक्खा गया है ॥९॥
**सम्बन्ध—**इन पाँच प्रकारके क्लेशोंको तनु अर्थात् सूक्ष्म बना देनेका उपाय—'क्रियायोग' पहले बतला चुके। क्रियायोगके द्वारा सूक्ष्म किये हुए क्लेशोंका नाश किस उपायसे करना चाहिये, यह बात अगले सूत्रमें बतलाते हैं—
ते प्रतिप्रसवहेयाः सूक्ष्माः ॥१०॥
'वे सूक्ष्मावस्थाको प्राप्त क्लेश चित्तको अपने कारणमें विलीन करनेके साधनद्वारा विनष्ट करनेयोग्य हैं।'
**व्याख्या—**क्रियायोग या ध्यानयोगद्वारा सूक्ष्म किये हुए क्लेशोंका नाश निर्बीज समाधिके द्वारा चित्तको उसके कारणमें विलीन करके करना चाहिये, क्योंकि क्रियायोग या ध्यानद्वारा क्षीण कर दिये जानेपर भी जो लेशमात्र क्लेश शेष रह जाते हैं, उनका नाश द्रष्टा और दृश्यके संयोगका अभाव होनेपर ही होता है, उसके पहले क्लेशोंका सर्वथा नाश नहीं होता, यह भाव है ॥१०॥
साधनपाद-२ ४९
सम्बन्ध—अब क्लेशोंके क्षयका क्रियायोगसे अतिरिक्त दूसरा साधन बतलाते हैं—
ध्यानहेयास्तद्वृत्तयः ॥११॥
'उन क्लेशोंकी जो ( स्थूल ) वृत्तियाँ हैं, उनका नाश ध्यानके द्वारा करना चाहिये।'
व्याख्या—उन क्लेशोंकी जो स्थूल वृत्तियाँ हैं, उनका यदि पूर्वोक्त क्रियायोगके द्वारा नाश करके उन क्लेशोंको सूक्ष्म नहीं बना दिया गया हो तो पहले ध्यानके द्वारा उनकी स्थूल वृत्तियोंका नाश करके उनको सूक्ष्म बना लेना चाहिये, तभी निर्बीज समाधिकी सिद्धि सुगमतासे हो सकेगी और उससे क्लेशोंका सर्वथा अभाव हो जायगा ॥११॥
सम्बन्ध—उपर्युक्त क्लेश किस प्रकार जीवके महान् दुःखोंके कारण हैं, इस बातको स्पष्ट करनेके लिये अगला प्रकरण आरम्भ किया जाता है—
क्लेशमूलः कर्माशयो दृष्टादृष्टजन्मवेदनीयः ॥१२॥
'क्लेशमूलक कर्मसंस्कारोंका समुदाय दृष्ट ( वर्तमान ) और अदृष्ट ( भविष्यमें होनेवाले ) दोनों प्रकारके ही जन्मोंमें भोगा जानेवाला है।'
व्याख्या—कर्मोंके संस्कारोंकी जड़ उपर्युक्त पाँचों क्लेश ही है। अविद्यादि क्लेशोंके न रहनेपर किये हुए कर्मोंसे कर्माशय नहीं बनता; बल्कि वैसे रागद्वेषरहित निष्काम कर्म तो पूर्वसञ्चित कर्माशयका भी नाश करनेवाले होते हैं ( गीता ४।२३ )। यह
पा० यो० द० ४--
५० पातञ्जलयोगदर्शन
क्लेशमूलक कर्माशय जिस प्रकार इस जन्ममें दुःख देता है, उसी प्रकार भविष्यमें होनेवाले जन्मोंमें भी दुःखदायक है। अतः साधकको इसकी जड़ काट डालनी चाहिये अर्थात् पूर्वोक्त क्लेशोंका सर्वथा नाश कर देना चाहिये ॥१२॥
**सम्बन्ध—**उक्त कर्माशयका फल कबतक मिलता रहता है और वह क्या है, इसको स्पष्ट करते हैं—
सति मूले तद्विपाको जात्यायुर्भोगाः ॥१३॥
'मूलके विद्यमान रहनेतक उस (कर्माशय) का परिणाम पुनर्जन्म, आयु और भोग होता रहता है।'
**व्याख्या—**जबतक क्लेशरूप जड़ विद्यमान रहती है, तबतक इस कर्मोंके संस्कारसमुदायरूप कर्माशयका विपाक यानी परिणाम—बार-बार अच्छी-बुरी योनियोंमें जन्म होना, वहाँपर निश्चित आयुतक जीते रहकर फिर मरणदुःखको भोगना और जीवनावस्थामें जो विवेक-दृष्टिसे सभी दुःखरूप है, ऐसे भोगका सम्बन्ध होना—ऐसे तीन प्रकारका होता रहता है ॥१३॥
**सम्बन्ध—**वे जाति, आयु और भोगरूप परिणाम किस प्रकारके होते हैं, यह बतलाते हैं—
ते ह्लादपरितापफलाः पुण्यापुण्यहेतुत्वात् ॥१४॥
'वे (जन्म, आयु और भोग अपने कारणके अनुरूप) हर्ष और शोकरूप फलको देनेवाले होते हैं; क्योंकि उनके पुण्यकर्म और पापकर्म—दोनों ही कारण हैं।'
**व्याख्या—**जो जन्म पुण्यकर्मका परिणाम है, वह सुखदायक
साधनपाद-२ ५१
होता है और जो पापकर्मका परिणाम है, वह दुःखदायक होता है। इसी प्रकार आयुका जितना समय शुभकर्मका परिणाम है, उतना समय सुखदायक होता है और जितना पापकर्मका परिणाम है, उतना दुःखदायक होता है। वैसे ही जो-जो भोग अर्थात् सांसारिक मनुष्योंके, अन्य प्राणियोंके, पदार्थोंके और क्रिया एवं परिस्थिति आदिके संयोग-वियोग पुण्यकर्मके परिणाम होते हैं, वे हर्षप्रद होते हैं और जो पापकर्मके परिणाम होते हैं, वे शोकप्रद होते हैं॥१४॥
**सम्बन्ध—**यहाँ यह शङ्का हो सकती है कि यदि यही बात है, तब तो केवल दुःखप्रद फल (जन्म, आयु और भोग) जिसका परिणाम है, ऐसे ही कर्माशयका नाश उसके मूलसहित करना चाहिये, न कि सुखप्रद कर्माशयका भी उसके साथ नाश करना उचित है। इसपर कहते हैं—
परिणामतापसंस्कारदुःखैर्गुणवृत्तिविरोधाच्च
दुःखमेव सर्वं विवेकिनः ॥१५॥
‘परिणामदुःख, तापदुःख और संस्कारदुःख—ऐसे तीन प्रकारके दुःख सबमें विद्यमान रहनेके कारण और तीनों गुणोंकी वृत्तियोंमें परस्पर विरोध होनेके कारण विवेकीके लिये सब-के-सब (कर्मफल) दुःखरूप ही हैं।’
व्याख्या— (१) परिणामदुःख— जो ‘कर्मविपाक’ भोगकालमें स्थूल दृष्टिसे सुखप्रद प्रतीत होता है, उसका भी परिणाम (नतीजा) दुःख ही है। जैसे, स्त्रीप्रसङ्गके समय मनुष्यको सुख भासता है, परंतु उसका परिणाम बल, वीर्य, तेज, स्मृति आदिका ह्रास प्रत्यक्ष
५२ पातञ्जलयोगदर्शन
देखनेमें आता है; ऐसे ही दूसरे भोगोंमें भी समझ लेना चाहिये।*
भोगोंको भोगते-भोगते मनुष्य थक जाता है, उन्हें भोगनेकी शक्ति उसमें नहीं रहती; परंतु तृष्णा बनी रहती है, इससे वह भोगरूप सुख भी दुःख ही है। यह भोगके अन्तमें अनुभव होनेवाला दुःख भी परिणामदुःखकी ही गणनामें है।
इन्द्रियों और पदार्थोंके सम्बन्धसे जब मनुष्यको किसी भी प्रकारके भोगमें सुखकी प्रतीति होती है, तब उसमें राग—आसक्ति अवश्य हो जाती है। इसलिये वह सुख रागरूप क्लेशसे मिला हुआ है। आसक्तिवश मनुष्य उस भोगकी प्राप्तिके साधनरूप पुण्य-पापका आरम्भ भी करेगा ही। उसकी प्राप्तिमें असमर्थ होनेसे या विघ्न आनेपर द्वेष होना भी अवश्यम्भावी है। इसके सिवा, प्राणियोंकी हिंसाके बिना भोगकी सिद्धि भी नहीं होती। अतः राग, द्वेष और हिंसादिका परिणाम अवश्य ही दुःख है। यह भी परिणाम-दुःखता है।
(२) तापदुःख—सभी प्रकारके भोगरूप सुख विनाशशील हैं, उनसे वियोग होना निश्चित है, अतः भोगकालमें उनके विनाशकी सम्भावनासे तापदुःख बना रहता है। इसी तरह मनुष्य-
* गीतामें भी कहा है—
विषयेन्द्रियसंयोगाद्यत्तदग्रेऽमृतोपमम् ।
परिणामे विषमिव तत्सुखं राजसं स्मृतम् ॥ (१८ । ३८)
'जो सुख विषय और इन्द्रियोंकें संयोगसे होता है, वह यद्यपि भोगकालमें अमृतके सदृश भासता है, परन्तु 'परिणाममें विषके सदृश है, इसलिये वह सुख राजस कहा गया है।'
साधनपाद-२ ५३
को जो सुखकारक भोग प्राप्त होते हैं, वे सातिशय ही होते हैं; अर्थात् उसे जो कुछ प्राप्त है, उससे बढ़कर दूसरोंको भी प्राप्त है, यह देखकर वह ईर्ष्यासे जलता रहता है, यह भी तापदुःख है। तथा भोगकी अपूर्णतासे भी भोगकालमें संताप बना रहता है, यह भी तापदुःख है।
(३) संस्कारदुःख—जिन-जिन भोगोंमें मनुष्यको सुखका अनुभव होता है, उस अनुभवके संस्कार उसके हृदयमें जम जाते हैं। जब उन भोगसामग्रियोंसे उसका वियोग हो जाता है, तब वे संस्कार पहलेके सुखभोगकी स्मृतिद्वारा महान् दुःखके हेतु हो जाते हैं। देखनेमें भी आता है कि जब किसी मनुष्यकी स्त्री, पुत्र, धन, मकान आदि भोगसामग्री नष्ट हो जाती है, तब वह उनको याद कर-करके रोता रहता है कि मेरी स्त्री मुझे अमुक-अमुक प्रकारसे सुख देती थी, मेरे पास इतना धन था, मैं अपने धनसे स्वयं सुख भोगता था और लोगोंको सुख पहुँचाता था; आज मेरी यह दशा है कि मैं भिखारी होकर लोगोंसे सहायता माँगता फिरता हूँ—इत्यादि। इसके सिवा, वे भोग-संस्कार भोगासक्तिकी वृद्धिमें कारण होनेसे जन्मान्तरमें भी दुःखके हेतु हैं।
(४) गुणवृत्तिविरोध—गुणोंके कार्यका नाम गुणवृत्ति है, इनके कार्यमें परस्पर अत्यन्त विरोध है। जैसे सत्त्वगुणका कार्य प्रकाश, ज्ञान और सुख है, तो तमोगुणका कार्य अन्धकार, अज्ञान और दुःख है। इस प्रकार इनके कार्योंमें विरोध होनेके कारण दुविधा बनी रहती है; सुख-भोगकालमें भी शान्ति नहीं मिलती। क्योंकि तीनों गुण एक साथ रहनेवाले हैं। सुखके अनुभवकालमें सत्त्वगुणकी,
५४ पातञ्जलयोगदर्शन
प्रधानता रहते हुए भी रजोगुण और तमोगुणका अभाव नहीं हो जाता, अतः उस समय भी दुःख और शोक विद्यमान रहते हैं, इसलिये भी वह दुःख ही है। जैसे ध्यानकालमें और सत्सङ्ग करते समय सत्त्वगुणकी प्रधानता रहती है, अतः सात्त्विक सुख होता है, परंतु वहाँ भी सांसारिक स्फुरणा और तन्द्रा उस सुखमें विघ्न कर देते हैं; ऐसे ही अन्य सब कामोंमें भी समझ लेना चाहिये।
उपर्युक्त परिणामदुःख, तापदुःख और संस्कारदुःख तथा गुणवृत्तियोंके विरोधसे होनेवाले दुःखको विचारद्वारा विवेकी पुरुष समझता है। इस कारण उसकी दृष्टिमें सभी 'कर्मविपाक' दुःखरूप ही हैं अर्थात् साधारण मनुष्य-समुदाय जिन भोगोंको सुखरूप समझता है, विवेकीके लिये वे भी दुःख ही हैं* ॥१५॥
**सम्बन्ध—**उपर्युक्त वर्णनसे यह सिद्ध हो गया कि जन्म, आयु और भोगरूप सभी कर्म-विपाक दुःखरूप हैं; इसलिये उनका मूलसहित उच्छेद करना मनुष्यका कर्तव्य है। अतः अब उनको त्याज्य (नाश करने योग्य) बतलाकर उनसे मुक्ति पानेका उपाय बतलाते हुए अगला प्रकरण आरम्भ करते हैं—
* यह बात गीताके पाँचवें अध्यायके बाईसवें श्लोकमें इस प्रकार कही है—
ये हि संस्पर्शजा भोगा दुःखयोनय एव ते।
आद्यन्तवन्तः कौन्तेय न तेषु रमते बुधः॥
'अर्थात् इन्द्रिय और विषयोंके संयोगसे उत्पन्न होनेवाले जितने भी भोग हैं, वे सब-के-सब दुःखोंके ही कारण हैं तथा सभी आदि और अन्तवाले हैं, अतः विवेकी मनुष्य उनमें नहीं रमता।'
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साधनपाद-२
हेयं दुःखमनागतम् ॥१६॥
‘आनेवाला दुःख हेय (नष्ट करने योग्य) है।’
व्याख्या—वर्तमान जन्मके पहले जो अनेक योनियोंमें दुःख भोगे जा चुके, वे तो अपने-आप समाप्त हो गये, उनके विषयमें कोई विचार नहीं करना है। तथा जो वर्तमान हैं, वे भी भोग देकर दूसरे क्षणमें अपने-आप लुप्त हो जायँगे, उनके लिये भी उपायकी आवश्यकता नहीं है। परंतु जो दुःख अभीतक प्राप्त नहीं हुए हैं, भविष्यमें होनेवाले हैं, उनका नाश उपायद्वारा अवश्यकर्तव्य है; इसलिये उन्हींको ‘हेय’ बतलाया गया है ॥१६॥
सम्बन्ध—जिसका नाश करना हो, उसके मूल कारणको जाननेकी आवश्यकता है, क्योंकि मूल कारणके नाशसे ही उसका पूर्णतया नाश हो सकता है; नहीं तो वह पुनः उत्पन्न हो सकता है। अतः उक्त ‘हेय’का हेतु (कारण) बतलाते हैं—
द्रष्टृदृश्ययोः संयोगो हेयहेतुः ॥१७॥
‘द्रष्टा और दृश्यका संयोग (उक्त) हेयका कारण है।’
व्याख्या—ऊपर जो नाश करनेयोग्य आनेवाले दुःख बतलाये गये हैं, उनका मूल कारण द्रष्टा और दृश्यका अर्थात् पुरुष और प्रकृतिका संयोग यानी जड-चेतनकी ग्रन्थि है। अतः इस संयोगका नाश कर देनेसे मनुष्य सर्वथा दुःखोंसे निवृत्त हो सकता है ॥१७॥
सम्बन्ध—पूर्वसूत्रमें द्रष्टा, दृश्य और उनका संयोग—इन तीनके नाम आये हैं, उनमेंसे पहले दृश्यका स्वभाव, स्वरूप और प्रयोजन बतलाते हैं—
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प्रकाशक्रियास्थितिशीलं भूतेन्द्रियात्मकं
भोगापवर्गार्थं दृश्यम् ॥१८॥
‘प्रकाश, क्रिया और स्थिति जिसका स्वभाव है, भूत और इन्द्रियाँ जिसका (प्रकट) स्वरूप है, (पुरुषके लिये) भोग और मुक्तिका संपादन करना ही जिसका प्रयोजन है, ऐसा दृश्य है।’
व्याख्या—सत्त्व, रज और तम—ये तीनों गुण और इनका कार्य जो कुछ भी देखने, सुनने और समझनेमें आता है, वह सब-का-सब दृश्यके अन्तर्गत है। सत्त्वगुणका मुख्य धर्म प्रकाश है, रजोगुणका मुख्य धर्म क्रिया (हलचल) है और तमोगुणका मुख्य धर्म स्थिति अर्थात् जडता और सुषुप्ति आदि है। इन तीनों गुणोंकी साम्यावस्थाको ही प्रधान या प्रकृति कहते हैं, यह सांख्यका मत है। अतः सब अवस्थाओंमें अनुगत तीनों गुणोंका जो प्रकाश, क्रिया और स्थितिरूप स्वभाव है, वही दृश्यका स्वभाव है।
पाँच स्थूल भूत, पाँच तन्मात्रा, पाँच कर्मेन्द्रियाँ, पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ एवं मन, बुद्धि और अहंकार—ये सब (तेईस तत्त्व) प्रकृतिके कार्य होनेसे उसके स्वरूप हैं।
भोगासक्त पुरुषको अपना स्वरूप दिखलाकर भोग प्रदान करना और मुक्ति चाहनेवाले योगीको द्रष्टाका स्वरूप दिखलाकर मुक्ति प्रदान करना दृश्यका प्रयोजन है। द्रष्टाको उसका निज स्वरूप दिखा देनेके बाद इसका कोई प्रयोजन नहीं रहता, उस पुरुषके लिये यह अस्त् (लुप्त) हो जाता है॥१८॥