पातञ्जल योगदर्शन (भाष्य सहित)
Patanjali Yoga Darshan
महर्षि पतञ्जलि / हरिकृष्णदास गोयन्दका द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसाधनपाद-२ ५७
सम्बन्ध—उक्त दृश्यके भेदोंका वर्णन अपने ग्रन्थकी परिभाषामें करते हैं—
विशेषाविशेषलिङ्गमात्रालिङ्गानि गुणपर्वाणि ॥१९॥
‘विशेष, अविशेष, लिङ्गमात्र और अलिङ्ग—ये चार (उपर्युक्त) सत्त्वादि गुणोंके भेद (अवस्थाएँ) हैं।’
व्याख्या—(१) विशेष—पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश—ये पाँच स्थूल भूत तथा पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ, पाँच कर्मेन्द्रियाँ और एक मन—इस प्रकार सब मिलकर सोलहोंका नाम ‘विशेष’ है। गुणोंके विशेष धर्मोंकी अभिव्यक्ति (प्रकटता) इन्हींसे होती है, इसलिये इनको विशेष कहते हैं।
(२) अविशेष—शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध—ये पाँच तन्मात्राएँ हैं, इन्हींको सूक्ष्म महाभूत भी कहते हैं; क्योंकि ये स्थूल पञ्चमहाभूतोंके कारण हैं तथा छठा अहंकार, जो कि मन और इन्द्रियोंका कारण है, इन छहोंका नाम ‘अविशेष’ है। इनका स्वरूप इन्द्रियगोचर नहीं है, इसलिये इनको अविशेष कहते हैं।
(३) लिङ्गमात्र—उपर्युक्त बाईस तत्त्वोंका कारणभूत जो महत्तत्त्व है, जिसका वर्णन उपनिषदोंमें और गीतामें बुद्धिके नामसे किया गया है (कठ० १।३।१०) उसका नाम ‘लिङ्गमात्र’ है। इसकी उपलब्धि केवल सत्तामात्रसे ही होती है, इस कारण इसको लिङ्गमात्र कहते हैं।
(४) अलिङ्ग—मूल प्रकृति, जो कि तीनों गुणोंकी साम्यावस्था मानी गयी है, महत्तत्त्व जिसका पहला परिणाम (कार्य) है,