भारतकोश
पातञ्जल योगदर्शन (भाष्य सहित)

पातञ्जल योगदर्शन (भाष्य सहित)

Patanjali Yoga Darshan

महर्षि पतञ्जलि / हरिकृष्णदास गोयन्दका द्वारा

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साधनपाद-२ ५३


को जो सुखकारक भोग प्राप्त होते हैं, वे सातिशय ही होते हैं; अर्थात् उसे जो कुछ प्राप्त है, उससे बढ़कर दूसरोंको भी प्राप्त है, यह देखकर वह ईर्ष्यासे जलता रहता है, यह भी तापदुःख है। तथा भोगकी अपूर्णतासे भी भोगकालमें संताप बना रहता है, यह भी तापदुःख है।

(३) संस्कारदुःख—जिन-जिन भोगोंमें मनुष्यको सुखका अनुभव होता है, उस अनुभवके संस्कार उसके हृदयमें जम जाते हैं। जब उन भोगसामग्रियोंसे उसका वियोग हो जाता है, तब वे संस्कार पहलेके सुखभोगकी स्मृतिद्वारा महान् दुःखके हेतु हो जाते हैं। देखनेमें भी आता है कि जब किसी मनुष्यकी स्त्री, पुत्र, धन, मकान आदि भोगसामग्री नष्ट हो जाती है, तब वह उनको याद कर-करके रोता रहता है कि मेरी स्त्री मुझे अमुक-अमुक प्रकारसे सुख देती थी, मेरे पास इतना धन था, मैं अपने धनसे स्वयं सुख भोगता था और लोगोंको सुख पहुँचाता था; आज मेरी यह दशा है कि मैं भिखारी होकर लोगोंसे सहायता माँगता फिरता हूँ—इत्यादि। इसके सिवा, वे भोग-संस्कार भोगासक्तिकी वृद्धिमें कारण होनेसे जन्मान्तरमें भी दुःखके हेतु हैं।

(४) गुणवृत्तिविरोध—गुणोंके कार्यका नाम गुणवृत्ति है, इनके कार्यमें परस्पर अत्यन्त विरोध है। जैसे सत्त्वगुणका कार्य प्रकाश, ज्ञान और सुख है, तो तमोगुणका कार्य अन्धकार, अज्ञान और दुःख है। इस प्रकार इनके कार्योंमें विरोध होनेके कारण दुविधा बनी रहती है; सुख-भोगकालमें भी शान्ति नहीं मिलती। क्योंकि तीनों गुण एक साथ रहनेवाले हैं। सुखके अनुभवकालमें सत्त्वगुणकी,