पातञ्जल योगदर्शन (भाष्य सहित)
Patanjali Yoga Darshan
महर्षि पतञ्जलि / हरिकृष्णदास गोयन्दका द्वारा
पृष्ठ 80, कुल 184 में से
संदर्भ में पढ़ें| ६४ | पातञ्जलयोगदर्शन |
|---|
( ४ ) चिकीर्षाशून्य अवस्था—जो कुछ करना था, कर लिया अर्थात् हानका उपाय जो निर्मल और अचल विवेकज्ञान है, उसे सिद्ध कर लिया; अब और कुछ करना शेष नहीं रहा।
चित्तविमुक्तिप्रज्ञाके तीन भेद इस प्रकार हैं—
( १ ) चित्तकी कृतार्थता—चित्तने अपना अधिकार 'भोग और अपवर्ग देना' पूरा कर दिया; अब उसका कोई प्रयोजन शेष नहीं रहा।
( २ ) गुणलीनता—चित्त अपने कारणरूप गुणोंमें लीन हो रहा है, क्योंकि अब उसका कोई कार्य शेष नहीं रहा।
( ३ ) आत्मस्थिति—पुरुष सर्वथा गुणोंसे अतीत होकर अपने स्वरूपमें स्थित हो गया; अब कुछ भी शेष नहीं रहा।
इस सात प्रकारकी प्रान्तभूमिप्रज्ञाको अनुभव करनेवाला योगी कुशल ( जीवन्मुक्त ) कहलाता है और चित्त जब अपने कारणमें लीन हो जाता है, तब भी कुशल ( विदेहमुक्त ) कहलाता है ॥२७॥
सम्बन्ध—अब उक्त निर्मल विवेकज्ञानकी प्राप्तिका उपाय बतलाते हैं—
योगाङ्गानुष्ठानादशुद्धिक्षये ज्ञानदीप्तिरा विवेकख्यातेः ॥ २८ ॥
'योगके अङ्गोंका अनुष्ठान करनेसे अशुद्धिका नाश होनेपर ज्ञानका प्रकाश विवेकख्यातिपर्यन्त हो जाता है।'
व्याख्या—आगे बतलाये जानेवाले योगके आठ अङ्गोंका अनुष्ठान करनेसे अर्थात् उनको आचरणमें लानेसे जब चित्तके मलका