भारतकोश
पातञ्जल योगदर्शन (भाष्य सहित)

पातञ्जल योगदर्शन (भाष्य सहित)

Patanjali Yoga Darshan

महर्षि पतञ्जलि / हरिकृष्णदास गोयन्दका द्वारा

DevanagariHindipublished184 पृष्ठ

पृष्ठ 86, कुल 184 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 86

७० पातञ्जलयोगदर्शनं

और कभी भयङ्कर रूपमें साधकके सामने उपस्थित होकर उसे सताते हैं। उस समय साधकको सावधान होकर विचार करना चाहिये कि ये हिंसादि दोष महान् हानिकारक और नरकमें ले जानेवाले हैं, इनका परिणाम बारंबार दुःख भोगना और अज्ञानके वशमें होकर शूकर-कूकर आदि मूढ योनियोंमें पड़ना है; अतः इनसे सर्वथा दूर रहकर दृढ़तापूर्वक यम-नियमोंका पालन करते रहना चाहिये। इस प्रकारके विचारोंको बारंबार करते रहना ही ‘प्रतिपक्षकी भावना’ है ॥३४॥

सम्बन्ध— इस प्रकार यम-नियमोंके विरोधी हिंसादिको हटानेका उपाय उनमें दोष देखना बतलाकर अब यम-नियमोंमें प्रीति उत्पन्न करनेके लिये उनके पालनका भिन्न-भिन्न फल बतलाते हैं—

अहिंसाप्रतिष्ठायां तत्सन्निधौ वैरत्यागः ॥३५॥

‘अहिंसाकी दृढ़ स्थिति हो जानेपर उस योगीके निकट सब प्राणी वैरका त्याग कर देते हैं।’

व्याख्या— जब योगीका अहिंसाभाव पूर्णतया दृढ स्थिर हो जाता है, तब उसके निकटवर्ती हिंसक जीव भी वैरभावसे रहित हो जाते हैं। इतिहासग्रन्थोंमें जहाँ मुनियोंके आश्रमोंकी शोभाका वर्णन आता है, वहाँ वनचर जीवोंमें भी स्वाभाविक वैरका अभाव दिखलाया गया है, यह उन ऋषियोंके अहिंसाभावकी प्रतिष्ठाका द्योतक है * ॥३५॥


* वाल्मीकीय रामायण वनकाण्डमें अगस्त्याश्रमके वर्णनमें आता है—
यदाप्रभृति चाक्रान्ता दिगियं पुण्यकर्मणा।
तदाप्रभृति निर्वैराः प्रशान्ता रजनीचराः॥

पातञ्जल योगदर्शन (भाष्य सहित) · पृष्ठ 86, कुल 184 में से · BharatKosha