पातञ्जल योगदर्शन (भाष्य सहित)
Patanjali Yoga Darshan
महर्षि पतञ्जलि / हरिकृष्णदास गोयन्दका द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| ४६ | पातञ्जलयोगदर्शन |
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प्रत्यक्ष, अनुमान और आगम प्रमाणसे वस्तुस्थितिका सामान्य ज्ञान हो जानेपर विपर्ययवृत्ति नहीं रहती, तो भी अविद्याका नाश नहीं होता; इससे यह सिद्ध होता है कि चित्तकी विपर्ययवृत्तिका नाम अविद्या नहीं है ॥५॥
सम्बन्ध—अब अस्मिताका स्वरूप बतलाते हैं—
दृग्दर्शनशक्त्योरेकात्मतेवास्मिता ॥६॥
'दृक्-शक्ति और दर्शनशक्ति-इन दोनोंका एकरूप-सा हो जाना 'अस्मिता' है।'
व्याख्या—दृक्-शक्ति अर्थात् द्रष्टा पुरुष और दर्शन-शक्ति अर्थात् बुद्धि—ये दोनों सर्वथा भिन्न और विलक्षण हैं। द्रष्टा चेतन है और बुद्धि जड है। इनकी एकता हो ही नहीं सकती। तथापि अविद्याके कारण दोनोंकी एकता-सी हो रही है (योग० २। २४)। इसीको द्रष्टा और दृश्यका संयोग कहते हैं। यही प्रकृति और पुरुषके स्वरूपकी उपलब्धिका हेतु माना गया है (योग० २। २३)। इस संयोगके रहते हुए ही पुरुष और बुद्धिका भिन्न-भिन्न स्वरूप विचारके द्वारा समझमें आता है, परन्तु जबतक निर्बीज समाधिद्वारा अविद्याका सर्वथा नाश नहीं कर दिया जाता, तबतक संयोगका अभाव नहीं होता। इस कारण इनके शुद्ध स्वरूपका अनुभव नहीं होता। अतः साधकको चाहिये कि तत्परतासे उत्साहपूर्वक योग-साधनमें लगकर शीघ्र ही अविद्याके नाशद्वारा संयोगरूप अस्मिता नामक क्लेशका नाश कर दे और कैवल्य-स्थितिको प्राप्त कर ले।६।