पातञ्जल योगदर्शन (भाष्य सहित)
Patanjali Yoga Darshan
महर्षि पतञ्जलि / हरिकृष्णदास गोयन्दका द्वारा
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देखनेमें आता है; ऐसे ही दूसरे भोगोंमें भी समझ लेना चाहिये।*
भोगोंको भोगते-भोगते मनुष्य थक जाता है, उन्हें भोगनेकी शक्ति उसमें नहीं रहती; परंतु तृष्णा बनी रहती है, इससे वह भोगरूप सुख भी दुःख ही है। यह भोगके अन्तमें अनुभव होनेवाला दुःख भी परिणामदुःखकी ही गणनामें है।
इन्द्रियों और पदार्थोंके सम्बन्धसे जब मनुष्यको किसी भी प्रकारके भोगमें सुखकी प्रतीति होती है, तब उसमें राग—आसक्ति अवश्य हो जाती है। इसलिये वह सुख रागरूप क्लेशसे मिला हुआ है। आसक्तिवश मनुष्य उस भोगकी प्राप्तिके साधनरूप पुण्य-पापका आरम्भ भी करेगा ही। उसकी प्राप्तिमें असमर्थ होनेसे या विघ्न आनेपर द्वेष होना भी अवश्यम्भावी है। इसके सिवा, प्राणियोंकी हिंसाके बिना भोगकी सिद्धि भी नहीं होती। अतः राग, द्वेष और हिंसादिका परिणाम अवश्य ही दुःख है। यह भी परिणाम-दुःखता है।
(२) तापदुःख—सभी प्रकारके भोगरूप सुख विनाशशील हैं, उनसे वियोग होना निश्चित है, अतः भोगकालमें उनके विनाशकी सम्भावनासे तापदुःख बना रहता है। इसी तरह मनुष्य-
* गीतामें भी कहा है—
विषयेन्द्रियसंयोगाद्यत्तदग्रेऽमृतोपमम् ।
परिणामे विषमिव तत्सुखं राजसं स्मृतम् ॥ (१८ । ३८)
'जो सुख विषय और इन्द्रियोंकें संयोगसे होता है, वह यद्यपि भोगकालमें अमृतके सदृश भासता है, परन्तु 'परिणाममें विषके सदृश है, इसलिये वह सुख राजस कहा गया है।'