भारतकोश
पातञ्जल योगदर्शन (भाष्य सहित)

पातञ्जल योगदर्शन (भाष्य सहित)

Patanjali Yoga Darshan

महर्षि पतञ्जलि / हरिकृष्णदास गोयन्दका द्वारा

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साधनपाद-२ ४७

सम्बन्ध—अब राग नामक क्लेशका स्वरूप बतलाते हैं—

सुखानुशयी रागः ॥७॥

‘सुखकी प्रतीतिके पीछे रहनेवाला क्लेश ‘राग’ है।’

व्याख्या—प्रकृतिस्थ जीवको जब कभी जिस किसी अनुकूल पदार्थमें सुखकी प्रतीति हुई है या होती है, उसमें और उसके निमित्तोंमें उसकी आसक्ति (प्रीति) हो जाती है, उसीको ‘राग’ कहते हैं। अतः इस राग नामक क्लेशको सुखकी प्रतीतिके साथ-साथ रहनेवाला कहा गया है ॥७॥

सम्बन्ध—द्वेष नामक क्लेशका स्वरूप बतलाते हैं—

दुःखानुशयी द्वेषः ॥८॥

‘दुःखकी प्रतीतिके पीछे रहनेवाला क्लेश ‘द्वेष’ है।’

व्याख्या—मनुष्यको जब कभी जिस किसी प्रतिकूल पदार्थमें दुःखकी प्रतीति हुई है या होती है, उसमें और उसके निमित्तोंमें उसका द्वेष हो जाता है; अतः यह द्वेषरूप क्लेश दुःखकी प्रतीति-के पीछे यानी साथ-साथ रहनेवाला है ॥८॥

सम्बन्ध—अब अभिनिवेश नामक क्लेशका स्वरूप बतलाते हैं—

स्वरसवाही विदुषोऽपि तथारूढोऽभिनिवेशः ॥९॥

‘जो परम्परागत स्वभावसे चला आ रहा है एवं जो मूढ़ों-की भाँति विवेकशील पुरुषोंमें भी विद्यमान देखा जाता है, वह (मरणभयरूप) क्लेश ‘अभिनिवेश’ है।’