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पातञ्जल योगदर्शन (भाष्य सहित)

Patanjali Yoga Darshan

महर्षि पतञ्जलि / हरिकृष्णदास गोयन्दका द्वारा

DevanagariHindipublished184 पृष्ठ

साधनपाद-२ ५३


को जो सुखकारक भोग प्राप्त होते हैं, वे सातिशय ही होते हैं; अर्थात् उसे जो कुछ प्राप्त है, उससे बढ़कर दूसरोंको भी प्राप्त है, यह देखकर वह ईर्ष्यासे जलता रहता है, यह भी तापदुःख है। तथा भोगकी अपूर्णतासे भी भोगकालमें संताप बना रहता है, यह भी तापदुःख है।

(३) संस्कारदुःख—जिन-जिन भोगोंमें मनुष्यको सुखका अनुभव होता है, उस अनुभवके संस्कार उसके हृदयमें जम जाते हैं। जब उन भोगसामग्रियोंसे उसका वियोग हो जाता है, तब वे संस्कार पहलेके सुखभोगकी स्मृतिद्वारा महान् दुःखके हेतु हो जाते हैं। देखनेमें भी आता है कि जब किसी मनुष्यकी स्त्री, पुत्र, धन, मकान आदि भोगसामग्री नष्ट हो जाती है, तब वह उनको याद कर-करके रोता रहता है कि मेरी स्त्री मुझे अमुक-अमुक प्रकारसे सुख देती थी, मेरे पास इतना धन था, मैं अपने धनसे स्वयं सुख भोगता था और लोगोंको सुख पहुँचाता था; आज मेरी यह दशा है कि मैं भिखारी होकर लोगोंसे सहायता माँगता फिरता हूँ—इत्यादि। इसके सिवा, वे भोग-संस्कार भोगासक्तिकी वृद्धिमें कारण होनेसे जन्मान्तरमें भी दुःखके हेतु हैं।

(४) गुणवृत्तिविरोध—गुणोंके कार्यका नाम गुणवृत्ति है, इनके कार्यमें परस्पर अत्यन्त विरोध है। जैसे सत्त्वगुणका कार्य प्रकाश, ज्ञान और सुख है, तो तमोगुणका कार्य अन्धकार, अज्ञान और दुःख है। इस प्रकार इनके कार्योंमें विरोध होनेके कारण दुविधा बनी रहती है; सुख-भोगकालमें भी शान्ति नहीं मिलती। क्योंकि तीनों गुण एक साथ रहनेवाले हैं। सुखके अनुभवकालमें सत्त्वगुणकी,

५४ पातञ्जलयोगदर्शन

प्रधानता रहते हुए भी रजोगुण और तमोगुणका अभाव नहीं हो जाता, अतः उस समय भी दुःख और शोक विद्यमान रहते हैं, इसलिये भी वह दुःख ही है। जैसे ध्यानकालमें और सत्सङ्ग करते समय सत्त्वगुणकी प्रधानता रहती है, अतः सात्त्विक सुख होता है, परंतु वहाँ भी सांसारिक स्फुरणा और तन्द्रा उस सुखमें विघ्न कर देते हैं; ऐसे ही अन्य सब कामोंमें भी समझ लेना चाहिये।

उपर्युक्त परिणामदुःख, तापदुःख और संस्कारदुःख तथा गुणवृत्तियोंके विरोधसे होनेवाले दुःखको विचारद्वारा विवेकी पुरुष समझता है। इस कारण उसकी दृष्टिमें सभी 'कर्मविपाक' दुःखरूप ही हैं अर्थात् साधारण मनुष्य-समुदाय जिन भोगोंको सुखरूप समझता है, विवेकीके लिये वे भी दुःख ही हैं* ॥१५॥

**सम्बन्ध—**उपर्युक्त वर्णनसे यह सिद्ध हो गया कि जन्म, आयु और भोगरूप सभी कर्म-विपाक दुःखरूप हैं; इसलिये उनका मूलसहित उच्छेद करना मनुष्यका कर्तव्य है। अतः अब उनको त्याज्य (नाश करने योग्य) बतलाकर उनसे मुक्ति पानेका उपाय बतलाते हुए अगला प्रकरण आरम्भ करते हैं—


* यह बात गीताके पाँचवें अध्यायके बाईसवें श्लोकमें इस प्रकार कही है—

ये हि संस्पर्शजा भोगा दुःखयोनय एव ते।
आद्यन्तवन्तः कौन्तेय न तेषु रमते बुधः॥

'अर्थात् इन्द्रिय और विषयोंके संयोगसे उत्पन्न होनेवाले जितने भी भोग हैं, वे सब-के-सब दुःखोंके ही कारण हैं तथा सभी आदि और अन्तवाले हैं, अतः विवेकी मनुष्य उनमें नहीं रमता।'

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साधनपाद-२

हेयं दुःखमनागतम् ॥१६॥

‘आनेवाला दुःख हेय (नष्ट करने योग्य) है।’

व्याख्या—वर्तमान जन्मके पहले जो अनेक योनियोंमें दुःख भोगे जा चुके, वे तो अपने-आप समाप्त हो गये, उनके विषयमें कोई विचार नहीं करना है। तथा जो वर्तमान हैं, वे भी भोग देकर दूसरे क्षणमें अपने-आप लुप्त हो जायँगे, उनके लिये भी उपायकी आवश्यकता नहीं है। परंतु जो दुःख अभीतक प्राप्त नहीं हुए हैं, भविष्यमें होनेवाले हैं, उनका नाश उपायद्वारा अवश्यकर्तव्य है; इसलिये उन्हींको ‘हेय’ बतलाया गया है ॥१६॥

सम्बन्ध—जिसका नाश करना हो, उसके मूल कारणको जाननेकी आवश्यकता है, क्योंकि मूल कारणके नाशसे ही उसका पूर्णतया नाश हो सकता है; नहीं तो वह पुनः उत्पन्न हो सकता है। अतः उक्त ‘हेय’का हेतु (कारण) बतलाते हैं—

द्रष्टृदृश्ययोः संयोगो हेयहेतुः ॥१७॥

‘द्रष्टा और दृश्यका संयोग (उक्त) हेयका कारण है।’

व्याख्या—ऊपर जो नाश करनेयोग्य आनेवाले दुःख बतलाये गये हैं, उनका मूल कारण द्रष्टा और दृश्यका अर्थात् पुरुष और प्रकृतिका संयोग यानी जड-चेतनकी ग्रन्थि है। अतः इस संयोगका नाश कर देनेसे मनुष्य सर्वथा दुःखोंसे निवृत्त हो सकता है ॥१७॥

सम्बन्ध—पूर्वसूत्रमें द्रष्टा, दृश्य और उनका संयोग—इन तीनके नाम आये हैं, उनमेंसे पहले दृश्यका स्वभाव, स्वरूप और प्रयोजन बतलाते हैं—

.५६ पातअलयोगदर्शन

प्रकाशक्रियास्थितिशीलं भूतेन्द्रियात्मकं

भोगापवर्गार्थं दृश्यम् ॥१८॥

‘प्रकाश, क्रिया और स्थिति जिसका स्वभाव है, भूत और इन्द्रियाँ जिसका (प्रकट) स्वरूप है, (पुरुषके लिये) भोग और मुक्तिका संपादन करना ही जिसका प्रयोजन है, ऐसा दृश्य है।’

व्याख्या—सत्त्व, रज और तम—ये तीनों गुण और इनका कार्य जो कुछ भी देखने, सुनने और समझनेमें आता है, वह सब-का-सब दृश्यके अन्तर्गत है। सत्त्वगुणका मुख्य धर्म प्रकाश है, रजोगुणका मुख्य धर्म क्रिया (हलचल) है और तमोगुणका मुख्य धर्म स्थिति अर्थात् जडता और सुषुप्ति आदि है। इन तीनों गुणोंकी साम्यावस्थाको ही प्रधान या प्रकृति कहते हैं, यह सांख्यका मत है। अतः सब अवस्थाओंमें अनुगत तीनों गुणोंका जो प्रकाश, क्रिया और स्थितिरूप स्वभाव है, वही दृश्यका स्वभाव है।

पाँच स्थूल भूत, पाँच तन्मात्रा, पाँच कर्मेन्द्रियाँ, पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ एवं मन, बुद्धि और अहंकार—ये सब (तेईस तत्त्व) प्रकृतिके कार्य होनेसे उसके स्वरूप हैं।

भोगासक्त पुरुषको अपना स्वरूप दिखलाकर भोग प्रदान करना और मुक्ति चाहनेवाले योगीको द्रष्टाका स्वरूप दिखलाकर मुक्ति प्रदान करना दृश्यका प्रयोजन है। द्रष्टाको उसका निज स्वरूप दिखा देनेके बाद इसका कोई प्रयोजन नहीं रहता, उस पुरुषके लिये यह अस्त् (लुप्त) हो जाता है॥१८॥

साधनपाद-२ ५७

सम्बन्ध—उक्त दृश्यके भेदोंका वर्णन अपने ग्रन्थकी परिभाषामें करते हैं—

विशेषाविशेषलिङ्गमात्रालिङ्गानि गुणपर्वाणि ॥१९॥

‘विशेष, अविशेष, लिङ्गमात्र और अलिङ्ग—ये चार (उपर्युक्त) सत्त्वादि गुणोंके भेद (अवस्थाएँ) हैं।’

व्याख्या—(१) विशेष—पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश—ये पाँच स्थूल भूत तथा पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ, पाँच कर्मेन्द्रियाँ और एक मन—इस प्रकार सब मिलकर सोलहोंका नाम ‘विशेष’ है। गुणोंके विशेष धर्मोंकी अभिव्यक्ति (प्रकटता) इन्हींसे होती है, इसलिये इनको विशेष कहते हैं।

(२) अविशेष—शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध—ये पाँच तन्मात्राएँ हैं, इन्हींको सूक्ष्म महाभूत भी कहते हैं; क्योंकि ये स्थूल पञ्चमहाभूतोंके कारण हैं तथा छठा अहंकार, जो कि मन और इन्द्रियोंका कारण है, इन छहोंका नाम ‘अविशेष’ है। इनका स्वरूप इन्द्रियगोचर नहीं है, इसलिये इनको अविशेष कहते हैं।

(३) लिङ्गमात्र—उपर्युक्त बाईस तत्त्वोंका कारणभूत जो महत्तत्त्व है, जिसका वर्णन उपनिषदोंमें और गीतामें बुद्धिके नामसे किया गया है (कठ० १।३।१०) उसका नाम ‘लिङ्गमात्र’ है। इसकी उपलब्धि केवल सत्तामात्रसे ही होती है, इस कारण इसको लिङ्गमात्र कहते हैं।

(४) अलिङ्ग—मूल प्रकृति, जो कि तीनों गुणोंकी साम्यावस्था मानी गयी है, महत्तत्त्व जिसका पहला परिणाम (कार्य) है,

५८ पातञ्जलयोगदर्शन

उपनिषद् और गीतामें जिसका वर्णन अव्यक्त नामसे किया गया है (कठ० १।३।११; गीता १३।५), उसका नाम 'अलिङ्ग' है। साम्यावस्थाको प्राप्त गुणोंके स्वरूपकी अभिव्यक्ति नहीं होती, इसलिये प्रकृतिको अलिङ्ग (चिह्नरहित—अव्यक्त) कहते हैं।

इस प्रकार चार अवस्थाओंमें विद्यमान रहनेवाले ये सत्त्वादि गुण ही दृश्य नामसे कहे गये हैं॥१९॥

सम्बन्ध—अब द्रष्टाके स्वरूपका वर्णन करते हैं—

द्रष्टा दृशिमात्रः शुद्धोऽपि प्रत्ययानुपश्यः ॥२०॥

'चेतनमात्र (ज्ञानस्वरूप आत्मा) द्रष्टा है, यह यद्यपि स्वभावसे सर्वथा शुद्ध (निर्विकार) है, तो भी (बुद्धिके सम्बन्धसे) बुद्धिवृत्तिके अनुरूप देखनेवाला है।'

व्याख्या—केवल चेतनमात्र ही जिसका स्वरूप है, ऐसा आत्मतत्त्व स्वरूपसे सर्वथा शुद्ध, निर्विकार है, तो भी बुद्धिके सम्बन्धसे बुद्धिवृत्तिके अनुरूप देखनेवाला होनेसे 'द्रष्टा' कहलाता है।

'वास्तवमें द्रष्टा पुरुष (आत्मतत्त्व) सर्वथा शुद्ध, निर्विकार, कूटस्थ, असङ्ग है, तथापि इसका सम्बन्ध प्रकृतिके साथ अनादिसिद्ध अविद्यासे माना जाता है। जबतक उस अविद्याके नाशद्वारा यह प्रकृतिसे अलग होकर अपने असली स्वरूपमें स्थित नहीं हो जाता, तबतक बुद्धिके साथ एकताको प्राप्त हुआ-सा बुद्धिकी वृत्तियोंको देखता रहता है; और जबतक उनको देखता है, तभीतक इसकी 'द्रष्टा' संज्ञा है। दृश्यका सम्बन्ध न रहनेपर द्रष्टा किसका ? फिर तो यह केवल चेतनमात्र, सर्वथा शुद्ध और निर्विकार है ही ॥२०॥

साधनपाद-२ ५९

सम्बन्ध— दृश्य और द्रष्टाके स्वरूपका वर्णन करनेके बाद अब दृश्यके स्वरूपकी सार्थकताका प्रतिपादन करते हैं—

तदर्थ एव दृश्यस्याऽऽत्मा ॥२१॥

‘(उक्त) दृश्यका स्वरूप उस (द्रष्टा) के लिये ही है।’

व्याख्या— उक्त द्रष्टाको अपने दर्शनद्वारा भोग प्रदान करनेके लिये और द्रष्टाके निज स्वरूपका दर्शन कराकर अपवर्ग (मुक्ति) प्रदान करनेके लिये—इस प्रकार पुरुषका प्रयोजन सिद्ध करनेके लिये ही दृश्य है। इसीमें उसके होनेकी सार्थकता है। अठारहवें सूत्रमें दृश्यके लक्षणोंका वर्णन करते समय भी यही बात कही गयी है ॥२१॥

सम्बन्ध— पुरुषको अपवर्ग प्रदान कर देनेके बाद प्रकृतिका कोई कार्य शेष नहीं रहता, फिर उसका बना रहना निरर्थक है, अतः उसका अभाव हो जाना चाहिये; इसपर कहते हैं—

कृतार्थं प्रति नष्टमप्यनष्टं तदन्यसाधारणत्वात् ॥२२॥

‘जिसका भोग और अपवर्गरूप कार्य पूर्ण कर दिया, उस पुरुषके लिये नाशको प्राप्त हुई भी वह प्रकृति नष्ट नहीं होती; क्योंकि दूसरोंके लिये भी वह समान है।’

व्याख्या— प्रकृतिका प्रयोजन किसी एक ही पुरुषके लिये भोग और अपवर्ग प्रदान करना नहीं है, वह तो सभी पुरुषोंके लिये समान है। अतः जिसका कार्य वह कर चुकी, उस कृतार्थ—मुक्त पुरुषके लिये उसकी आवश्यकता न रहनेके कारण यद्यपि वह नष्ट हो जाती है, तो भी दूसरे सब जीवोंको भोग और अपवर्ग

६०पातञ्जलयोगदर्शन

प्रदान करना तो शेष है ही। इसलिये उसका सर्वथा नाश नहीं होता; वह विद्यमान रहती है। इससे यह बात सिद्ध होती है कि प्रकृति परिणामी होनेपर भी अनादि और नित्य है। यहाँ जो मुक्त पुरुषके लिये उसका नष्ट होना बतलाया गया है, वह भी अदृश्य होना ही बतलाया गया है; क्योंकि योगके सिद्धान्तमें किसी भी वस्तुका सर्वथा अभाव नहीं माना गया है ॥२२॥

**सम्बन्ध—**अब संयोगके स्वरूपका वर्णन करते हैं—

स्वस्वामिशक्त्योः स्वरूपोपलब्धिहेतुः संयोगः ॥२३॥

'स्वशक्ति (प्रकृति) और स्वामिशक्ति (पुरुष)—इन दोनोंके स्वरूपकी प्राप्तिका जो कारण है, वह 'संयोग' है।'

**व्याख्या—**दृश्यका स्वरूप द्रष्टाके ही लिये है, यह बात पहले कह आये हैं, उसी भावको लेकर इस सूत्रमें पुरुषको प्रकृतिका स्वामी बतलाया है और प्रकृतिको पुरुषका 'स्व' अर्थात् अपना यानी अधिकृत पदार्थ कहा है। उस प्रकृतिके साथ पुरुषका सम्बन्ध उन दोनोंके स्वरूपको जाननेके लिये ही है, अतः उस दर्शन (ज्ञान) शक्तिसे जबतक मनुष्य इस प्रकृतिके नाना रूपोंको देखता रहता है, तबतक तो भोगोंको भोगता रहता है। जब इनके दर्शनसे विरक्त होकर अपने स्वरूप-दर्शनकी ओर झाँकता है, तब स्वस्वरूपका दर्शन हो जाता है (योग० ३।३५)। फिर संयोगकी कोई आवश्यकता न रहनेसे उसका अभाव हो जाता है। यही पुरुषकी 'कैवल्य' अवस्था है (योग० ४।३४) ॥२३॥

**सम्बन्ध—**अब उक्त संयोगका कारण बतलाते हैं—

साधनपाद-२ ६१

तस्य हेतुरविद्या ॥२४॥

'उस संयोगका कारण अविद्या है।'

**व्याख्या—**सर्वथा निर्विकार असङ्ग चेतन पुरुषका जो यह जड प्रकृतिके साथ सम्बन्ध है, यह अनादिसिद्ध अविद्यासे है, वास्तवमें नहीं है।

यहाँ अविद्या विपर्ययवृत्तिका नाम नहीं है; किंतु अपने स्वरूपके अनादिसिद्ध अज्ञानका नाम अविद्या है, इसीलिये अपने स्वरूपके ज्ञानसे इसका नाश हो जाता है और उसके बाद प्रयोजन न रहनेपर वह ज्ञान भी शान्त हो जाता है। यही पुरुषका 'कैवल्य' है ॥२४॥

**सम्बन्ध—**अब कारणसहित संयोगके अभावसे सिद्ध होनेवाले सर्वथा दुःखनाशरूप 'हान' का वर्णन करते हैं—

तदभावात्संयोगाभावो हानं तद्दृशेः कैवल्यम् ॥२५॥

'उस (अविद्या) के अभावसे संयोगका अभाव (हो जाता है, यही) 'हान' (पुनर्जन्मादि भावी दुःखोंका अत्यन्त अभाव) है (और) वही चेतन आत्माका 'कैवल्य' है।'

**व्याख्या—**जब आत्मदर्शनरूप ज्ञानसे अविद्याका यानी अज्ञानका सर्वथा अभाव हो जाता है, तब अज्ञानजनित संयोगका भी अपने-आप अभाव हो जाता है; फिर पुरुषका प्रकृतिसे कोई सम्बन्ध नहीं रहता और उसके जन्म-मरण आदि सम्पूर्ण दुःखोंका सदाके लिये अत्यन्त अभाव हो जाता है तथा पुरुष अपनी वास्तविक कैवल्य-अवस्थाको प्राप्त हो जाता है ॥२५॥

६२ पातञ्जलयोगदर्शन

सम्बन्ध—अब उक्त दुःखोंके अत्यन्त अभावरूप 'हान' का उपाय बतलाते हैं—

विवेकख्यातिरविप्लवा हानोपायः ॥२६॥

'निश्चल और निर्दोष विवेकज्ञान (उक्त) 'हान'का उपाय है।'

व्याख्या—प्रकृति तथा उसके कार्य—बुद्धि, अहंकार, इन्द्रियाँ और शरीर—इन सबके यथार्थ स्वरूपका ज्ञान हो जानेसे तथा आत्मा इनसे सर्वथा भिन्न और असङ्ग है, आत्माका इनके साथ कोई सम्बन्ध नहीं है, इस प्रकार पुरुषके स्वरूपका यथार्थ ज्ञान हो जानेसे जो प्रकृति और पुरुषके स्वरूपका अलग-अलग यथार्थ ज्ञान होता है, इसीका नाम 'विवेकज्ञान' है (योग० ३। ५४)। उस समय चित्त विवेकज्ञानमें निमग्न और कैवल्यके अभिमुख रहता है। यह ज्ञान जब समाधिकी निर्मलता—स्वच्छता होनेपर पूर्ण और निश्चल हो जाता है, उसमें किसी प्रकारका भी मल नहीं रहता (योग० ४। ३१), तब वह अविप्लव विवेकज्ञान कहलाता है। ऐसा विवेकज्ञान ही समस्त दुःखोंके अत्यन्त अभावरूप मुक्तिका उपाय है। इससे संसारके बीज अविद्यादि क्लेशोंका और समस्त कर्मोंका सर्वथा अभाव हो जाता है (योग० ४। ३०)। उसके बाद चित्त अपने आश्रयरूप—महत्तत्त्व आदिके सहित अपने कारणमें विलीन हो जाता है तथा प्रकृतिका जो स्वाभाविक परिणाम-क्रम है, वह बंद हो जाता है (योग० ४। ३२) ॥२६॥

सम्बन्ध—उक्त विवेकज्ञानके समय साधककी बुद्धि किस प्रकारकी होती है, यह बतलाते हैं—

साधनपाद-२ [६३]

तस्य सप्तधा प्रान्तभूमिः प्रज्ञा ॥२७॥

'उस (विवेकज्ञानप्राप्त) पुरुषकी सात प्रकारकी अन्तिम स्थितिवाली बुद्धि होती है।'

व्याख्या—जब निर्मल और अचल विवेकख्यातिके द्वारा योगीके चित्तका आवरण और मल सर्वथा नष्ट हो जाता है (योग० ४।३१), उस समय उस चित्तमें दूसरे सांसारिक ज्ञानोंका उदय नहीं होता। अतः सात प्रकारकी उत्कर्ष अवस्थावाली प्रज्ञा (बुद्धि) उत्पन्न होती है। उनमें पहली चार प्रकारकी तो कार्यविमुक्तिकी द्योतक हैं, इस कारण वे 'कार्यविमुक्तिप्रज्ञा' कहलाती हैं और अन्तकी तीन चित्तविमुक्तिकी द्योतक हैं, इस कारण उनका नाम 'चित्तविमुक्तिप्रज्ञा' है।

कार्यविमुक्तिप्रज्ञा यानी कर्तव्यशून्य अवस्थाके चार भेद इस प्रकार हैं—

(१) ज्ञेयशून्य अवस्था—जो कुछ जानना था, जान लिया; अब कुछ भी जानना शेष नहीं रहा अर्थात् जितना गुणमय दृश्य है (योग० २।१८, १९) वह सब परिणाम, ताप और संस्कारदुःखोंके तथा गुणवृत्तिविरोधके कारण सर्वथा दुःखरूप है, अतः हेय है (योग० २।१६)।

(२) हेयशून्य अवस्था—जिसका अभाव करना था,उसका अभाव कर दिया अर्थात् द्रष्टा और दृश्यके संयोगका, जो कि हेयका हेतु है, अभाव कर दिया; अब कुछ भी अभाव करनेयोग्य शेष नहीं रहा।

(३) प्राप्यप्राप्त अवस्था—जो कुछ प्राप्त करना था, प्राप्त कर लिया अर्थात् समाधिद्वारा केवल अवस्थाकी प्राप्ति कर ली; अब कुछ भी प्राप्त करना शेष नहीं रहा।

६४पातञ्जलयोगदर्शन

( ४ ) चिकीर्षाशून्य अवस्था—जो कुछ करना था, कर लिया अर्थात् हानका उपाय जो निर्मल और अचल विवेकज्ञान है, उसे सिद्ध कर लिया; अब और कुछ करना शेष नहीं रहा।

चित्तविमुक्तिप्रज्ञाके तीन भेद इस प्रकार हैं—

( १ ) चित्तकी कृतार्थता—चित्तने अपना अधिकार 'भोग और अपवर्ग देना' पूरा कर दिया; अब उसका कोई प्रयोजन शेष नहीं रहा।

( २ ) गुणलीनता—चित्त अपने कारणरूप गुणोंमें लीन हो रहा है, क्योंकि अब उसका कोई कार्य शेष नहीं रहा।

( ३ ) आत्मस्थिति—पुरुष सर्वथा गुणोंसे अतीत होकर अपने स्वरूपमें स्थित हो गया; अब कुछ भी शेष नहीं रहा।

इस सात प्रकारकी प्रान्तभूमिप्रज्ञाको अनुभव करनेवाला योगी कुशल ( जीवन्मुक्त ) कहलाता है और चित्त जब अपने कारणमें लीन हो जाता है, तब भी कुशल ( विदेहमुक्त ) कहलाता है ॥२७॥

सम्बन्ध—अब उक्त निर्मल विवेकज्ञानकी प्राप्तिका उपाय बतलाते हैं—

योगाङ्गानुष्ठानादशुद्धिक्षये ज्ञानदीप्तिरा विवेकख्यातेः ॥ २८ ॥

'योगके अङ्गोंका अनुष्ठान करनेसे अशुद्धिका नाश होनेपर ज्ञानका प्रकाश विवेकख्यातिपर्यन्त हो जाता है।'

व्याख्या—आगे बतलाये जानेवाले योगके आठ अङ्गोंका अनुष्ठान करनेसे अर्थात् उनको आचरणमें लानेसे जब चित्तके मलका

साधनपाद-२ ६५

अभाव होकर वह सर्वथा निर्मल हो जाता है, उस समय योगीके ज्ञानका प्रकाश विवेकख्यातितक हो जाता है अर्थात् उसे आत्माका स्वरूप बुद्धि, अहंकार और इन्द्रियोंसे सर्वथा भिन्न प्रत्यक्ष दिखलायी देता है ॥२८॥

सम्बन्ध— उक्त योगाङ्गोंके नाम और उनकी संख्या बतलाते हैं—

यमनियमासनप्राणायामप्रत्याहारधारणाध्यान-

समाधयोऽष्टावङ्गानि ॥२९॥

‘यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि—ये आठ (योगके) अङ्ग हैं।’

व्याख्या— इनके लक्षण और फलोंका वर्णन अगले सूत्रोंमें स्वयं सूत्रकारने ही किया है, अतः यहाँ विस्तारकी आवश्यकता नहीं है ॥२९॥

सम्बन्ध— पहले यमोंका वर्णन करते हैं—

अहिंसासत्यास्तेयब्रह्मचर्यापरिग्रहा यमाः ॥३०॥

‘अहिंसा, सत्य, अस्तेय (चोरीका अभाव), ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह (संग्रहका अभाव)—ये पाँच यम हैं।’

व्याख्या— (१) अहिंसा—मन, वाणी और शरीरसे किसी प्राणीको कभी किसी प्रकार किञ्चिन्मात्र भी दुःख न देना ‘अहिंसा’ है।

(२) सत्य—इन्द्रिय और मनसे प्रत्यक्ष देखकर, सुनकर या अनुमान करके जैसा अनुभव किया हो, ठीक वैसा-का-वैसा ही भाव प्रकट करनेके लिये प्रिय और हितकर तथा दूसरेको उद्वेग उत्पन्न न करनेवाले जो वचन बोले जाते हैं, उनका नाम ‘सत्य’ है।

पा० यो० द० ५—

६६ पातञ्जलयोगदर्शन

(३) अस्तेय—दूसरेके स्वत्वका अपहरण करना, छलसे या अन्य किसी उपायसे अन्यायपूर्वक अपना बना लेना स्तेय (चोरी) है, इसमें सरकारी टैक्सकी चोरी और घूसखोरी भी संमिलित है; इन सब प्रकारकी चोरियोंके अभावका नाम 'अस्तेय' है।

(४) ब्रह्मचर्य—मन, वाणी और शरीरसे होनेवाले सब प्रकारके मैथुनोंका सब अवस्थाओंमें सदा त्याग करके सब प्रकारसे वीर्यकी रक्षा करना 'ब्रह्मचर्य' है।* अतः साधकको चाहिये कि न तो कामदीपन करनेवाले पदार्थोंका सेवन करे, न ऐसे दृश्योंको देखे, न ऐसी बातोंको सुने, न ऐसे साहित्यको पढ़े और न ऐसे विचारोंको ही मनमें लावे। तथा स्त्रियोंका और स्त्री-आसक्त पुरुषोंका सङ्ग भी ब्रह्मचर्यमें बाधक है, अतः ऐसे सङ्गसे सदा सावधानीके साथ बचना चाहिये।

(५) अपरिग्रह—अपने स्वार्थके लिये ममतापूर्वक धन, सम्पत्ति और भोग-सामग्रीका सञ्चय करना 'परिग्रह' है, इसके अभावका नाम 'अपरिग्रह' है॥३०॥

**सम्बन्ध—**उक्त यमोंकी सबसे ऊँची अवस्था बतलाते हैं—

जातिदेशकालसमयानवच्छिन्नाः सार्वभौमा महाव्रतम् ॥३१॥

'(उक्त यम) जाति, देश, काल और निमित्तकी सीमासे रहित सार्वभौम होनेपर महाव्रत हो जाते हैं।'


* कर्मणा मनसा वाचा सर्वावस्थासु सर्वदा।
सर्वत्र मैथुनत्यागो ब्रह्मचर्यं प्रचक्षते॥
(गरुड० पूर्व० आचार० २३८। ६)

साधनपाद-२ ६७

व्याख्या—उक्त अहिंसादिका अनुष्ठान जब सार्वभौम अर्थात् सबके साथ, सब जगह और सब समय समानभावसे किया जाता है, तब ये महाव्रत हो जाते हैं। जैसे किसीने नियम लिया कि मछलीके सिवा अन्य जीवोंकी हिंसा नहीं करूँगा तो यह जाति-अवच्छिन्न अहिंसा है; इसी तरह कोई नियम ले कि मैं तीर्थोंमें हिंसा नहीं करूँगा तो यह देश-अवच्छिन्न अहिंसा है। कोई यह नियम करे कि मैं एकादशी, अमावस्या और पूर्णिमाको हिंसा नहीं करूँगा तो यह कालावच्छिन्न अहिंसा है। कोई नियम करे कि मैं विवाहके अवसरके सिवा अन्य किसी निमित्तसे हिंसा नहीं करूँगा तो यह समयावच्छिन्न (निमित्तसे सम्बन्धित) अहिंसा है। इसी प्रकार सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रहके भी भेद समझ लेने चाहिये। ऐसे यम व्रत तो हैं, परंतु सार्वभौम न होनेके कारण महाव्रत नहीं हैं। उपर्युक्त प्रकारका प्रतिबन्ध न लगाकर जब सभी प्राणियोंके साथ सब देशोंमें सदा-सर्वदा इनका पालन किया जाय, किसी भी निमित्तसे इनमें शिथिलता आनेका अवकाश न दिया जाय, तब ये सार्वभौम होनेपर ‘महाव्रत’ कहलाते हैं ॥३१॥

सम्बन्ध—यमोंका वर्णन करके अब नियमोंका वर्णन करते हैं—

शौचसंतोषतपःस्वाध्यायेश्वरप्रणिधानानि नियमाः ॥३२॥

‘शौच, संतोष, तप, स्वाध्याय और ईश्वर-शरणागति—(ये पाँच) नियम हैं।’

व्याख्या—(१) शौच—जल-मृत्तिकादिके द्वारा शरीर, वस्त्र

६८पातञ्जलयोगदर्शन

और मकान् आदिके मलको दूर करना बाहरकी शुद्धि है; इसके सिवा अपने वर्णाश्रम और योग्यताके अनुसार न्यायपूर्वक धनको और शरीरनिर्वाहके लिये आवश्यक अन्न आदि पवित्र वस्तुओंको प्राप्त करके उनके द्वारा शास्त्रानुकूल शुद्ध भोजनादि करना तथा सबके साथ यथायोग्य पवित्र बर्ताव करना—यह भी बाहरी शुद्धिके ही अन्तर्गत है। जप, तप और शुद्ध विचारोंके द्वारा एवं मैत्री आदिकी भावनासे अन्तःकरणके रागद्वेषादि मलोंका नाश करना भीतरकी पवित्रता है।

(२) सन्तोष—कर्तव्यकर्मका पालन करते हुए उसका जो कुछ परिणाम हो तथा प्रारब्धके अनुसार अपने-आप जो कुछ भी प्राप्त हो एवं जिस अवस्था और परिस्थितिमें रहनेका संयोग प्राप्त हो जाय, उसीमें संतुष्ट रहना और किसी प्रकारकी भी कामना या तृष्णा न करना ‘सन्तोष’ है।

(३) तप, (४) स्वाध्याय और (५) ईश्वर-प्रणिधान—इन तीनोंकी व्याख्या क्रियायोगके वर्णनमें कर चुके हैं (देखिये योग० २।१ की व्याख्या) उसी प्रकार यहाँ भी समझ लेना चाहिये ॥३२॥

सम्बन्ध—यम-नियमोंके अनुष्ठानमें विघ्न उपस्थित होनेपर उन विघ्नोंको हटानेका उपाय बतलाते हैं—

वितर्कबाधने प्रतिपक्षभावनम् ॥३३॥

‘जब वितर्क (यम और नियमोंके विरोधी हिंसादिके भाव) यम-नियमके पालनमें बाधा पहुँचावें, तब उनके प्रतिपक्षी विचारोंका बारंबार चिन्तन करना चाहिये।’

व्याख्या—जब कभी सङ्गदोषसे या अन्यायपूर्वक किसीके द्वारा सताये जानेपर बदला लेनेके लिये या अन्य किसी भी कारणसे

साधनपाद-२ ६९

मनमें अहिंसादिके विरोधी भाव बाधा पहुँचावें अर्थात् हिंसा, झूठ, चोरी आदिमें प्रवृत्त होकर यम-नियमादिका त्याग कर देनेकी परिस्थिति उत्पन्न कर दें तो उस समय उन विरोधी विचारोंका नाश करनेके लिये उन विचारोंमें दोषदर्शनरूप प्रतिपक्षकी भावना करनी चाहिये ॥३३॥

सम्बन्ध— इस दोषदर्शनरूप प्रतिपक्षभावनाका ही अगले सूत्रमें वर्णन करते हैं—

वितर्का हिंसादयः कृतकारितानुमोदिता लोभक्रोध-

मोहपूर्वका मृदुमध्याधिमात्रा दुःखाज्ञानानन्त-

फला इति प्रतिपक्षभावनम् ॥३४॥

'( यम और नियमोंके विरोधी ) हिंसा आदि वितर्क कहलाते हैं । ( वे तीन प्रकारके होते हैं—) स्वयं किये हुए, दूसरोंसे करवाये हुए और अनुमोदित किये हुए । इनके कारण लोभ, क्रोध और मोह हैं । इनमें भी कोई छोटा, कोई मध्यम और कोई बहुत बड़ा होता है । ये दुःख और अज्ञानरूप अनन्त फल देनेवाले हैं—इस प्रकार ( विचार करना ही ) प्रतिपक्षकी भावना है ।'

व्याख्या— स्वयं किये हुए, दूसरोंसे करवाये हुए और दूसरेको करते देखकर अनुमोदन किये हुए—इस तरह तीन प्रकारसे होने-वाले हिंसा, झूठ, चोरी और व्यभिचार आदि अवगुण, जो कि यम-नियमोंके विरोधी हैं, उनका नाम 'वितर्क' है । ये दोष कभी लोभसे, कभी क्रोधसे और कभी मोहसे एवं कभी छोटे रूपमें, कभी मध्यम

७० पातञ्जलयोगदर्शनं

और कभी भयङ्कर रूपमें साधकके सामने उपस्थित होकर उसे सताते हैं। उस समय साधकको सावधान होकर विचार करना चाहिये कि ये हिंसादि दोष महान् हानिकारक और नरकमें ले जानेवाले हैं, इनका परिणाम बारंबार दुःख भोगना और अज्ञानके वशमें होकर शूकर-कूकर आदि मूढ योनियोंमें पड़ना है; अतः इनसे सर्वथा दूर रहकर दृढ़तापूर्वक यम-नियमोंका पालन करते रहना चाहिये। इस प्रकारके विचारोंको बारंबार करते रहना ही ‘प्रतिपक्षकी भावना’ है ॥३४॥

सम्बन्ध— इस प्रकार यम-नियमोंके विरोधी हिंसादिको हटानेका उपाय उनमें दोष देखना बतलाकर अब यम-नियमोंमें प्रीति उत्पन्न करनेके लिये उनके पालनका भिन्न-भिन्न फल बतलाते हैं—

अहिंसाप्रतिष्ठायां तत्सन्निधौ वैरत्यागः ॥३५॥

‘अहिंसाकी दृढ़ स्थिति हो जानेपर उस योगीके निकट सब प्राणी वैरका त्याग कर देते हैं।’

व्याख्या— जब योगीका अहिंसाभाव पूर्णतया दृढ स्थिर हो जाता है, तब उसके निकटवर्ती हिंसक जीव भी वैरभावसे रहित हो जाते हैं। इतिहासग्रन्थोंमें जहाँ मुनियोंके आश्रमोंकी शोभाका वर्णन आता है, वहाँ वनचर जीवोंमें भी स्वाभाविक वैरका अभाव दिखलाया गया है, यह उन ऋषियोंके अहिंसाभावकी प्रतिष्ठाका द्योतक है * ॥३५॥


* वाल्मीकीय रामायण वनकाण्डमें अगस्त्याश्रमके वर्णनमें आता है—
यदाप्रभृति चाक्रान्ता दिगियं पुण्यकर्मणा।
तदाप्रभृति निर्वैराः प्रशान्ता रजनीचराः॥

पातञ्जलयोगदर्शन

वाल्मीकि-आश्रम

अहिंसाप्रतिष्ठायां तत्सन्निधौ वैरत्यागः ॥ ( २ । ३५ )


खग मृग विपुल कोलाहल करहीं। बिरहित बैर मुदित मन चरहीं ॥
करि केहरि कपि कोल कुरंगा। बिगत बैर बिचरहिं सब संगा ॥

[मुद्रा: पुस्तकालय श्री १०८ ...]