भारतकोश
पातञ्जल योगदर्शन (भाष्य सहित)

पातञ्जल योगदर्शन (भाष्य सहित)

Patanjali Yoga Darshan

महर्षि पतञ्जलि / हरिकृष्णदास गोयन्दका द्वारा

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६२ पातञ्जलयोगदर्शन

सम्बन्ध—अब उक्त दुःखोंके अत्यन्त अभावरूप 'हान' का उपाय बतलाते हैं—

विवेकख्यातिरविप्लवा हानोपायः ॥२६॥

'निश्चल और निर्दोष विवेकज्ञान (उक्त) 'हान'का उपाय है।'

व्याख्या—प्रकृति तथा उसके कार्य—बुद्धि, अहंकार, इन्द्रियाँ और शरीर—इन सबके यथार्थ स्वरूपका ज्ञान हो जानेसे तथा आत्मा इनसे सर्वथा भिन्न और असङ्ग है, आत्माका इनके साथ कोई सम्बन्ध नहीं है, इस प्रकार पुरुषके स्वरूपका यथार्थ ज्ञान हो जानेसे जो प्रकृति और पुरुषके स्वरूपका अलग-अलग यथार्थ ज्ञान होता है, इसीका नाम 'विवेकज्ञान' है (योग० ३। ५४)। उस समय चित्त विवेकज्ञानमें निमग्न और कैवल्यके अभिमुख रहता है। यह ज्ञान जब समाधिकी निर्मलता—स्वच्छता होनेपर पूर्ण और निश्चल हो जाता है, उसमें किसी प्रकारका भी मल नहीं रहता (योग० ४। ३१), तब वह अविप्लव विवेकज्ञान कहलाता है। ऐसा विवेकज्ञान ही समस्त दुःखोंके अत्यन्त अभावरूप मुक्तिका उपाय है। इससे संसारके बीज अविद्यादि क्लेशोंका और समस्त कर्मोंका सर्वथा अभाव हो जाता है (योग० ४। ३०)। उसके बाद चित्त अपने आश्रयरूप—महत्तत्त्व आदिके सहित अपने कारणमें विलीन हो जाता है तथा प्रकृतिका जो स्वाभाविक परिणाम-क्रम है, वह बंद हो जाता है (योग० ४। ३२) ॥२६॥

सम्बन्ध—उक्त विवेकज्ञानके समय साधककी बुद्धि किस प्रकारकी होती है, यह बतलाते हैं—