भारतकोश
पातञ्जल योगदर्शन (भाष्य सहित)

पातञ्जल योगदर्शन (भाष्य सहित)

Patanjali Yoga Darshan

महर्षि पतञ्जलि / हरिकृष्णदास गोयन्दका द्वारा

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साधनपाद-२ ७३

निष्कामभावसे यमोंका सेवन करनेसे कैवल्यकी प्राप्तिमें भी सहायता मिलती है ॥३९॥

**सम्बन्ध—**अब नियमोंके पालनका फल बतलाते हैं; परंतु इन सूत्रोंमें पूर्ण प्रतिष्ठाकी शर्त नहीं रक्खी गयी है। इससे यह मालूम होता है कि साधक इनका जितना अभ्यास करता है, उतना ही उसे लाभ मिलता चला जाता है। सबसे पहले अगले सूत्रमें बाह्य शौचका फल बतलाते हैं—

शौचात्स्वाङ्गजुगुप्सा परैरसंसर्गः ॥४०॥

‘शौचके अभ्याससे अपने अङ्गोंमें घृणा और दूसरोंसे संसर्ग न करनेकी इच्छा उत्पन्न होती है।’

**व्याख्या—**बाह्य शुद्धिके अभ्याससे साधककी अपने शरीरमें अपवित्र बुद्धि होकर उसमें वैराग्य हो जाता है अर्थात् उसमें आसक्ति नहीं रहती और दूसरे सांसारिक मनुष्योंके सङ्गमें भी प्रवृत्ति या आसक्ति नहीं रहती ॥४०॥

**सम्बन्ध—**भीतरकी शुद्धिका फल बतलाते हैं—

सत्त्वशुद्धिसौमनस्यैकाग्र्येन्द्रियजयात्मदर्शन-

योग्यत्वानि च ॥४१॥

‘अन्तःकरणकी शुद्धि, मनमें प्रसन्नता, चित्तकी एकाग्रता, इन्द्रियोंका वशमें होना और आत्मसाक्षात्कारकी योग्यता—ये पाँचों भी होते हैं।’

**व्याख्या—**मैत्री आदिकी भावनाके द्वारा अथवा जप, तप आदि अन्य किसी साधनद्वारा आन्तरिक शौचके लिये अभ्यास करनेसे राग, द्वेष, ईर्ष्या आदि मलोंका अभाव होकर मनुष्यका अन्तःकरण निर्मल और स्वच्छ हो