पातञ्जल योगदर्शन (भाष्य सहित)
Patanjali Yoga Darshan
महर्षि पतञ्जलि / हरिकृष्णदास गोयन्दका द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसाधनपाद-२ [६३]
तस्य सप्तधा प्रान्तभूमिः प्रज्ञा ॥२७॥
'उस (विवेकज्ञानप्राप्त) पुरुषकी सात प्रकारकी अन्तिम स्थितिवाली बुद्धि होती है।'
व्याख्या—जब निर्मल और अचल विवेकख्यातिके द्वारा योगीके चित्तका आवरण और मल सर्वथा नष्ट हो जाता है (योग० ४।३१), उस समय उस चित्तमें दूसरे सांसारिक ज्ञानोंका उदय नहीं होता। अतः सात प्रकारकी उत्कर्ष अवस्थावाली प्रज्ञा (बुद्धि) उत्पन्न होती है। उनमें पहली चार प्रकारकी तो कार्यविमुक्तिकी द्योतक हैं, इस कारण वे 'कार्यविमुक्तिप्रज्ञा' कहलाती हैं और अन्तकी तीन चित्तविमुक्तिकी द्योतक हैं, इस कारण उनका नाम 'चित्तविमुक्तिप्रज्ञा' है।
कार्यविमुक्तिप्रज्ञा यानी कर्तव्यशून्य अवस्थाके चार भेद इस प्रकार हैं—
(१) ज्ञेयशून्य अवस्था—जो कुछ जानना था, जान लिया; अब कुछ भी जानना शेष नहीं रहा अर्थात् जितना गुणमय दृश्य है (योग० २।१८, १९) वह सब परिणाम, ताप और संस्कारदुःखोंके तथा गुणवृत्तिविरोधके कारण सर्वथा दुःखरूप है, अतः हेय है (योग० २।१६)।
(२) हेयशून्य अवस्था—जिसका अभाव करना था,उसका अभाव कर दिया अर्थात् द्रष्टा और दृश्यके संयोगका, जो कि हेयका हेतु है, अभाव कर दिया; अब कुछ भी अभाव करनेयोग्य शेष नहीं रहा।
(३) प्राप्यप्राप्त अवस्था—जो कुछ प्राप्त करना था, प्राप्त कर लिया अर्थात् समाधिद्वारा केवल अवस्थाकी प्राप्ति कर ली; अब कुछ भी प्राप्त करना शेष नहीं रहा।