भारतकोश
पातञ्जल योगदर्शन (भाष्य सहित)

पातञ्जल योगदर्शन (भाष्य सहित)

Patanjali Yoga Darshan

महर्षि पतञ्जलि / हरिकृष्णदास गोयन्दका द्वारा

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६६ पातञ्जलयोगदर्शन

(३) अस्तेय—दूसरेके स्वत्वका अपहरण करना, छलसे या अन्य किसी उपायसे अन्यायपूर्वक अपना बना लेना स्तेय (चोरी) है, इसमें सरकारी टैक्सकी चोरी और घूसखोरी भी संमिलित है; इन सब प्रकारकी चोरियोंके अभावका नाम 'अस्तेय' है।

(४) ब्रह्मचर्य—मन, वाणी और शरीरसे होनेवाले सब प्रकारके मैथुनोंका सब अवस्थाओंमें सदा त्याग करके सब प्रकारसे वीर्यकी रक्षा करना 'ब्रह्मचर्य' है।* अतः साधकको चाहिये कि न तो कामदीपन करनेवाले पदार्थोंका सेवन करे, न ऐसे दृश्योंको देखे, न ऐसी बातोंको सुने, न ऐसे साहित्यको पढ़े और न ऐसे विचारोंको ही मनमें लावे। तथा स्त्रियोंका और स्त्री-आसक्त पुरुषोंका सङ्ग भी ब्रह्मचर्यमें बाधक है, अतः ऐसे सङ्गसे सदा सावधानीके साथ बचना चाहिये।

(५) अपरिग्रह—अपने स्वार्थके लिये ममतापूर्वक धन, सम्पत्ति और भोग-सामग्रीका सञ्चय करना 'परिग्रह' है, इसके अभावका नाम 'अपरिग्रह' है॥३०॥

**सम्बन्ध—**उक्त यमोंकी सबसे ऊँची अवस्था बतलाते हैं—

जातिदेशकालसमयानवच्छिन्नाः सार्वभौमा महाव्रतम् ॥३१॥

'(उक्त यम) जाति, देश, काल और निमित्तकी सीमासे रहित सार्वभौम होनेपर महाव्रत हो जाते हैं।'


* कर्मणा मनसा वाचा सर्वावस्थासु सर्वदा।
सर्वत्र मैथुनत्यागो ब्रह्मचर्यं प्रचक्षते॥
(गरुड० पूर्व० आचार० २३८। ६)

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