पातञ्जल योगदर्शन (भाष्य सहित)
Patanjali Yoga Darshan
महर्षि पतञ्जलि / हरिकृष्णदास गोयन्दका द्वारा
पृष्ठ 85, कुल 184 में से
संदर्भ में पढ़ेंसाधनपाद-२ ६९
मनमें अहिंसादिके विरोधी भाव बाधा पहुँचावें अर्थात् हिंसा, झूठ, चोरी आदिमें प्रवृत्त होकर यम-नियमादिका त्याग कर देनेकी परिस्थिति उत्पन्न कर दें तो उस समय उन विरोधी विचारोंका नाश करनेके लिये उन विचारोंमें दोषदर्शनरूप प्रतिपक्षकी भावना करनी चाहिये ॥३३॥
सम्बन्ध— इस दोषदर्शनरूप प्रतिपक्षभावनाका ही अगले सूत्रमें वर्णन करते हैं—
वितर्का हिंसादयः कृतकारितानुमोदिता लोभक्रोध-
मोहपूर्वका मृदुमध्याधिमात्रा दुःखाज्ञानानन्त-
फला इति प्रतिपक्षभावनम् ॥३४॥
'( यम और नियमोंके विरोधी ) हिंसा आदि वितर्क कहलाते हैं । ( वे तीन प्रकारके होते हैं—) स्वयं किये हुए, दूसरोंसे करवाये हुए और अनुमोदित किये हुए । इनके कारण लोभ, क्रोध और मोह हैं । इनमें भी कोई छोटा, कोई मध्यम और कोई बहुत बड़ा होता है । ये दुःख और अज्ञानरूप अनन्त फल देनेवाले हैं—इस प्रकार ( विचार करना ही ) प्रतिपक्षकी भावना है ।'
व्याख्या— स्वयं किये हुए, दूसरोंसे करवाये हुए और दूसरेको करते देखकर अनुमोदन किये हुए—इस तरह तीन प्रकारसे होने-वाले हिंसा, झूठ, चोरी और व्यभिचार आदि अवगुण, जो कि यम-नियमोंके विरोधी हैं, उनका नाम 'वितर्क' है । ये दोष कभी लोभसे, कभी क्रोधसे और कभी मोहसे एवं कभी छोटे रूपमें, कभी मध्यम