भारतकोश
पातञ्जल योगदर्शन (भाष्य सहित)

पातञ्जल योगदर्शन (भाष्य सहित)

Patanjali Yoga Darshan

महर्षि पतञ्जलि / हरिकृष्णदास गोयन्दका द्वारा

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५८ पातञ्जलयोगदर्शन

उपनिषद् और गीतामें जिसका वर्णन अव्यक्त नामसे किया गया है (कठ० १।३।११; गीता १३।५), उसका नाम 'अलिङ्ग' है। साम्यावस्थाको प्राप्त गुणोंके स्वरूपकी अभिव्यक्ति नहीं होती, इसलिये प्रकृतिको अलिङ्ग (चिह्नरहित—अव्यक्त) कहते हैं।

इस प्रकार चार अवस्थाओंमें विद्यमान रहनेवाले ये सत्त्वादि गुण ही दृश्य नामसे कहे गये हैं॥१९॥

सम्बन्ध—अब द्रष्टाके स्वरूपका वर्णन करते हैं—

द्रष्टा दृशिमात्रः शुद्धोऽपि प्रत्ययानुपश्यः ॥२०॥

'चेतनमात्र (ज्ञानस्वरूप आत्मा) द्रष्टा है, यह यद्यपि स्वभावसे सर्वथा शुद्ध (निर्विकार) है, तो भी (बुद्धिके सम्बन्धसे) बुद्धिवृत्तिके अनुरूप देखनेवाला है।'

व्याख्या—केवल चेतनमात्र ही जिसका स्वरूप है, ऐसा आत्मतत्त्व स्वरूपसे सर्वथा शुद्ध, निर्विकार है, तो भी बुद्धिके सम्बन्धसे बुद्धिवृत्तिके अनुरूप देखनेवाला होनेसे 'द्रष्टा' कहलाता है।

'वास्तवमें द्रष्टा पुरुष (आत्मतत्त्व) सर्वथा शुद्ध, निर्विकार, कूटस्थ, असङ्ग है, तथापि इसका सम्बन्ध प्रकृतिके साथ अनादिसिद्ध अविद्यासे माना जाता है। जबतक उस अविद्याके नाशद्वारा यह प्रकृतिसे अलग होकर अपने असली स्वरूपमें स्थित नहीं हो जाता, तबतक बुद्धिके साथ एकताको प्राप्त हुआ-सा बुद्धिकी वृत्तियोंको देखता रहता है; और जबतक उनको देखता है, तभीतक इसकी 'द्रष्टा' संज्ञा है। दृश्यका सम्बन्ध न रहनेपर द्रष्टा किसका ? फिर तो यह केवल चेतनमात्र, सर्वथा शुद्ध और निर्विकार है ही ॥२०॥