पातञ्जल योगदर्शन (भाष्य सहित)
Patanjali Yoga Darshan
महर्षि पतञ्जलि / हरिकृष्णदास गोयन्दका द्वारा
पृष्ठ 90, कुल 184 में से
संदर्भ में पढ़ें७२ पातञ्जलयोगदर्शन
हो जाता है, तब पृथ्वीमें जहाँ-कहाँ भी गुप्त स्थानमें पड़े हुए समस्त रत्न उसके सामने प्रकट हो जाते हैं अर्थात् उसकी जानकारीमें आ जाते हैं ॥३७॥
ब्रह्मचर्यप्रतिष्ठायां वीर्यलाभः ॥३८॥
‘ब्रह्मचर्यकी दृढ़ स्थिति हो जानेपर सामर्थ्यका लाभ होता है।’
व्याख्या— जब साधकमें ब्रह्मचर्यकी पूर्णतया दृढ़ स्थिति हो जाती है, तब उसके मन, बुद्धि, इन्द्रिय और शरीरमें अपूर्व शक्ति-का प्रादुर्भाव हो जाता है; साधारण मनुष्य किसी काममें भी उसकी बराबरी नहीं कर सकते ॥ ३८ ॥
अपरिग्रहस्थैर्ये जन्मकथन्तासंबोधः ॥३६॥
‘अपरिग्रहकी स्थिति हो जानेपर पूर्वजन्म कैसे हुए थे, इस बातका भलीभाँति ज्ञान हो जाता है।’
व्याख्या— जब योगीमें अपरिग्रहका भाव पूर्णतया स्थिर हो जाता है, तब उसे अपने पूर्वजन्मोंकी और वर्तमान जन्मकी सब बातें मालूम हो जाती हैं; अर्थात् मैं पहले किस योनिमें हुआ था, मैंने उस समय क्या-क्या काम किये, किस प्रकार रहा—ये सब स्मरण हो जाते हैं और इस जन्मकी भी बीती हुई सब बातें स्मरण हो जाती हैं। यह ज्ञान भी संसारमें वैराग्य उत्पन्न करनेवाला और जन्म-मरणसे छुटकारा पानेके लिये योगसाधनमें प्रवृत्त करने-वाला है।
यहाँतक यमोंकी सिद्धिका जो फल बतलाया गया है, उसके सिवा