भारतकोश
पातञ्जल योगदर्शन (भाष्य सहित)

पातञ्जल योगदर्शन (भाष्य सहित)

Patanjali Yoga Darshan

महर्षि पतञ्जलि / हरिकृष्णदास गोयन्दका द्वारा

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साधनपाद-२ ६१

तस्य हेतुरविद्या ॥२४॥

'उस संयोगका कारण अविद्या है।'

**व्याख्या—**सर्वथा निर्विकार असङ्ग चेतन पुरुषका जो यह जड प्रकृतिके साथ सम्बन्ध है, यह अनादिसिद्ध अविद्यासे है, वास्तवमें नहीं है।

यहाँ अविद्या विपर्ययवृत्तिका नाम नहीं है; किंतु अपने स्वरूपके अनादिसिद्ध अज्ञानका नाम अविद्या है, इसीलिये अपने स्वरूपके ज्ञानसे इसका नाश हो जाता है और उसके बाद प्रयोजन न रहनेपर वह ज्ञान भी शान्त हो जाता है। यही पुरुषका 'कैवल्य' है ॥२४॥

**सम्बन्ध—**अब कारणसहित संयोगके अभावसे सिद्ध होनेवाले सर्वथा दुःखनाशरूप 'हान' का वर्णन करते हैं—

तदभावात्संयोगाभावो हानं तद्दृशेः कैवल्यम् ॥२५॥

'उस (अविद्या) के अभावसे संयोगका अभाव (हो जाता है, यही) 'हान' (पुनर्जन्मादि भावी दुःखोंका अत्यन्त अभाव) है (और) वही चेतन आत्माका 'कैवल्य' है।'

**व्याख्या—**जब आत्मदर्शनरूप ज्ञानसे अविद्याका यानी अज्ञानका सर्वथा अभाव हो जाता है, तब अज्ञानजनित संयोगका भी अपने-आप अभाव हो जाता है; फिर पुरुषका प्रकृतिसे कोई सम्बन्ध नहीं रहता और उसके जन्म-मरण आदि सम्पूर्ण दुःखोंका सदाके लिये अत्यन्त अभाव हो जाता है तथा पुरुष अपनी वास्तविक कैवल्य-अवस्थाको प्राप्त हो जाता है ॥२५॥