पातञ्जल योगदर्शन (भाष्य सहित)
Patanjali Yoga Darshan
महर्षि पतञ्जलि / हरिकृष्णदास गोयन्दका द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसाधनपाद-२ ५९
सम्बन्ध— दृश्य और द्रष्टाके स्वरूपका वर्णन करनेके बाद अब दृश्यके स्वरूपकी सार्थकताका प्रतिपादन करते हैं—
तदर्थ एव दृश्यस्याऽऽत्मा ॥२१॥
‘(उक्त) दृश्यका स्वरूप उस (द्रष्टा) के लिये ही है।’
व्याख्या— उक्त द्रष्टाको अपने दर्शनद्वारा भोग प्रदान करनेके लिये और द्रष्टाके निज स्वरूपका दर्शन कराकर अपवर्ग (मुक्ति) प्रदान करनेके लिये—इस प्रकार पुरुषका प्रयोजन सिद्ध करनेके लिये ही दृश्य है। इसीमें उसके होनेकी सार्थकता है। अठारहवें सूत्रमें दृश्यके लक्षणोंका वर्णन करते समय भी यही बात कही गयी है ॥२१॥
सम्बन्ध— पुरुषको अपवर्ग प्रदान कर देनेके बाद प्रकृतिका कोई कार्य शेष नहीं रहता, फिर उसका बना रहना निरर्थक है, अतः उसका अभाव हो जाना चाहिये; इसपर कहते हैं—
कृतार्थं प्रति नष्टमप्यनष्टं तदन्यसाधारणत्वात् ॥२२॥
‘जिसका भोग और अपवर्गरूप कार्य पूर्ण कर दिया, उस पुरुषके लिये नाशको प्राप्त हुई भी वह प्रकृति नष्ट नहीं होती; क्योंकि दूसरोंके लिये भी वह समान है।’
व्याख्या— प्रकृतिका प्रयोजन किसी एक ही पुरुषके लिये भोग और अपवर्ग प्रदान करना नहीं है, वह तो सभी पुरुषोंके लिये समान है। अतः जिसका कार्य वह कर चुकी, उस कृतार्थ—मुक्त पुरुषके लिये उसकी आवश्यकता न रहनेके कारण यद्यपि वह नष्ट हो जाती है, तो भी दूसरे सब जीवोंको भोग और अपवर्ग