पातञ्जल योगदर्शन (भाष्य सहित)
Patanjali Yoga Darshan
महर्षि पतञ्जलि / हरिकृष्णदास गोयन्दका द्वारा
पृष्ठ 83, कुल 184 में से
संदर्भ में पढ़ेंसाधनपाद-२ ६७
व्याख्या—उक्त अहिंसादिका अनुष्ठान जब सार्वभौम अर्थात् सबके साथ, सब जगह और सब समय समानभावसे किया जाता है, तब ये महाव्रत हो जाते हैं। जैसे किसीने नियम लिया कि मछलीके सिवा अन्य जीवोंकी हिंसा नहीं करूँगा तो यह जाति-अवच्छिन्न अहिंसा है; इसी तरह कोई नियम ले कि मैं तीर्थोंमें हिंसा नहीं करूँगा तो यह देश-अवच्छिन्न अहिंसा है। कोई यह नियम करे कि मैं एकादशी, अमावस्या और पूर्णिमाको हिंसा नहीं करूँगा तो यह कालावच्छिन्न अहिंसा है। कोई नियम करे कि मैं विवाहके अवसरके सिवा अन्य किसी निमित्तसे हिंसा नहीं करूँगा तो यह समयावच्छिन्न (निमित्तसे सम्बन्धित) अहिंसा है। इसी प्रकार सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रहके भी भेद समझ लेने चाहिये। ऐसे यम व्रत तो हैं, परंतु सार्वभौम न होनेके कारण महाव्रत नहीं हैं। उपर्युक्त प्रकारका प्रतिबन्ध न लगाकर जब सभी प्राणियोंके साथ सब देशोंमें सदा-सर्वदा इनका पालन किया जाय, किसी भी निमित्तसे इनमें शिथिलता आनेका अवकाश न दिया जाय, तब ये सार्वभौम होनेपर ‘महाव्रत’ कहलाते हैं ॥३१॥
सम्बन्ध—यमोंका वर्णन करके अब नियमोंका वर्णन करते हैं—
शौचसंतोषतपःस्वाध्यायेश्वरप्रणिधानानि नियमाः ॥३२॥
‘शौच, संतोष, तप, स्वाध्याय और ईश्वर-शरणागति—(ये पाँच) नियम हैं।’
व्याख्या—(१) शौच—जल-मृत्तिकादिके द्वारा शरीर, वस्त्र