पातञ्जल योगदर्शन (भाष्य सहित)
Patanjali Yoga Darshan
महर्षि पतञ्जलि / हरिकृष्णदास गोयन्दका द्वारा
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जाता है। मनकी व्याकुलताका नाश होकर उसमें सदैव प्रसन्नता बनी रहती है, विक्षेप-दोषका नाश होकर एकाग्रता आ जाती है और सब इन्द्रियाँ मनके वशमें हो जाती हैं, अतः उसमें आत्मदर्शन-की योग्यता आ जाती है।
इस प्रकार इसके ऊपरवाले सूत्रमें तो बाह्य शौचका फल बतलाया गया है और इसमें भीतरकी शुद्धिके अभ्यासका फल बतलाया गया है ॥४१॥
संतोषादनुत्तमसुखलाभः ॥४२॥
'सन्तोषसे ऐसे सर्वोत्तम सुखका लाभ होता है, जिससे उत्तम दूसरा कोई सुख नहीं है।'
व्याख्या—सन्तोषके अभ्याससे तृष्णाका अभाव हो जाता है, उस अवस्थामें जो सात्त्विक सुख मिलता है (गीता १८। ३६-३७), उसकी बराबरी दूसरा कोई सांसारिक सुख नहीं कर सकता ॥४२॥
कायेन्द्रियसिद्धिरशुद्धिक्षयात्तपसः ॥४३॥
'तपके प्रभावसे जब अशुद्धिका नाश हो जाता है, तब शरीर और इन्द्रियोंकी सिद्धि हो जाती है।'
व्याख्या—स्वधर्मपालनके लिये व्रत-उपवास आदि करने या अन्य सब प्रकारके कष्ट सहन करनेका नाम 'तप' है (योग-२।१ की टीका)। इसके अभ्याससे शरीर और इन्द्रियोंके मलका नाश हो जाता है, तब योगीका शरीर स्वस्थ, स्वच्छ और हल्का हो जाता है तथा तीसरे पादके पैंतालीसवें और छियालीसवें सूत्रमें बतलायी हुई काय-संपद्रूप शरीर-सम्बन्धी सिद्धियाँ