पातञ्जल योगदर्शन (भाष्य सहित)
Patanjali Yoga Darshan
महर्षि पतञ्जलि / हरिकृष्णदास गोयन्दका द्वारा
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**व्याख्या—**यह मरणभयरूप क्लेश सभी प्राणियोंमें अनादि-कालसे स्वाभाविक है; अतः कोई भी जीव यह नहीं चाहता कि मैं न रहूँ, सभी अपनी विद्यमानता चाहते हैं। एक छोटे-से-छोटा कीट भी मरणसे डरकर अपनी रक्षाका उपाय करता है। (इससे पूर्वजन्मकी सिद्धि होती है; क्योंकि यदि मरण-दुःख पहले अनुभव किया हुआ नहीं होता तो उसका भय कैसे होता?) यह मरणभय जीवोंके अन्तःकरणमें इतना गहरा बैठा हुआ है कि मूर्खके जैसा ही विवेकशीलपर भी इसका प्रभाव पड़ता है; इसीलिये इसका नाम 'अभिनिवेश' अर्थात् 'अत्यन्त गहराईमें प्रविष्ट' रक्खा गया है ॥९॥
**सम्बन्ध—**इन पाँच प्रकारके क्लेशोंको तनु अर्थात् सूक्ष्म बना देनेका उपाय—'क्रियायोग' पहले बतला चुके। क्रियायोगके द्वारा सूक्ष्म किये हुए क्लेशोंका नाश किस उपायसे करना चाहिये, यह बात अगले सूत्रमें बतलाते हैं—
ते प्रतिप्रसवहेयाः सूक्ष्माः ॥१०॥
'वे सूक्ष्मावस्थाको प्राप्त क्लेश चित्तको अपने कारणमें विलीन करनेके साधनद्वारा विनष्ट करनेयोग्य हैं।'
**व्याख्या—**क्रियायोग या ध्यानयोगद्वारा सूक्ष्म किये हुए क्लेशोंका नाश निर्बीज समाधिके द्वारा चित्तको उसके कारणमें विलीन करके करना चाहिये, क्योंकि क्रियायोग या ध्यानद्वारा क्षीण कर दिये जानेपर भी जो लेशमात्र क्लेश शेष रह जाते हैं, उनका नाश द्रष्टा और दृश्यके संयोगका अभाव होनेपर ही होता है, उसके पहले क्लेशोंका सर्वथा नाश नहीं होता, यह भाव है ॥१०॥