भारतकोश
पातञ्जल योगदर्शन (भाष्य सहित)

पातञ्जल योगदर्शन (भाष्य सहित)

Patanjali Yoga Darshan

महर्षि पतञ्जलि / हरिकृष्णदास गोयन्दका द्वारा

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साधनपाद-२ ४९

सम्बन्ध—अब क्लेशोंके क्षयका क्रियायोगसे अतिरिक्त दूसरा साधन बतलाते हैं—

ध्यानहेयास्तद्वृत्तयः ॥११॥

'उन क्लेशोंकी जो ( स्थूल ) वृत्तियाँ हैं, उनका नाश ध्यानके द्वारा करना चाहिये।'

व्याख्या—उन क्लेशोंकी जो स्थूल वृत्तियाँ हैं, उनका यदि पूर्वोक्त क्रियायोगके द्वारा नाश करके उन क्लेशोंको सूक्ष्म नहीं बना दिया गया हो तो पहले ध्यानके द्वारा उनकी स्थूल वृत्तियोंका नाश करके उनको सूक्ष्म बना लेना चाहिये, तभी निर्बीज समाधिकी सिद्धि सुगमतासे हो सकेगी और उससे क्लेशोंका सर्वथा अभाव हो जायगा ॥११॥

सम्बन्ध—उपर्युक्त क्लेश किस प्रकार जीवके महान् दुःखोंके कारण हैं, इस बातको स्पष्ट करनेके लिये अगला प्रकरण आरम्भ किया जाता है—

क्लेशमूलः कर्माशयो दृष्टादृष्टजन्मवेदनीयः ॥१२॥

'क्लेशमूलक कर्मसंस्कारोंका समुदाय दृष्ट ( वर्तमान ) और अदृष्ट ( भविष्यमें होनेवाले ) दोनों प्रकारके ही जन्मोंमें भोगा जानेवाला है।'

व्याख्या—कर्मोंके संस्कारोंकी जड़ उपर्युक्त पाँचों क्लेश ही है। अविद्यादि क्लेशोंके न रहनेपर किये हुए कर्मोंसे कर्माशय नहीं बनता; बल्कि वैसे रागद्वेषरहित निष्काम कर्म तो पूर्वसञ्चित कर्माशयका भी नाश करनेवाले होते हैं ( गीता ४।२३ )। यह

पा० यो० द० ४--