भारतकोश
पातञ्जल योगदर्शन (भाष्य सहित)

पातञ्जल योगदर्शन (भाष्य सहित)

Patanjali Yoga Darshan

महर्षि पतञ्जलि / हरिकृष्णदास गोयन्दका द्वारा

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साधनपाद-२ ६५

अभाव होकर वह सर्वथा निर्मल हो जाता है, उस समय योगीके ज्ञानका प्रकाश विवेकख्यातितक हो जाता है अर्थात् उसे आत्माका स्वरूप बुद्धि, अहंकार और इन्द्रियोंसे सर्वथा भिन्न प्रत्यक्ष दिखलायी देता है ॥२८॥

सम्बन्ध— उक्त योगाङ्गोंके नाम और उनकी संख्या बतलाते हैं—

यमनियमासनप्राणायामप्रत्याहारधारणाध्यान-

समाधयोऽष्टावङ्गानि ॥२९॥

‘यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि—ये आठ (योगके) अङ्ग हैं।’

व्याख्या— इनके लक्षण और फलोंका वर्णन अगले सूत्रोंमें स्वयं सूत्रकारने ही किया है, अतः यहाँ विस्तारकी आवश्यकता नहीं है ॥२९॥

सम्बन्ध— पहले यमोंका वर्णन करते हैं—

अहिंसासत्यास्तेयब्रह्मचर्यापरिग्रहा यमाः ॥३०॥

‘अहिंसा, सत्य, अस्तेय (चोरीका अभाव), ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह (संग्रहका अभाव)—ये पाँच यम हैं।’

व्याख्या— (१) अहिंसा—मन, वाणी और शरीरसे किसी प्राणीको कभी किसी प्रकार किञ्चिन्मात्र भी दुःख न देना ‘अहिंसा’ है।

(२) सत्य—इन्द्रिय और मनसे प्रत्यक्ष देखकर, सुनकर या अनुमान करके जैसा अनुभव किया हो, ठीक वैसा-का-वैसा ही भाव प्रकट करनेके लिये प्रिय और हितकर तथा दूसरेको उद्वेग उत्पन्न न करनेवाले जो वचन बोले जाते हैं, उनका नाम ‘सत्य’ है।

पा० यो० द० ५—