पातञ्जल योगदर्शन (भाष्य सहित)
Patanjali Yoga Darshan
महर्षि पतञ्जलि / हरिकृष्णदास गोयन्दका द्वारा
पृष्ठ 66, कुल 184 में से
संदर्भ में पढ़ें५० पातञ्जलयोगदर्शन
क्लेशमूलक कर्माशय जिस प्रकार इस जन्ममें दुःख देता है, उसी प्रकार भविष्यमें होनेवाले जन्मोंमें भी दुःखदायक है। अतः साधकको इसकी जड़ काट डालनी चाहिये अर्थात् पूर्वोक्त क्लेशोंका सर्वथा नाश कर देना चाहिये ॥१२॥
**सम्बन्ध—**उक्त कर्माशयका फल कबतक मिलता रहता है और वह क्या है, इसको स्पष्ट करते हैं—
सति मूले तद्विपाको जात्यायुर्भोगाः ॥१३॥
'मूलके विद्यमान रहनेतक उस (कर्माशय) का परिणाम पुनर्जन्म, आयु और भोग होता रहता है।'
**व्याख्या—**जबतक क्लेशरूप जड़ विद्यमान रहती है, तबतक इस कर्मोंके संस्कारसमुदायरूप कर्माशयका विपाक यानी परिणाम—बार-बार अच्छी-बुरी योनियोंमें जन्म होना, वहाँपर निश्चित आयुतक जीते रहकर फिर मरणदुःखको भोगना और जीवनावस्थामें जो विवेक-दृष्टिसे सभी दुःखरूप है, ऐसे भोगका सम्बन्ध होना—ऐसे तीन प्रकारका होता रहता है ॥१३॥
**सम्बन्ध—**वे जाति, आयु और भोगरूप परिणाम किस प्रकारके होते हैं, यह बतलाते हैं—
ते ह्लादपरितापफलाः पुण्यापुण्यहेतुत्वात् ॥१४॥
'वे (जन्म, आयु और भोग अपने कारणके अनुरूप) हर्ष और शोकरूप फलको देनेवाले होते हैं; क्योंकि उनके पुण्यकर्म और पापकर्म—दोनों ही कारण हैं।'
**व्याख्या—**जो जन्म पुण्यकर्मका परिणाम है, वह सुखदायक