भारतकोश
पातञ्जल योगदर्शन (भाष्य सहित)

पातञ्जल योगदर्शन (भाष्य सहित)

Patanjali Yoga Darshan

महर्षि पतञ्जलि / हरिकृष्णदास गोयन्दका द्वारा

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६०पातञ्जलयोगदर्शन

प्रदान करना तो शेष है ही। इसलिये उसका सर्वथा नाश नहीं होता; वह विद्यमान रहती है। इससे यह बात सिद्ध होती है कि प्रकृति परिणामी होनेपर भी अनादि और नित्य है। यहाँ जो मुक्त पुरुषके लिये उसका नष्ट होना बतलाया गया है, वह भी अदृश्य होना ही बतलाया गया है; क्योंकि योगके सिद्धान्तमें किसी भी वस्तुका सर्वथा अभाव नहीं माना गया है ॥२२॥

**सम्बन्ध—**अब संयोगके स्वरूपका वर्णन करते हैं—

स्वस्वामिशक्त्योः स्वरूपोपलब्धिहेतुः संयोगः ॥२३॥

'स्वशक्ति (प्रकृति) और स्वामिशक्ति (पुरुष)—इन दोनोंके स्वरूपकी प्राप्तिका जो कारण है, वह 'संयोग' है।'

**व्याख्या—**दृश्यका स्वरूप द्रष्टाके ही लिये है, यह बात पहले कह आये हैं, उसी भावको लेकर इस सूत्रमें पुरुषको प्रकृतिका स्वामी बतलाया है और प्रकृतिको पुरुषका 'स्व' अर्थात् अपना यानी अधिकृत पदार्थ कहा है। उस प्रकृतिके साथ पुरुषका सम्बन्ध उन दोनोंके स्वरूपको जाननेके लिये ही है, अतः उस दर्शन (ज्ञान) शक्तिसे जबतक मनुष्य इस प्रकृतिके नाना रूपोंको देखता रहता है, तबतक तो भोगोंको भोगता रहता है। जब इनके दर्शनसे विरक्त होकर अपने स्वरूप-दर्शनकी ओर झाँकता है, तब स्वस्वरूपका दर्शन हो जाता है (योग० ३।३५)। फिर संयोगकी कोई आवश्यकता न रहनेसे उसका अभाव हो जाता है। यही पुरुषकी 'कैवल्य' अवस्था है (योग० ४।३४) ॥२३॥

**सम्बन्ध—**अब उक्त संयोगका कारण बतलाते हैं—