पातञ्जल योगदर्शन (भाष्य सहित)
Patanjali Yoga Darshan
महर्षि पतञ्जलि / हरिकृष्णदास गोयन्दका द्वारा
साधनपाद-२ ६९
मनमें अहिंसादिके विरोधी भाव बाधा पहुँचावें अर्थात् हिंसा, झूठ, चोरी आदिमें प्रवृत्त होकर यम-नियमादिका त्याग कर देनेकी परिस्थिति उत्पन्न कर दें तो उस समय उन विरोधी विचारोंका नाश करनेके लिये उन विचारोंमें दोषदर्शनरूप प्रतिपक्षकी भावना करनी चाहिये ॥३३॥
सम्बन्ध— इस दोषदर्शनरूप प्रतिपक्षभावनाका ही अगले सूत्रमें वर्णन करते हैं—
वितर्का हिंसादयः कृतकारितानुमोदिता लोभक्रोध-
मोहपूर्वका मृदुमध्याधिमात्रा दुःखाज्ञानानन्त-
फला इति प्रतिपक्षभावनम् ॥३४॥
'( यम और नियमोंके विरोधी ) हिंसा आदि वितर्क कहलाते हैं । ( वे तीन प्रकारके होते हैं—) स्वयं किये हुए, दूसरोंसे करवाये हुए और अनुमोदित किये हुए । इनके कारण लोभ, क्रोध और मोह हैं । इनमें भी कोई छोटा, कोई मध्यम और कोई बहुत बड़ा होता है । ये दुःख और अज्ञानरूप अनन्त फल देनेवाले हैं—इस प्रकार ( विचार करना ही ) प्रतिपक्षकी भावना है ।'
व्याख्या— स्वयं किये हुए, दूसरोंसे करवाये हुए और दूसरेको करते देखकर अनुमोदन किये हुए—इस तरह तीन प्रकारसे होने-वाले हिंसा, झूठ, चोरी और व्यभिचार आदि अवगुण, जो कि यम-नियमोंके विरोधी हैं, उनका नाम 'वितर्क' है । ये दोष कभी लोभसे, कभी क्रोधसे और कभी मोहसे एवं कभी छोटे रूपमें, कभी मध्यम
७० पातञ्जलयोगदर्शनं
और कभी भयङ्कर रूपमें साधकके सामने उपस्थित होकर उसे सताते हैं। उस समय साधकको सावधान होकर विचार करना चाहिये कि ये हिंसादि दोष महान् हानिकारक और नरकमें ले जानेवाले हैं, इनका परिणाम बारंबार दुःख भोगना और अज्ञानके वशमें होकर शूकर-कूकर आदि मूढ योनियोंमें पड़ना है; अतः इनसे सर्वथा दूर रहकर दृढ़तापूर्वक यम-नियमोंका पालन करते रहना चाहिये। इस प्रकारके विचारोंको बारंबार करते रहना ही ‘प्रतिपक्षकी भावना’ है ॥३४॥
सम्बन्ध— इस प्रकार यम-नियमोंके विरोधी हिंसादिको हटानेका उपाय उनमें दोष देखना बतलाकर अब यम-नियमोंमें प्रीति उत्पन्न करनेके लिये उनके पालनका भिन्न-भिन्न फल बतलाते हैं—
अहिंसाप्रतिष्ठायां तत्सन्निधौ वैरत्यागः ॥३५॥
‘अहिंसाकी दृढ़ स्थिति हो जानेपर उस योगीके निकट सब प्राणी वैरका त्याग कर देते हैं।’
व्याख्या— जब योगीका अहिंसाभाव पूर्णतया दृढ स्थिर हो जाता है, तब उसके निकटवर्ती हिंसक जीव भी वैरभावसे रहित हो जाते हैं। इतिहासग्रन्थोंमें जहाँ मुनियोंके आश्रमोंकी शोभाका वर्णन आता है, वहाँ वनचर जीवोंमें भी स्वाभाविक वैरका अभाव दिखलाया गया है, यह उन ऋषियोंके अहिंसाभावकी प्रतिष्ठाका द्योतक है * ॥३५॥
* वाल्मीकीय रामायण वनकाण्डमें अगस्त्याश्रमके वर्णनमें आता है—
यदाप्रभृति चाक्रान्ता दिगियं पुण्यकर्मणा।
तदाप्रभृति निर्वैराः प्रशान्ता रजनीचराः॥
पातञ्जलयोगदर्शन
वाल्मीकि-आश्रम
अहिंसाप्रतिष्ठायां तत्सन्निधौ वैरत्यागः ॥ ( २ । ३५ )
खग मृग विपुल कोलाहल करहीं। बिरहित बैर मुदित मन चरहीं ॥
करि केहरि कपि कोल कुरंगा। बिगत बैर बिचरहिं सब संगा ॥
[मुद्रा: पुस्तकालय श्री १०८ ...]
साधनपाद-२ ७१
सत्यप्रतिष्ठायां क्रियाफलाश्रयत्वम् ॥३६॥
'सत्यकी दृढ स्थिति हो जानेपर (योगीमें) क्रियाफलके आश्रयका भाव (आ जाता है)।'
व्याख्या— जब योगी सत्यका पालन करनेमें पूर्णतया परिपक्व हो जाता है, उसमें किसी प्रकारकी कमी नहीं रहती, उस समय वह योगी कर्तव्यपालन रूप क्रियाओंके फलका आश्रय बन जाता है। जो कर्म किसीने नहीं किया है, उसका भी फल उसे प्रदान कर देनेकी शक्ति उस योगीमें आ जाती है अर्थात् जिसको जो वरदान, शाप या आशीर्वाद देता है, वह सत्य हो जाता है ॥३६॥
अस्तेयप्रतिष्ठायां सर्वरत्नोपस्थानम् ॥३७॥
'चोरीके अभावकी दृढ स्थिति हो जानेपर (उस योगीके सामने) सब प्रकारके रत्न प्रकट हो जाते हैं।'
व्याख्या— जब साधकमें चोरीका अभाव पूर्णतया प्रतिष्ठित
अयं दीर्घायुषस्तस्य लोके विश्रुतकर्मणः ।
अगस्त्यस्याश्रमः श्रीमान् विनीतमृगसेवितः ॥
नात्र जीवेन्मृषावादी क्रूरो वा यदि वा शठः ।
नृशंसः पापवृत्तो वा मुनिरेष तथाविधः ॥
(सर्ग ११ । ८३, ८६, ९०)
तुलसीकृत रामायणके अयोध्याकाण्डमें भी आया है—
खग मृग बिपुल कोलाहल करहीं । बिरहित बैर मुदित मन चरहीं ॥
(वाल्मीकि-आश्रमवर्णन)
तथा—
बयरु बिहाइ चरहिं एक संगा । जहँ तहँ मनहुँ सेन चतुरंगा ॥
(चित्रकूट-वर्णन)
७२ पातञ्जलयोगदर्शन
हो जाता है, तब पृथ्वीमें जहाँ-कहाँ भी गुप्त स्थानमें पड़े हुए समस्त रत्न उसके सामने प्रकट हो जाते हैं अर्थात् उसकी जानकारीमें आ जाते हैं ॥३७॥
ब्रह्मचर्यप्रतिष्ठायां वीर्यलाभः ॥३८॥
‘ब्रह्मचर्यकी दृढ़ स्थिति हो जानेपर सामर्थ्यका लाभ होता है।’
व्याख्या— जब साधकमें ब्रह्मचर्यकी पूर्णतया दृढ़ स्थिति हो जाती है, तब उसके मन, बुद्धि, इन्द्रिय और शरीरमें अपूर्व शक्ति-का प्रादुर्भाव हो जाता है; साधारण मनुष्य किसी काममें भी उसकी बराबरी नहीं कर सकते ॥ ३८ ॥
अपरिग्रहस्थैर्ये जन्मकथन्तासंबोधः ॥३६॥
‘अपरिग्रहकी स्थिति हो जानेपर पूर्वजन्म कैसे हुए थे, इस बातका भलीभाँति ज्ञान हो जाता है।’
व्याख्या— जब योगीमें अपरिग्रहका भाव पूर्णतया स्थिर हो जाता है, तब उसे अपने पूर्वजन्मोंकी और वर्तमान जन्मकी सब बातें मालूम हो जाती हैं; अर्थात् मैं पहले किस योनिमें हुआ था, मैंने उस समय क्या-क्या काम किये, किस प्रकार रहा—ये सब स्मरण हो जाते हैं और इस जन्मकी भी बीती हुई सब बातें स्मरण हो जाती हैं। यह ज्ञान भी संसारमें वैराग्य उत्पन्न करनेवाला और जन्म-मरणसे छुटकारा पानेके लिये योगसाधनमें प्रवृत्त करने-वाला है।
यहाँतक यमोंकी सिद्धिका जो फल बतलाया गया है, उसके सिवा
साधनपाद-२ ७३
निष्कामभावसे यमोंका सेवन करनेसे कैवल्यकी प्राप्तिमें भी सहायता मिलती है ॥३९॥
**सम्बन्ध—**अब नियमोंके पालनका फल बतलाते हैं; परंतु इन सूत्रोंमें पूर्ण प्रतिष्ठाकी शर्त नहीं रक्खी गयी है। इससे यह मालूम होता है कि साधक इनका जितना अभ्यास करता है, उतना ही उसे लाभ मिलता चला जाता है। सबसे पहले अगले सूत्रमें बाह्य शौचका फल बतलाते हैं—
शौचात्स्वाङ्गजुगुप्सा परैरसंसर्गः ॥४०॥
‘शौचके अभ्याससे अपने अङ्गोंमें घृणा और दूसरोंसे संसर्ग न करनेकी इच्छा उत्पन्न होती है।’
**व्याख्या—**बाह्य शुद्धिके अभ्याससे साधककी अपने शरीरमें अपवित्र बुद्धि होकर उसमें वैराग्य हो जाता है अर्थात् उसमें आसक्ति नहीं रहती और दूसरे सांसारिक मनुष्योंके सङ्गमें भी प्रवृत्ति या आसक्ति नहीं रहती ॥४०॥
**सम्बन्ध—**भीतरकी शुद्धिका फल बतलाते हैं—
सत्त्वशुद्धिसौमनस्यैकाग्र्येन्द्रियजयात्मदर्शन-
योग्यत्वानि च ॥४१॥
‘अन्तःकरणकी शुद्धि, मनमें प्रसन्नता, चित्तकी एकाग्रता, इन्द्रियोंका वशमें होना और आत्मसाक्षात्कारकी योग्यता—ये पाँचों भी होते हैं।’
**व्याख्या—**मैत्री आदिकी भावनाके द्वारा अथवा जप, तप आदि अन्य किसी साधनद्वारा आन्तरिक शौचके लिये अभ्यास करनेसे राग, द्वेष, ईर्ष्या आदि मलोंका अभाव होकर मनुष्यका अन्तःकरण निर्मल और स्वच्छ हो
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जाता है। मनकी व्याकुलताका नाश होकर उसमें सदैव प्रसन्नता बनी रहती है, विक्षेप-दोषका नाश होकर एकाग्रता आ जाती है और सब इन्द्रियाँ मनके वशमें हो जाती हैं, अतः उसमें आत्मदर्शन-की योग्यता आ जाती है।
इस प्रकार इसके ऊपरवाले सूत्रमें तो बाह्य शौचका फल बतलाया गया है और इसमें भीतरकी शुद्धिके अभ्यासका फल बतलाया गया है ॥४१॥
संतोषादनुत्तमसुखलाभः ॥४२॥
'सन्तोषसे ऐसे सर्वोत्तम सुखका लाभ होता है, जिससे उत्तम दूसरा कोई सुख नहीं है।'
व्याख्या—सन्तोषके अभ्याससे तृष्णाका अभाव हो जाता है, उस अवस्थामें जो सात्त्विक सुख मिलता है (गीता १८। ३६-३७), उसकी बराबरी दूसरा कोई सांसारिक सुख नहीं कर सकता ॥४२॥
कायेन्द्रियसिद्धिरशुद्धिक्षयात्तपसः ॥४३॥
'तपके प्रभावसे जब अशुद्धिका नाश हो जाता है, तब शरीर और इन्द्रियोंकी सिद्धि हो जाती है।'
व्याख्या—स्वधर्मपालनके लिये व्रत-उपवास आदि करने या अन्य सब प्रकारके कष्ट सहन करनेका नाम 'तप' है (योग-२।१ की टीका)। इसके अभ्याससे शरीर और इन्द्रियोंके मलका नाश हो जाता है, तब योगीका शरीर स्वस्थ, स्वच्छ और हल्का हो जाता है तथा तीसरे पादके पैंतालीसवें और छियालीसवें सूत्रमें बतलायी हुई काय-संपद्रूप शरीर-सम्बन्धी सिद्धियाँ
साधनपाद-२
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प्राप्त हो जाती हैं एवं सूक्ष्म, दूरदेशमें और व्यवधानयुक्त स्थानमें स्थित विषयोंको देखना, सुनना आदि इन्द्रियसम्बन्धी सिद्धि भी प्राप्त हो जाती है ॥४३॥
स्वाध्यायादिष्टदेवतासंप्रयोगः ॥४४॥
'स्वाध्यायसे इष्टदेवताकी भलीभाँति प्राप्ति (साक्षात्कार) हो जाती है।'
व्याख्या— शास्त्राभ्यास और मन्त्रजपरूप स्वाध्यायके प्रभावसे योगी जिस इष्टदेवका दर्शन करना चाहता है, उसीका दर्शन हो जाता है ॥४४॥
समाधिसिद्धिरीश्वरप्रणिधानात् ॥४५॥
'ईश्वर-प्रणिधानसे समाधिकी सिद्धि हो जाती है।'
व्याख्या— ईश्वरकी शरणागतिसे योगसाधनमें आनेवाले विघ्नोंका नाश होकर शीघ्र ही समाधि निष्पन्न हो जाती है (योग० १।२३), क्योंकि ईश्वरपर निर्भर रहनेवाला साधक तो केवल तत्परतासे साधन करता रहता है, उसे साधनके परिणामकी चिन्ता नहीं रहती । उसके साधनमें आनेवाले विघ्नोंको दूर करनेका और साधनकी सिद्धिका भार ईश्वरके जिम्मे पड़ जाता है, अतः साधनका अनायास और शीघ्र पूर्ण होना स्वाभाविक ही है ॥४५॥
सम्बन्ध— यहाँतक यम और नियमोंका फलसहित वर्णन किया गया; अब आसनके लक्षण, उपाय और उसका फल क्रमसे बतलाते हैं—
७६ पातञ्जलयोगदर्शन
स्थिरसुखमासनम् ॥४६॥
‘निश्चल (हलन-चलनसे रहित) सुखपूर्वक बैठनेका नाम ‘आसन’ है।’
व्याख्या—हठयोगमें आसनोंके बहुत भेद बतलाये गये हैं, परंतु यहाँ सूत्रकारने उनका वर्णन नहीं करके बैठनेका तरीका साधककी इच्छापर ही छोड़ दिया है। भाव यह है कि जो साधक अपनी योग्यताके अनुसार जिस रीतिसे बिना हिले-डुले स्थिरभावसे सुखपूर्वक बिना किसी प्रकारकी पीड़ाके बहुत समयतक बैठ सके, वही आसन उसके लिये उपयुक्त है। इसके सिवा, जिसपर बैठकर साधन किया जाता है, उसका नाम भी आसन है; अतः वह भी स्थिर और सुखपूर्वक बैठनेलायक होना चाहिये* ॥४६॥
प्रयत्नशैथिल्यानन्तसमापत्तिभ्याम् ॥४७॥
‘( उक्त आसन ) प्रयत्नकी शिथिलतासे और अनन्त ( परमात्मा ) में मन लगानेसे सिद्ध होता है।’
व्याख्या—शरीरको सीधा और स्थिर करके सुखपूर्वक बैठ जानेके बाद शरीरसम्बन्धी सब प्रकारकी चेष्टाओंका त्याग कर देना ही प्रयत्नकी शिथिलता है; इससे और परमात्मामें मन लगानेसे—इन दो उपायोंसे आसनकी सिद्धि होती है।
यहाँ बहुत-से टीकाकारोंने अनन्तका अर्थ शेषनाग और समापत्तिका अर्थ समाधि किया है। भोजराजाने अनन्तका अर्थ
*श्रीमद्भगवद्गीतामें जिस आसनपर बैठकर योगाभ्यास करनेके लिये कहा है, उसे स्थिर और अचल स्थापन करनेके लिये कहा है और उसपर बैठनेका तरीका इस प्रकार बतलाया है कि शरीर, गला और सिर-ये तीनों सीधे और स्थिर रहें, वहाँ भी किसी विशेष आसनका नाम नहीं दिया है (देखिये गीता अ० ६, श्लोक ११से १३ तक)।
साधनपाद-२ ७७
आकाशादि किया है और समापत्तिका अर्थ चित्तका तद्रूप हो जाना किया है; किन्तु योगके अङ्गोंमें समाधि अन्तिम अङ्ग है, उसीके लिये आसन आदि अङ्गोंका अनुष्ठान है । आसनको समाधिका बहिरङ्ग साधन भी बतलाया गया है । अतः किसी प्रकारकी भी समाधिको आसनकी स्थिरताका उपाय बतलाना युक्तिसङ्गत नहीं होता । सज्जन विद्वान् अनुभवी महानुभाव इसपर विचार करें ॥४७॥
ततो द्वन्द्वानभिघातः ॥४८॥
'उस (आसनकी सिद्धि) से (शीत-उष्ण आदि) द्वन्द्वोंका आघात नहीं लगता ।'
व्याख्या—आसन सिद्ध हो जानेसे शरीरपर सर्दी-गर्मी आदि द्वन्द्वोंका प्रभाव नहीं पड़ता, शरीरमें उन सबको बिना किसी प्रकारकी पीड़ाके सहन करनेकी शक्ति आ जाती है । अतः वे द्वन्द्व चित्तको चञ्चल बनाकर साधनमें विघ्न नहीं डाल सकते ॥४८॥
सम्बन्ध—अब प्राणायामका सामान्य लक्षण बतलाते हैं—
तस्मिन् सति श्वासप्रश्वासयोर्गतिविच्छेदः प्राणायामः ॥४९॥
'आसन सिद्ध होनेके बाद श्वास और प्रश्वासकी गतिका रुक जाना 'प्राणायाम' है ।'
व्याख्या—प्राणवायुका शरीरमें प्रविष्ट होना श्वास है और बाहर निकलना प्रश्वास है । इन दोनोंकी गतिका रुक जाना अर्थात् प्राणवायुकी गमनागमनरूप क्रियाका बंद हो जाना ही प्राणायामका सामान्य लक्षण है ।
७८ पातञ्जलयोगदर्शन
यहाँ आसनकी सिद्धिके बाद प्राणायामका सम्पन्न होना बतलाया है। इससे यह प्रतीत होता है कि आसनकी स्थिरताका अभ्यास किये बिना ही जो प्राणायाम करते हैं, वे गलत रास्तेपर हैं। प्राणायामका अभ्यास करते समय आसनकी स्थिरता परम आवश्यक है ॥४९॥
**सम्बन्ध—**उक्त प्राणायामके भेदोंको समझानेके लिये तीन प्रकारके प्राणायामोंका वर्णन करते हैं—
बाह्याभ्यन्तरस्तम्भवृत्तिर्देशकालसंख्याभिः परिदृष्टो दीर्घसूक्ष्मः ॥५०॥
'( उक्त प्राणायाम ) बाह्यवृत्ति, आभ्यन्तरवृत्ति और स्तम्भवृत्ति (ऐसे तीन प्रकारका) होता है। ( तथा वह ) देश, काल और संख्याद्वारा देखा जाता हुआ लंबा और हल्का ( होता जाता है ) ।'
**व्याख्या—**अगले सूत्रमें जिस प्राणायामके लक्षण किये गये हैं, उसे चौथा प्राणायाम बताया है। इससे यह सिद्ध होता है कि इस सूत्रमें तीन प्रकारके प्राणायामोंका वर्णन है और उन तीनों प्रकारके ही प्राणायामोंको साधक देश, काल और संख्याद्वारा देखता रहता है कि वे किस अवस्थातक पहुँच चुके हैं। इस प्रकार परीक्षा करते-करते वे प्राणायाम जैसे-जैसे उन्नत होते जाते हैं, वैसे-ही-वैसे उनमें लंबाई और हल्कापन बढ़ता चला जाता है। इससे यह सिद्ध होता है कि स्तम्भवृत्तिरूप तृतीय प्राणायाममें भी देशका सम्बन्ध रहता है, अन्यथा वह देश, काल और संख्याद्वारा परिदृष्ट कैसे होगा ? प्राणायामके तीन भेद इस प्रकार समझने चाहिये—
साधनपाद-२ \hfill ७९
( १ ) बाह्यवृत्ति—प्राणवायुको शरीरसे बाहर निकालकर बाहर ही जितने कालतक सुखपूर्वक रुक सके, रोके रखना और साथ-ही-साथ इस बातकी भी परीक्षा करते रहना कि वह बाहर आकर कहाँ ठहरा है, कितने समयतक ठहरा है और उतने समयमें स्वाभाविक प्राणकी गतिकी कितनी संख्या होती है। यह 'बाह्यवृत्ति प्राणायाम' है; इसे 'रेचक' भी कहते हैं; क्योंकि इसमें रेचनपूर्वक प्राणको रोका जाता है। अभ्यास करते-करते यह दीर्घ (लंबा) अर्थात् बहुत कालतक रुके रहनेवाला और सूक्ष्म अर्थात् हल्का (अनायास-साध्य) हो जाता है।
( २ ) आभ्यन्तरवृत्ति—प्राणवायुको भीतर ले जाकर भीतर ही जितने कालतक सुखपूर्वक रुक सके, रोके रखना और साथ-साथ यह देखते रहना कि आभ्यन्तर देशमें कहाँतक जाकर प्राण रुकता है, वहाँ कितने कालतक सुखपूर्वक ठहरता है और उतने समयमें प्राणकी स्वाभाविक गतिकी कितनी संख्या होती है। यह 'आभ्यन्तर' प्राणायाम है; इसे 'पूरक' प्राणायाम भी कहते हैं, क्योंकि इसमें शरीरके अंदर ले जाकर प्राणको रोका जाता है। अभ्यासबल-से यह भी दीर्घ और सूक्ष्म होता जाता है।
( ३ ) स्तम्भवृत्ति—शरीरके भीतर जाने और बाहर निकलने-वाली जो प्राणोंकी स्वाभाविक गति है, उसे प्रयत्नपूर्वक बाहर या भीतर लाने या ले जानेका अभ्यास न करके प्राणवायु स्वभावसे बाहर निकला हो या भीतर गया हो, जहाँ हो, वहीं उसकी गतिको स्तम्भित कर देना (रोक देना) और यह देखते रहना कि प्राण किस देशमें रुके हैं, कितने समयतक सुखपूर्वक रुके रहते हैं, इस
८० | पातञ्जलयोगदर्शन
समयमें स्वाभाविक गतिकी कितनी संख्या होती है, यह 'स्तम्भवृत्ति' प्राणायाम है; इसे 'कुम्भक' प्राणायाम भी कहते हैं। अभ्यासबलसे यह भी दीर्घ और सूक्ष्म होता है। कोई-कोई टीकाकार इसे केवल कुम्भक कहते हैं और कोई-कोई चौथे प्राणायामको केवल कुम्भक कहते हैं। इस तीसरे और अगले सूत्रमें बतलाये हुए चौथे प्राणायामके भेदका निर्णय करनेमें बहुत मतभेद है।
साधक किसी भी प्राणायामका अभ्यास करें, उसके साथ मन्त्र अवश्य रहना चाहिये ॥५०॥
सम्बन्ध—चौथे प्राणायामका वर्णन करते हैं—
बाह्याभ्यन्तरविषयाक्षेपी चतुर्थः ॥५१॥
'बाहर और भीतरके विषयोंका त्याग कर देनेसे अपने-आप होनेवाला चौथा प्राणायाम है।'
व्याख्या—बाहर और भीतरके विषयोंके चिन्तनका त्याग कर देनेसे अर्थात् इस समय प्राण बाहर निकल रहे हैं या भीतर जा रहे हैं अथवा चल रहे हैं कि ठहरे हुए हैं, इस जानकारीका त्याग करके मनको इष्टचिन्तनमें लगा देनेसे देश, काल और संख्याके ज्ञानके बिना ही अपने-आप जो प्राणोंकी गति जिस किसी देशमें रुक जाती है, वह चौथा प्राणायाम है। यह पहले बतलाये हुए तीन प्रकारके प्राणायामोंसे सर्वथा भिन्न है, यह बात दिखलानेके लिये सूत्रमें 'चतुर्थः' पदका प्रयोग किया गया है।
यह अनायास होनेवाला राजयोगका प्राणायाम है। इसमें मनकी चञ्चलता शान्त होनेके कारण अपने-आप प्राणोंकी गति रुकती है और पहले बतलाये हुए प्राणायामोंमें प्रयत्नद्वारा प्राणोंकी
३. तृतीय पाद — विभूतिपाद (सूत्र १-५५)
साधनपाद-२ <span style="float: right;">८१</span>
गतिको रोकनेका अभ्यास करते-करते प्राणोंकी गतिका निरोध होता है, यही इसकी विशेषता है ॥५१॥
ततः क्षीयते प्रकाशावरणम् ॥५२॥
‘उस ( प्राणायामके अभ्यास ) से प्रकाश ( ज्ञान ) का आवरण क्षीण हो जाता है।’
व्याख्या—जैसे-जैसे मनुष्य प्राणायामका अभ्यास करता है, वैसे-ही-वैसे उसके सञ्चित कर्म-संस्कार और अविद्यादि क्लेश दुर्बल होते चले जाते हैं। ये कर्म-संस्कार और अविद्यादि क्लेश ही ज्ञानका आवरण ( परदा ) है। इस परदेके कारण ही मनुष्यका ज्ञान ढका रहता है, अतः वह मोहित हुआ रहता है। जब यह परदा दुर्बल होते-होते सर्वथा क्षीण हो जाता है, तब साधकका ज्ञान सूर्यकी भाँति प्रकाशित हो जाता है। इसलिये साधकको प्राणायामका अभ्यास अवश्य करना चाहिये। ५२।
सम्बन्ध—प्राणायामका दूसरा फल बतलाते हैं—
धारणासु च योग्यता मनसः ॥५३॥
‘तथा धारणाओंमें मनकी योग्यता भी हो जाती है।’
व्याख्या—प्राणायामके अभ्याससे मनमें धारणाकी योग्यता आ जाती है यानी उसे चाहे जिस जगह अनायास ही स्थिर किया जा सकता है ॥५३॥
सम्बन्ध—अब प्रत्याहारके लक्षण बतलाते हैं—
स्वविषयासंप्रयोगे चित्तस्वरूपानुकार इवेन्द्रियाणां प्रत्याहारः ॥५४॥
‘अपने विषयोंके सम्बन्धसे रहित होनेपर जो इन्द्रियोंका चित्तके स्वरूपमें तदाकार हो जाना है, वह ‘प्रत्याहार’ है।’
पा० यो० द० ६—
८२ पातञ्जलयोगदर्शन
**व्याख्या—**उक्त प्रकारसे प्राणायामका अभ्यास करते-करते मन और इन्द्रियाँ शुद्ध हो जाते हैं, उसके बाद इन्द्रियोंकी बाह्यवृत्तिको सब ओरसे समेटकर मनमें विलीन करनेके अभ्यासका नाम 'प्रत्याहार' है। जब साधनकालमें साधक इन्द्रियोंके विषयोंका त्याग करके चित्तको अपने ध्येयमें लगाता है, उस समय जो इन्द्रियोंका विषयोंकी ओर न जाकर चित्तमें विलीन-सा हो जाना है, यह प्रत्याहार सिद्ध होनेकी पहचान है। यदि उस समय भी इन्द्रियाँ पहलेके अभ्याससे इसके सामने बाह्य विषयोंका चित्र उपस्थित करती रहें तो समझना चाहिये कि प्रत्याहार नहीं हुआ। उपनिषदोंमें भी 'वाक्' शब्दसे उपलक्षित इन्द्रियोंको मनमें निरुद्ध करनेकी बात कहकर यही भाव दिखलाया है* ॥५४॥
**सम्बन्ध—**अब प्रत्याहारका फल बतलाकर इस द्वितीय पादकी समाप्ति करते हैं—
ततः परमा वश्यतेन्द्रियाणाम् ॥५५॥
'उससे (प्रत्याहारसे) इन्द्रियोंकी परम वश्यता हो जाती है।'
**व्याख्या—**प्रत्याहार सिद्ध हो जानेपर योगीकी इन्द्रियाँ उसके सर्वथा वशमें हो जाती हैं, उनकी स्वतन्त्रताका सर्वथा अभाव हो जाता है। प्रत्याहारकी सिद्धि हो जानेके बाद इन्द्रियविजयके लिये अन्य साधनकी आवश्यकता नहीं रहती ॥५५॥
* यच्छेद्वाङ्मनसी प्राज्ञः । (कठ० १।३।१३)
'बुद्धिमान् मनुष्यको उचित है कि वह वाक् आदि इन्द्रियोंको बाह्य विषयोंसे हटाकर मनमें विलीन कर दे अर्थात् इनकी ऐसी स्थिति कर दे कि इनकी कोई भी क्रिया न हो—मनमें विषयोंकी स्फुरणा न रहे।'
ॐ श्रीपरमात्मने नमः
विभूतिपाद-३
सम्बन्ध— दूसरे पादमें योगाङ्गोंके वर्णनका आरम्भ करके यम, नियम, आसन, प्राणायाम और प्रत्याहार—इन पाँच बहिरङ्ग साधनोंका फलसहित वर्णन किया गया; शेष धारणा, ध्यान और समाधि—इन तीन अन्तरङ्ग साधनोंका वर्णन इस पादमें किया जाता है; क्योंकि ये तीनों जब किसी एक ध्येयमें पूर्णतया किये जाते हैं, तब इनका नाम संयम हो जाता है। योगकी विभूतियाँ प्राप्त करनेके लिये संयमकी आवश्यकता है, अतः इन अन्तरङ्ग साधनोंका वर्णन साधनपादमें न करके इस विभूतिपादमें करते हुए पहले धारणाका स्वरूप बतलाते हैं—
देशबन्धश्चित्तस्य धारणा ॥१॥
'( बाहर या शरीरके भीतर कहीं भी ) किसी एक देशमें चित्तको ठहराना 'धारणा' है।'
व्याख्या— नाभिचक्र, हृदय-कमल आदि शरीरके भीतरी देश हैं, और आकाश या सूर्य-चन्द्रमा आदि देवता या कोई भी मूर्ति तथा कोई भी पदार्थ बाहरके देश हैं, उनमेंसे किसी एक देशमें चित्तकी वृत्तिको लगानेका नाम 'धारणा' है ॥१॥
सम्बन्ध— ध्यानका स्वरूप बतलाते हैं--
तत्र प्रत्ययैकतानता ध्यानम् ॥२॥
'( जहाँ चित्तको लगाया जाय, ) उसीमें वृत्तिका एकतार चलना 'ध्यान' है।'
८४ | पातञ्जलयोगदर्शन
व्याख्या—जिस ध्येय वस्तुमें चित्तको लगाया जाय, उसीमें चित्तका एकाग्र हो जाना अर्थात् केवल ध्येयमात्रकी एक ही तरहकी वृत्तिका प्रवाह चलना, उसके बीचमें किसी भी दूसरी वृत्तिका न उठना 'ध्यान' है ॥२॥
सम्बन्ध—समाधिका स्वरूप बतलाते हैं—
तदेवार्थमात्रनिर्भासं स्वरूपशून्यमिव समाधिः ॥३॥
'जब ( ध्यानमें ) केवल ध्येयमात्रकी ही प्रतीति होती है और चित्तका निज स्वरूप शून्य-सा हो जाता है, तब वही ( ध्यान ही ) 'समाधि' हो जाता है।'
व्याख्या—ध्यान करते-करते जब चित्त ध्येयाकारमें परिणत हो जाता है, उसके अपने स्वरूपका अभाव-सा हो जाता है, उसकी ध्येयसे भिन्न उपलब्धि नहीं होती, उस समय उस ध्यानका ही नाम 'समाधि' हो जाता है। यही लक्षण निर्वितर्क समापत्तिके नामसे पहले पादमें किया गया है ( योग० १ । ४३ ) ॥३॥
सम्बन्ध—उक्त तीनों साधनोंका साङ्केतिक नाम बतलाते हैं—
त्रयमेकत्र संयमः ॥४॥
'किसी एक ध्येय विषयमें तीनोंका होना 'संयम' है।'
व्याख्या—किसी एक ध्येय पदार्थमें तीनों होनेसे 'संयम' कहलाता है। अतः इस ग्रन्थमें जहाँ-तहाँ किसी विषयमें संयम करनेको कहा जाय या संयमका फल बतलाया जाय तो संयमके नामसे किसी एक ध्येयमें तीनोंका होना समझ लेना चाहिये ॥४॥
विभूतिपाद-३
८५
**सम्बन्ध—**संयमकी सिद्धिका फल बतलाते हैं—
तज्जयात्प्रज्ञालोकः ॥५॥
'उसको जीत लेनेसे बुद्धिका प्रकाश होता है।'
**व्याख्या—**साधन करते-करते जब योगी संयमपर विजय प्राप्त कर लेता है अर्थात् चित्तमें ऐसी योग्यता प्राप्त कर लेता है कि जिस विषयमें वह संयम करना चाहे, उसीमें तत्काल संयम हो जाता है, उस समय योगीको बुद्धिका प्रकाश प्राप्त हो जाता है अर्थात् उसकी बुद्धिमें अलौकिक ज्ञानशक्ति आ जाती है, इसीको प्रथम पादमें अध्यात्मप्रसादके नामसे कहा है (योग० १ । ४७-४८) ॥५॥
**सम्बन्ध—**संयमके प्रयोगकी विधिका वर्णन करते हैं—
तस्य भूमिषु विनियोगः ॥६॥
'उस (संयम) का (क्रमसे) भूमियोंमें विनियोग करना चाहिये।'
**व्याख्या—**पहले स्थूल विषयमें संयम करना चाहिये। वह स्थिर हो जानेपर सूक्ष्म विषयोंमें क्रमसे संयम करना चाहिये। इसी प्रकार जिस-जिस स्थलमें संयम स्थिर होता जाय, उस-उससे आगे बढ़ते रहना चाहिये ॥६॥
**सम्बन्ध—**उक्त तीनों साधनोंकी विशेषता बतलाते हैं—
त्रयमन्तरङ्गं पूर्वेभ्यः ॥७॥
'पहले कहे हुओंकी अपेक्षा ये तीनों (साधन) अन्तरङ्ग हैं।'
**व्याख्या—**इसके पहले अर्थात् दूसरे पादमें जो योगके यम, नियम, आसन, प्राणायाम और प्रत्याहार—ये पाँच अङ्ग बताये गये हैं,
८६ पातञ्जलयोगदर्शन
उनकी अपेक्षा उपर्युक्त धारणा, ध्यान और समाधि—ये तीनों साधन अन्तरङ्ग हैं; क्योंकि इन तीनोंका योग-सिद्धिके साथ निकटतम सम्बन्ध है ॥७॥
सम्बन्ध—निर्बीज समाधिकी विशेषताका वर्णन करते हैं—
तदपि बहिरङ्गं निर्बीजस्य ॥८॥
‘वे (ऊपर कहे हुए धारणा आदि तीनों) भी निर्बीज समाधिके बहिरङ्ग साधन ही हैं।’
व्याख्या—पर-वैराग्यकी दृढ़तासे जब समाधिप्रज्ञाके संस्कारोंका भी निरोध हो जाता है, तब निर्बीज समाधि सिद्ध होती है (योग० १।५१)। अतः धारणा, ध्यान और समाधि भी उसके अन्तरङ्ग साधन नहीं हो सकते; क्योंकि उसमें सब प्रकारकी वृत्तियोंका अभाव किया जाता है (योग० १।१८), किसी भी ध्येयमें चित्तको स्थिर करनेका अभ्यास नहीं किया जाता ॥८॥
सम्बन्ध—गुणोंका स्वभाव चञ्चल है, उनमें प्रतिक्षण परिणाम होता रहता है; चित्त गुणोंका ही कार्य है, अतः वह भी कभी एक अवस्थामें नहीं रह सकता। अतः निरोध-समाधिके समय उसका कैसा परिणाम होता है, यह बतलानेके लिये कहते हैं—
व्युत्थाननिरोधसंस्कारयोरभिभवप्रादुर्भावौ निरोधक्षण-चित्तान्वयो निरोधपरिणामः ॥९॥
‘व्युत्थान-अवस्थाके संस्कारोंका दब जाना और निरोध-अवस्थाके संस्कारोंका प्रकट हो जाना—यह निरोधकालमें संस्कारानुगत चित्तका निरोध-परिणाम है।’