पातञ्जल योगदर्शन (भाष्य सहित)
Patanjali Yoga Darshan
महर्षि पतञ्जलि / हरिकृष्णदास गोयन्दका द्वारा
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हो जाता है, तब पृथ्वीमें जहाँ-कहाँ भी गुप्त स्थानमें पड़े हुए समस्त रत्न उसके सामने प्रकट हो जाते हैं अर्थात् उसकी जानकारीमें आ जाते हैं ॥३७॥
ब्रह्मचर्यप्रतिष्ठायां वीर्यलाभः ॥३८॥
‘ब्रह्मचर्यकी दृढ़ स्थिति हो जानेपर सामर्थ्यका लाभ होता है।’
व्याख्या— जब साधकमें ब्रह्मचर्यकी पूर्णतया दृढ़ स्थिति हो जाती है, तब उसके मन, बुद्धि, इन्द्रिय और शरीरमें अपूर्व शक्ति-का प्रादुर्भाव हो जाता है; साधारण मनुष्य किसी काममें भी उसकी बराबरी नहीं कर सकते ॥ ३८ ॥
अपरिग्रहस्थैर्ये जन्मकथन्तासंबोधः ॥३६॥
‘अपरिग्रहकी स्थिति हो जानेपर पूर्वजन्म कैसे हुए थे, इस बातका भलीभाँति ज्ञान हो जाता है।’
व्याख्या— जब योगीमें अपरिग्रहका भाव पूर्णतया स्थिर हो जाता है, तब उसे अपने पूर्वजन्मोंकी और वर्तमान जन्मकी सब बातें मालूम हो जाती हैं; अर्थात् मैं पहले किस योनिमें हुआ था, मैंने उस समय क्या-क्या काम किये, किस प्रकार रहा—ये सब स्मरण हो जाते हैं और इस जन्मकी भी बीती हुई सब बातें स्मरण हो जाती हैं। यह ज्ञान भी संसारमें वैराग्य उत्पन्न करनेवाला और जन्म-मरणसे छुटकारा पानेके लिये योगसाधनमें प्रवृत्त करने-वाला है।
यहाँतक यमोंकी सिद्धिका जो फल बतलाया गया है, उसके सिवा
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निष्कामभावसे यमोंका सेवन करनेसे कैवल्यकी प्राप्तिमें भी सहायता मिलती है ॥३९॥
**सम्बन्ध—**अब नियमोंके पालनका फल बतलाते हैं; परंतु इन सूत्रोंमें पूर्ण प्रतिष्ठाकी शर्त नहीं रक्खी गयी है। इससे यह मालूम होता है कि साधक इनका जितना अभ्यास करता है, उतना ही उसे लाभ मिलता चला जाता है। सबसे पहले अगले सूत्रमें बाह्य शौचका फल बतलाते हैं—
शौचात्स्वाङ्गजुगुप्सा परैरसंसर्गः ॥४०॥
‘शौचके अभ्याससे अपने अङ्गोंमें घृणा और दूसरोंसे संसर्ग न करनेकी इच्छा उत्पन्न होती है।’
**व्याख्या—**बाह्य शुद्धिके अभ्याससे साधककी अपने शरीरमें अपवित्र बुद्धि होकर उसमें वैराग्य हो जाता है अर्थात् उसमें आसक्ति नहीं रहती और दूसरे सांसारिक मनुष्योंके सङ्गमें भी प्रवृत्ति या आसक्ति नहीं रहती ॥४०॥
**सम्बन्ध—**भीतरकी शुद्धिका फल बतलाते हैं—
सत्त्वशुद्धिसौमनस्यैकाग्र्येन्द्रियजयात्मदर्शन-
योग्यत्वानि च ॥४१॥
‘अन्तःकरणकी शुद्धि, मनमें प्रसन्नता, चित्तकी एकाग्रता, इन्द्रियोंका वशमें होना और आत्मसाक्षात्कारकी योग्यता—ये पाँचों भी होते हैं।’
**व्याख्या—**मैत्री आदिकी भावनाके द्वारा अथवा जप, तप आदि अन्य किसी साधनद्वारा आन्तरिक शौचके लिये अभ्यास करनेसे राग, द्वेष, ईर्ष्या आदि मलोंका अभाव होकर मनुष्यका अन्तःकरण निर्मल और स्वच्छ हो
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जाता है। मनकी व्याकुलताका नाश होकर उसमें सदैव प्रसन्नता बनी रहती है, विक्षेप-दोषका नाश होकर एकाग्रता आ जाती है और सब इन्द्रियाँ मनके वशमें हो जाती हैं, अतः उसमें आत्मदर्शन-की योग्यता आ जाती है।
इस प्रकार इसके ऊपरवाले सूत्रमें तो बाह्य शौचका फल बतलाया गया है और इसमें भीतरकी शुद्धिके अभ्यासका फल बतलाया गया है ॥४१॥
संतोषादनुत्तमसुखलाभः ॥४२॥
'सन्तोषसे ऐसे सर्वोत्तम सुखका लाभ होता है, जिससे उत्तम दूसरा कोई सुख नहीं है।'
व्याख्या—सन्तोषके अभ्याससे तृष्णाका अभाव हो जाता है, उस अवस्थामें जो सात्त्विक सुख मिलता है (गीता १८। ३६-३७), उसकी बराबरी दूसरा कोई सांसारिक सुख नहीं कर सकता ॥४२॥
कायेन्द्रियसिद्धिरशुद्धिक्षयात्तपसः ॥४३॥
'तपके प्रभावसे जब अशुद्धिका नाश हो जाता है, तब शरीर और इन्द्रियोंकी सिद्धि हो जाती है।'
व्याख्या—स्वधर्मपालनके लिये व्रत-उपवास आदि करने या अन्य सब प्रकारके कष्ट सहन करनेका नाम 'तप' है (योग-२।१ की टीका)। इसके अभ्याससे शरीर और इन्द्रियोंके मलका नाश हो जाता है, तब योगीका शरीर स्वस्थ, स्वच्छ और हल्का हो जाता है तथा तीसरे पादके पैंतालीसवें और छियालीसवें सूत्रमें बतलायी हुई काय-संपद्रूप शरीर-सम्बन्धी सिद्धियाँ
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प्राप्त हो जाती हैं एवं सूक्ष्म, दूरदेशमें और व्यवधानयुक्त स्थानमें स्थित विषयोंको देखना, सुनना आदि इन्द्रियसम्बन्धी सिद्धि भी प्राप्त हो जाती है ॥४३॥
स्वाध्यायादिष्टदेवतासंप्रयोगः ॥४४॥
'स्वाध्यायसे इष्टदेवताकी भलीभाँति प्राप्ति (साक्षात्कार) हो जाती है।'
व्याख्या— शास्त्राभ्यास और मन्त्रजपरूप स्वाध्यायके प्रभावसे योगी जिस इष्टदेवका दर्शन करना चाहता है, उसीका दर्शन हो जाता है ॥४४॥
समाधिसिद्धिरीश्वरप्रणिधानात् ॥४५॥
'ईश्वर-प्रणिधानसे समाधिकी सिद्धि हो जाती है।'
व्याख्या— ईश्वरकी शरणागतिसे योगसाधनमें आनेवाले विघ्नोंका नाश होकर शीघ्र ही समाधि निष्पन्न हो जाती है (योग० १।२३), क्योंकि ईश्वरपर निर्भर रहनेवाला साधक तो केवल तत्परतासे साधन करता रहता है, उसे साधनके परिणामकी चिन्ता नहीं रहती । उसके साधनमें आनेवाले विघ्नोंको दूर करनेका और साधनकी सिद्धिका भार ईश्वरके जिम्मे पड़ जाता है, अतः साधनका अनायास और शीघ्र पूर्ण होना स्वाभाविक ही है ॥४५॥
सम्बन्ध— यहाँतक यम और नियमोंका फलसहित वर्णन किया गया; अब आसनके लक्षण, उपाय और उसका फल क्रमसे बतलाते हैं—
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स्थिरसुखमासनम् ॥४६॥
‘निश्चल (हलन-चलनसे रहित) सुखपूर्वक बैठनेका नाम ‘आसन’ है।’
व्याख्या—हठयोगमें आसनोंके बहुत भेद बतलाये गये हैं, परंतु यहाँ सूत्रकारने उनका वर्णन नहीं करके बैठनेका तरीका साधककी इच्छापर ही छोड़ दिया है। भाव यह है कि जो साधक अपनी योग्यताके अनुसार जिस रीतिसे बिना हिले-डुले स्थिरभावसे सुखपूर्वक बिना किसी प्रकारकी पीड़ाके बहुत समयतक बैठ सके, वही आसन उसके लिये उपयुक्त है। इसके सिवा, जिसपर बैठकर साधन किया जाता है, उसका नाम भी आसन है; अतः वह भी स्थिर और सुखपूर्वक बैठनेलायक होना चाहिये* ॥४६॥
प्रयत्नशैथिल्यानन्तसमापत्तिभ्याम् ॥४७॥
‘( उक्त आसन ) प्रयत्नकी शिथिलतासे और अनन्त ( परमात्मा ) में मन लगानेसे सिद्ध होता है।’
व्याख्या—शरीरको सीधा और स्थिर करके सुखपूर्वक बैठ जानेके बाद शरीरसम्बन्धी सब प्रकारकी चेष्टाओंका त्याग कर देना ही प्रयत्नकी शिथिलता है; इससे और परमात्मामें मन लगानेसे—इन दो उपायोंसे आसनकी सिद्धि होती है।
यहाँ बहुत-से टीकाकारोंने अनन्तका अर्थ शेषनाग और समापत्तिका अर्थ समाधि किया है। भोजराजाने अनन्तका अर्थ
*श्रीमद्भगवद्गीतामें जिस आसनपर बैठकर योगाभ्यास करनेके लिये कहा है, उसे स्थिर और अचल स्थापन करनेके लिये कहा है और उसपर बैठनेका तरीका इस प्रकार बतलाया है कि शरीर, गला और सिर-ये तीनों सीधे और स्थिर रहें, वहाँ भी किसी विशेष आसनका नाम नहीं दिया है (देखिये गीता अ० ६, श्लोक ११से १३ तक)।
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आकाशादि किया है और समापत्तिका अर्थ चित्तका तद्रूप हो जाना किया है; किन्तु योगके अङ्गोंमें समाधि अन्तिम अङ्ग है, उसीके लिये आसन आदि अङ्गोंका अनुष्ठान है । आसनको समाधिका बहिरङ्ग साधन भी बतलाया गया है । अतः किसी प्रकारकी भी समाधिको आसनकी स्थिरताका उपाय बतलाना युक्तिसङ्गत नहीं होता । सज्जन विद्वान् अनुभवी महानुभाव इसपर विचार करें ॥४७॥
ततो द्वन्द्वानभिघातः ॥४८॥
'उस (आसनकी सिद्धि) से (शीत-उष्ण आदि) द्वन्द्वोंका आघात नहीं लगता ।'
व्याख्या—आसन सिद्ध हो जानेसे शरीरपर सर्दी-गर्मी आदि द्वन्द्वोंका प्रभाव नहीं पड़ता, शरीरमें उन सबको बिना किसी प्रकारकी पीड़ाके सहन करनेकी शक्ति आ जाती है । अतः वे द्वन्द्व चित्तको चञ्चल बनाकर साधनमें विघ्न नहीं डाल सकते ॥४८॥
सम्बन्ध—अब प्राणायामका सामान्य लक्षण बतलाते हैं—
तस्मिन् सति श्वासप्रश्वासयोर्गतिविच्छेदः प्राणायामः ॥४९॥
'आसन सिद्ध होनेके बाद श्वास और प्रश्वासकी गतिका रुक जाना 'प्राणायाम' है ।'
व्याख्या—प्राणवायुका शरीरमें प्रविष्ट होना श्वास है और बाहर निकलना प्रश्वास है । इन दोनोंकी गतिका रुक जाना अर्थात् प्राणवायुकी गमनागमनरूप क्रियाका बंद हो जाना ही प्राणायामका सामान्य लक्षण है ।
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यहाँ आसनकी सिद्धिके बाद प्राणायामका सम्पन्न होना बतलाया है। इससे यह प्रतीत होता है कि आसनकी स्थिरताका अभ्यास किये बिना ही जो प्राणायाम करते हैं, वे गलत रास्तेपर हैं। प्राणायामका अभ्यास करते समय आसनकी स्थिरता परम आवश्यक है ॥४९॥
**सम्बन्ध—**उक्त प्राणायामके भेदोंको समझानेके लिये तीन प्रकारके प्राणायामोंका वर्णन करते हैं—
बाह्याभ्यन्तरस्तम्भवृत्तिर्देशकालसंख्याभिः परिदृष्टो दीर्घसूक्ष्मः ॥५०॥
'( उक्त प्राणायाम ) बाह्यवृत्ति, आभ्यन्तरवृत्ति और स्तम्भवृत्ति (ऐसे तीन प्रकारका) होता है। ( तथा वह ) देश, काल और संख्याद्वारा देखा जाता हुआ लंबा और हल्का ( होता जाता है ) ।'
**व्याख्या—**अगले सूत्रमें जिस प्राणायामके लक्षण किये गये हैं, उसे चौथा प्राणायाम बताया है। इससे यह सिद्ध होता है कि इस सूत्रमें तीन प्रकारके प्राणायामोंका वर्णन है और उन तीनों प्रकारके ही प्राणायामोंको साधक देश, काल और संख्याद्वारा देखता रहता है कि वे किस अवस्थातक पहुँच चुके हैं। इस प्रकार परीक्षा करते-करते वे प्राणायाम जैसे-जैसे उन्नत होते जाते हैं, वैसे-ही-वैसे उनमें लंबाई और हल्कापन बढ़ता चला जाता है। इससे यह सिद्ध होता है कि स्तम्भवृत्तिरूप तृतीय प्राणायाममें भी देशका सम्बन्ध रहता है, अन्यथा वह देश, काल और संख्याद्वारा परिदृष्ट कैसे होगा ? प्राणायामके तीन भेद इस प्रकार समझने चाहिये—
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( १ ) बाह्यवृत्ति—प्राणवायुको शरीरसे बाहर निकालकर बाहर ही जितने कालतक सुखपूर्वक रुक सके, रोके रखना और साथ-ही-साथ इस बातकी भी परीक्षा करते रहना कि वह बाहर आकर कहाँ ठहरा है, कितने समयतक ठहरा है और उतने समयमें स्वाभाविक प्राणकी गतिकी कितनी संख्या होती है। यह 'बाह्यवृत्ति प्राणायाम' है; इसे 'रेचक' भी कहते हैं; क्योंकि इसमें रेचनपूर्वक प्राणको रोका जाता है। अभ्यास करते-करते यह दीर्घ (लंबा) अर्थात् बहुत कालतक रुके रहनेवाला और सूक्ष्म अर्थात् हल्का (अनायास-साध्य) हो जाता है।
( २ ) आभ्यन्तरवृत्ति—प्राणवायुको भीतर ले जाकर भीतर ही जितने कालतक सुखपूर्वक रुक सके, रोके रखना और साथ-साथ यह देखते रहना कि आभ्यन्तर देशमें कहाँतक जाकर प्राण रुकता है, वहाँ कितने कालतक सुखपूर्वक ठहरता है और उतने समयमें प्राणकी स्वाभाविक गतिकी कितनी संख्या होती है। यह 'आभ्यन्तर' प्राणायाम है; इसे 'पूरक' प्राणायाम भी कहते हैं, क्योंकि इसमें शरीरके अंदर ले जाकर प्राणको रोका जाता है। अभ्यासबल-से यह भी दीर्घ और सूक्ष्म होता जाता है।
( ३ ) स्तम्भवृत्ति—शरीरके भीतर जाने और बाहर निकलने-वाली जो प्राणोंकी स्वाभाविक गति है, उसे प्रयत्नपूर्वक बाहर या भीतर लाने या ले जानेका अभ्यास न करके प्राणवायु स्वभावसे बाहर निकला हो या भीतर गया हो, जहाँ हो, वहीं उसकी गतिको स्तम्भित कर देना (रोक देना) और यह देखते रहना कि प्राण किस देशमें रुके हैं, कितने समयतक सुखपूर्वक रुके रहते हैं, इस
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समयमें स्वाभाविक गतिकी कितनी संख्या होती है, यह 'स्तम्भवृत्ति' प्राणायाम है; इसे 'कुम्भक' प्राणायाम भी कहते हैं। अभ्यासबलसे यह भी दीर्घ और सूक्ष्म होता है। कोई-कोई टीकाकार इसे केवल कुम्भक कहते हैं और कोई-कोई चौथे प्राणायामको केवल कुम्भक कहते हैं। इस तीसरे और अगले सूत्रमें बतलाये हुए चौथे प्राणायामके भेदका निर्णय करनेमें बहुत मतभेद है।
साधक किसी भी प्राणायामका अभ्यास करें, उसके साथ मन्त्र अवश्य रहना चाहिये ॥५०॥
सम्बन्ध—चौथे प्राणायामका वर्णन करते हैं—
बाह्याभ्यन्तरविषयाक्षेपी चतुर्थः ॥५१॥
'बाहर और भीतरके विषयोंका त्याग कर देनेसे अपने-आप होनेवाला चौथा प्राणायाम है।'
व्याख्या—बाहर और भीतरके विषयोंके चिन्तनका त्याग कर देनेसे अर्थात् इस समय प्राण बाहर निकल रहे हैं या भीतर जा रहे हैं अथवा चल रहे हैं कि ठहरे हुए हैं, इस जानकारीका त्याग करके मनको इष्टचिन्तनमें लगा देनेसे देश, काल और संख्याके ज्ञानके बिना ही अपने-आप जो प्राणोंकी गति जिस किसी देशमें रुक जाती है, वह चौथा प्राणायाम है। यह पहले बतलाये हुए तीन प्रकारके प्राणायामोंसे सर्वथा भिन्न है, यह बात दिखलानेके लिये सूत्रमें 'चतुर्थः' पदका प्रयोग किया गया है।
यह अनायास होनेवाला राजयोगका प्राणायाम है। इसमें मनकी चञ्चलता शान्त होनेके कारण अपने-आप प्राणोंकी गति रुकती है और पहले बतलाये हुए प्राणायामोंमें प्रयत्नद्वारा प्राणोंकी
३. तृतीय पाद — विभूतिपाद (सूत्र १-५५)
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गतिको रोकनेका अभ्यास करते-करते प्राणोंकी गतिका निरोध होता है, यही इसकी विशेषता है ॥५१॥
ततः क्षीयते प्रकाशावरणम् ॥५२॥
‘उस ( प्राणायामके अभ्यास ) से प्रकाश ( ज्ञान ) का आवरण क्षीण हो जाता है।’
व्याख्या—जैसे-जैसे मनुष्य प्राणायामका अभ्यास करता है, वैसे-ही-वैसे उसके सञ्चित कर्म-संस्कार और अविद्यादि क्लेश दुर्बल होते चले जाते हैं। ये कर्म-संस्कार और अविद्यादि क्लेश ही ज्ञानका आवरण ( परदा ) है। इस परदेके कारण ही मनुष्यका ज्ञान ढका रहता है, अतः वह मोहित हुआ रहता है। जब यह परदा दुर्बल होते-होते सर्वथा क्षीण हो जाता है, तब साधकका ज्ञान सूर्यकी भाँति प्रकाशित हो जाता है। इसलिये साधकको प्राणायामका अभ्यास अवश्य करना चाहिये। ५२।
सम्बन्ध—प्राणायामका दूसरा फल बतलाते हैं—
धारणासु च योग्यता मनसः ॥५३॥
‘तथा धारणाओंमें मनकी योग्यता भी हो जाती है।’
व्याख्या—प्राणायामके अभ्याससे मनमें धारणाकी योग्यता आ जाती है यानी उसे चाहे जिस जगह अनायास ही स्थिर किया जा सकता है ॥५३॥
सम्बन्ध—अब प्रत्याहारके लक्षण बतलाते हैं—
स्वविषयासंप्रयोगे चित्तस्वरूपानुकार इवेन्द्रियाणां प्रत्याहारः ॥५४॥
‘अपने विषयोंके सम्बन्धसे रहित होनेपर जो इन्द्रियोंका चित्तके स्वरूपमें तदाकार हो जाना है, वह ‘प्रत्याहार’ है।’
पा० यो० द० ६—
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**व्याख्या—**उक्त प्रकारसे प्राणायामका अभ्यास करते-करते मन और इन्द्रियाँ शुद्ध हो जाते हैं, उसके बाद इन्द्रियोंकी बाह्यवृत्तिको सब ओरसे समेटकर मनमें विलीन करनेके अभ्यासका नाम 'प्रत्याहार' है। जब साधनकालमें साधक इन्द्रियोंके विषयोंका त्याग करके चित्तको अपने ध्येयमें लगाता है, उस समय जो इन्द्रियोंका विषयोंकी ओर न जाकर चित्तमें विलीन-सा हो जाना है, यह प्रत्याहार सिद्ध होनेकी पहचान है। यदि उस समय भी इन्द्रियाँ पहलेके अभ्याससे इसके सामने बाह्य विषयोंका चित्र उपस्थित करती रहें तो समझना चाहिये कि प्रत्याहार नहीं हुआ। उपनिषदोंमें भी 'वाक्' शब्दसे उपलक्षित इन्द्रियोंको मनमें निरुद्ध करनेकी बात कहकर यही भाव दिखलाया है* ॥५४॥
**सम्बन्ध—**अब प्रत्याहारका फल बतलाकर इस द्वितीय पादकी समाप्ति करते हैं—
ततः परमा वश्यतेन्द्रियाणाम् ॥५५॥
'उससे (प्रत्याहारसे) इन्द्रियोंकी परम वश्यता हो जाती है।'
**व्याख्या—**प्रत्याहार सिद्ध हो जानेपर योगीकी इन्द्रियाँ उसके सर्वथा वशमें हो जाती हैं, उनकी स्वतन्त्रताका सर्वथा अभाव हो जाता है। प्रत्याहारकी सिद्धि हो जानेके बाद इन्द्रियविजयके लिये अन्य साधनकी आवश्यकता नहीं रहती ॥५५॥
* यच्छेद्वाङ्मनसी प्राज्ञः । (कठ० १।३।१३)
'बुद्धिमान् मनुष्यको उचित है कि वह वाक् आदि इन्द्रियोंको बाह्य विषयोंसे हटाकर मनमें विलीन कर दे अर्थात् इनकी ऐसी स्थिति कर दे कि इनकी कोई भी क्रिया न हो—मनमें विषयोंकी स्फुरणा न रहे।'
ॐ श्रीपरमात्मने नमः
विभूतिपाद-३
सम्बन्ध— दूसरे पादमें योगाङ्गोंके वर्णनका आरम्भ करके यम, नियम, आसन, प्राणायाम और प्रत्याहार—इन पाँच बहिरङ्ग साधनोंका फलसहित वर्णन किया गया; शेष धारणा, ध्यान और समाधि—इन तीन अन्तरङ्ग साधनोंका वर्णन इस पादमें किया जाता है; क्योंकि ये तीनों जब किसी एक ध्येयमें पूर्णतया किये जाते हैं, तब इनका नाम संयम हो जाता है। योगकी विभूतियाँ प्राप्त करनेके लिये संयमकी आवश्यकता है, अतः इन अन्तरङ्ग साधनोंका वर्णन साधनपादमें न करके इस विभूतिपादमें करते हुए पहले धारणाका स्वरूप बतलाते हैं—
देशबन्धश्चित्तस्य धारणा ॥१॥
'( बाहर या शरीरके भीतर कहीं भी ) किसी एक देशमें चित्तको ठहराना 'धारणा' है।'
व्याख्या— नाभिचक्र, हृदय-कमल आदि शरीरके भीतरी देश हैं, और आकाश या सूर्य-चन्द्रमा आदि देवता या कोई भी मूर्ति तथा कोई भी पदार्थ बाहरके देश हैं, उनमेंसे किसी एक देशमें चित्तकी वृत्तिको लगानेका नाम 'धारणा' है ॥१॥
सम्बन्ध— ध्यानका स्वरूप बतलाते हैं--
तत्र प्रत्ययैकतानता ध्यानम् ॥२॥
'( जहाँ चित्तको लगाया जाय, ) उसीमें वृत्तिका एकतार चलना 'ध्यान' है।'
८४ | पातञ्जलयोगदर्शन
व्याख्या—जिस ध्येय वस्तुमें चित्तको लगाया जाय, उसीमें चित्तका एकाग्र हो जाना अर्थात् केवल ध्येयमात्रकी एक ही तरहकी वृत्तिका प्रवाह चलना, उसके बीचमें किसी भी दूसरी वृत्तिका न उठना 'ध्यान' है ॥२॥
सम्बन्ध—समाधिका स्वरूप बतलाते हैं—
तदेवार्थमात्रनिर्भासं स्वरूपशून्यमिव समाधिः ॥३॥
'जब ( ध्यानमें ) केवल ध्येयमात्रकी ही प्रतीति होती है और चित्तका निज स्वरूप शून्य-सा हो जाता है, तब वही ( ध्यान ही ) 'समाधि' हो जाता है।'
व्याख्या—ध्यान करते-करते जब चित्त ध्येयाकारमें परिणत हो जाता है, उसके अपने स्वरूपका अभाव-सा हो जाता है, उसकी ध्येयसे भिन्न उपलब्धि नहीं होती, उस समय उस ध्यानका ही नाम 'समाधि' हो जाता है। यही लक्षण निर्वितर्क समापत्तिके नामसे पहले पादमें किया गया है ( योग० १ । ४३ ) ॥३॥
सम्बन्ध—उक्त तीनों साधनोंका साङ्केतिक नाम बतलाते हैं—
त्रयमेकत्र संयमः ॥४॥
'किसी एक ध्येय विषयमें तीनोंका होना 'संयम' है।'
व्याख्या—किसी एक ध्येय पदार्थमें तीनों होनेसे 'संयम' कहलाता है। अतः इस ग्रन्थमें जहाँ-तहाँ किसी विषयमें संयम करनेको कहा जाय या संयमका फल बतलाया जाय तो संयमके नामसे किसी एक ध्येयमें तीनोंका होना समझ लेना चाहिये ॥४॥
विभूतिपाद-३
८५
**सम्बन्ध—**संयमकी सिद्धिका फल बतलाते हैं—
तज्जयात्प्रज्ञालोकः ॥५॥
'उसको जीत लेनेसे बुद्धिका प्रकाश होता है।'
**व्याख्या—**साधन करते-करते जब योगी संयमपर विजय प्राप्त कर लेता है अर्थात् चित्तमें ऐसी योग्यता प्राप्त कर लेता है कि जिस विषयमें वह संयम करना चाहे, उसीमें तत्काल संयम हो जाता है, उस समय योगीको बुद्धिका प्रकाश प्राप्त हो जाता है अर्थात् उसकी बुद्धिमें अलौकिक ज्ञानशक्ति आ जाती है, इसीको प्रथम पादमें अध्यात्मप्रसादके नामसे कहा है (योग० १ । ४७-४८) ॥५॥
**सम्बन्ध—**संयमके प्रयोगकी विधिका वर्णन करते हैं—
तस्य भूमिषु विनियोगः ॥६॥
'उस (संयम) का (क्रमसे) भूमियोंमें विनियोग करना चाहिये।'
**व्याख्या—**पहले स्थूल विषयमें संयम करना चाहिये। वह स्थिर हो जानेपर सूक्ष्म विषयोंमें क्रमसे संयम करना चाहिये। इसी प्रकार जिस-जिस स्थलमें संयम स्थिर होता जाय, उस-उससे आगे बढ़ते रहना चाहिये ॥६॥
**सम्बन्ध—**उक्त तीनों साधनोंकी विशेषता बतलाते हैं—
त्रयमन्तरङ्गं पूर्वेभ्यः ॥७॥
'पहले कहे हुओंकी अपेक्षा ये तीनों (साधन) अन्तरङ्ग हैं।'
**व्याख्या—**इसके पहले अर्थात् दूसरे पादमें जो योगके यम, नियम, आसन, प्राणायाम और प्रत्याहार—ये पाँच अङ्ग बताये गये हैं,
८६ पातञ्जलयोगदर्शन
उनकी अपेक्षा उपर्युक्त धारणा, ध्यान और समाधि—ये तीनों साधन अन्तरङ्ग हैं; क्योंकि इन तीनोंका योग-सिद्धिके साथ निकटतम सम्बन्ध है ॥७॥
सम्बन्ध—निर्बीज समाधिकी विशेषताका वर्णन करते हैं—
तदपि बहिरङ्गं निर्बीजस्य ॥८॥
‘वे (ऊपर कहे हुए धारणा आदि तीनों) भी निर्बीज समाधिके बहिरङ्ग साधन ही हैं।’
व्याख्या—पर-वैराग्यकी दृढ़तासे जब समाधिप्रज्ञाके संस्कारोंका भी निरोध हो जाता है, तब निर्बीज समाधि सिद्ध होती है (योग० १।५१)। अतः धारणा, ध्यान और समाधि भी उसके अन्तरङ्ग साधन नहीं हो सकते; क्योंकि उसमें सब प्रकारकी वृत्तियोंका अभाव किया जाता है (योग० १।१८), किसी भी ध्येयमें चित्तको स्थिर करनेका अभ्यास नहीं किया जाता ॥८॥
सम्बन्ध—गुणोंका स्वभाव चञ्चल है, उनमें प्रतिक्षण परिणाम होता रहता है; चित्त गुणोंका ही कार्य है, अतः वह भी कभी एक अवस्थामें नहीं रह सकता। अतः निरोध-समाधिके समय उसका कैसा परिणाम होता है, यह बतलानेके लिये कहते हैं—
व्युत्थाननिरोधसंस्कारयोरभिभवप्रादुर्भावौ निरोधक्षण-चित्तान्वयो निरोधपरिणामः ॥९॥
‘व्युत्थान-अवस्थाके संस्कारोंका दब जाना और निरोध-अवस्थाके संस्कारोंका प्रकट हो जाना—यह निरोधकालमें संस्कारानुगत चित्तका निरोध-परिणाम है।’
विभूतिपाद-३ ८७
व्याख्या— निरोधसमाधिमें चित्तकी सम्पूर्ण वृत्तियोंका अभाव हो जानेपर भी उनके संस्कारोंका नाश नहीं होता। उस कालमें केवल संस्कार ही शेष रहते हैं, यह बात पहले पादमें कही है (योग० १।१८)। अतः निरोधकालमें चित्त व्युत्थान और निरोध-दोनों ही प्रकारके संस्कारोंमें व्याप्त रहता है; क्योंकि चित्त धर्मी है और संस्कार उसके धर्म हैं, धर्मी अपने धर्ममें सदैव व्याप्त रहता है, यह नियम है (योग० ३।१४)। उस निरोधकालमें जो व्युत्थानके संस्कारोंका दब जाना और निरोध-संस्कारोंका प्रकट हो जाना है, यह संस्कारोंमें व्याप्त चित्तका व्युत्थानधर्मसे निरोधधर्ममें परिणत होनारूप निरोध-परिणाम है।* निरोध-समाधिकी अपेक्षा संप्रज्ञात समाधि भी व्युत्थान-अवस्था ही है (योग० ३।८)। अतः उसके संस्कारोंको यहाँ व्युत्थान-संस्कारोंके ही अन्तर्गत समझना चाहिये ॥९॥
सम्बन्ध— इसके बाद क्या होता है, सो बतलाते हैं—
* यहाँ समाधि-परिणाम और एकाग्रता-परिणामके लक्षण पहले न करके पहले निरोध-परिणामका स्वरूप बतलाया है। इसका यह कारण मालूम होता है कि आठवें सूत्रमें निरोध-समाधिका वर्णन आ गया। इसलिये पहले निरोध-परिणामका लक्षण बतलाना आवश्यक हो गया; क्योंकि पहले (योग० १।५१ में) निरोध-समाधिका लक्षण करते हुए सब वृत्तियोंके निरोधसे निर्बीज समाधिका होना बतलाया है। अतः उसमें परिणाम न होनेकी धारणा स्वाभाविक हो जाती है; परंतु जबतक चित्तकी गुणोंसे भिन्न सत्ता रहती है, वह अपने कारणमें विलीन नहीं हो जाता; तबतक उसमें परिणाम होना अनिवार्य है। इसलिये निरोध-परिणाम किस प्रकार होता है, यह जाननेकी इच्छा स्वाभाविक हो जाती है।
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तस्य प्रशान्तवाहिता संस्कारात् ॥ १० ॥
'संस्कारबलसे उस चित्तकी प्रशान्तवाहिता स्थिति होती है।'
व्याख्या—पहले सूत्रके कथनानुसार जब व्युत्थानके संस्कार सर्वथा दब जाते हैं और निरोधके संस्कार बढ़कर भरपूर हो जाते हैं, उस समय उस संस्कारमात्र शेष चित्तमें निरोधसंस्कारोंकी अधिकतासे केवल निर्मल निरोधसंस्कारधारा चलती रहती है अर्थात् केवल निरोध-संस्कारोंका ही प्रवाह चलता रहता है। यह निरुद्धचित्तका अवस्था-परिणाम है ॥ १० ॥
सम्बन्ध—अब संप्रज्ञात-समाधिमें चित्तका जैसा परिणाम होता है, उसका वर्णन करते हैं—
सर्वार्थतैकाग्रतयोः क्षयोदयौ चित्तस्य समाधिपरिणामः ॥ ११ ॥
'सब प्रकारके विषयोंका चिन्तन करनेकी वृत्तिका क्षय हो जाना और किसी एक ही ध्येय विषयको चिन्तन करनेवाली एकाग्रता-अवस्थाका उदय हो जाना—यह चित्तका समाधि-परिणाम है।'
व्याख्या—निरोध-समाधिके पहले जब योगीका संप्रज्ञात योग सिद्ध होता है, उस समय चित्तकी विक्षिप्तावस्थाका क्षय होकर एकाग्र-अवस्थाका उदय हो जाता है। निर्वितर्क और निर्विचार संप्रज्ञात समाधिमें केवल ध्येयमात्रका ही ज्ञान रहता है, चित्तके निज स्वरूपतकका भान नहीं रहता (योग० १। ४३), वह चित्तका विक्षिप्तावस्थासे एकाग्र-अवस्थामें परिणत हो जानारूप समाधि-परिणाम है ॥ ११ ॥
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**सम्बन्ध—**उसके बादकी स्थितिका वर्णन करते हैं—
ततः पुनः शान्तोदितौ तुल्यप्रत्ययौ चित्तस्यैकाग्रतापरिणामः ॥१२॥
'उसके बाद फिर जब शान्त होनेवाली और उदय होनेवाली दोनों ही वृत्तियाँ एक-सी हो जाती हैं, तब वह चित्तका एकाग्रता-परिणाम है।'
**व्याख्या—**जब चित्त विक्षिप्त-अवस्थासे एकाग्र-अवस्थामें प्रवेश करता है, उस समय चित्तका जो परिणाम होता है, उसका नाम समाधि-परिणाम है। जब चित्त भलीभाँति समाहित हो चुकता है, उसके बाद जो चित्तमें परिणाम होता रहता है, उसे एकाग्रता-परिणाम कहते हैं। उसमें शान्त होनेवाली वृत्ति और उदय होनेवाली वृत्ति एक-सी ही होती है।
पहले कहे हुए समाधि-परिणाममें तो शान्त होनेवाली और उदय होनेवाली वृत्तिमें भेद होता है; किन्तु इसमें शान्त होनेवाली और उदय होनेवाली वृत्तिमें भेद नहीं होता, यही समाधि-परिणाममें और एकाग्रता-परिणाममें अन्तर है। संप्रज्ञात-समाधिकी प्रथम अवस्थामें समाधि-परिणाम होता है और उसकी परिपक्व-अवस्थामें एकाग्रता-परिणाम होता है। इस एकाग्रता-परिणामके समय होनेवाली स्थितिको ही पहले पादमें निर्विचार समाधिकी निर्मलताके नामसे कहा है (योग० १ । ४७) ॥१२॥
**सम्बन्ध—**उपर्युक्त परिणामोंके नाम बतलाते हुए उनके उदाहरणसे अन्य समस्त वस्तुओंमें होनेवाले परिणामोंकी व्याख्या करते हैं—
९० पातञ्जलयोगदर्शन
एतेन भूतेन्द्रियेषु धर्मलक्षणावस्थापरिणामा व्याख्याताः ॥१३॥
'( ऊपर जो चित्तके परिणाम बतला चुके हैं, ) इसीसे पाँचों भूतोंमें और सब इन्द्रियोंमें होनेवाले धर्म-परिणाम, लक्षण-परिणाम और अवस्था-परिणाम—( इन तीनों परिणामों ) की व्याख्या कर दी गयी।'
व्याख्या—पहले नवें और दसवें सूत्रमें तो निरोध-समाधिके समय होनेवाले चित्तके धर्म-परिणाम, लक्षण-परिणाम और अवस्था-परिणामका वर्णन किया गया है तथा ग्यारहवें और बारहवें सूत्रमें संप्रज्ञात-समाधिके समय होनेवाले चित्तके धर्म-परिणाम, लक्षण-परिणाम और अवस्था-परिणामका वर्णन किया गया है। इसी तरह संसारकी समस्त वस्तुओंमें ये परिणाम बराबर होते रहते हैं; क्योंकि तीनों ही गुण परिणामी हैं, अतः उनके कार्योंमें परिवर्तन होते रहना अनिवार्य है। इसलिये इस सूत्रमें यह बात कही गयी है कि ऊपरके वर्णनसे ही पाँचों भूतोंमें और समस्त इन्द्रियोंमें होनेवाले धर्म, लक्षण और अवस्था-परिणामोंको समझ लेना चाहिये। इनका भेद उदाहरणसहित समझाया जाता है।
यह ध्यानमें रखना चाहिये कि सांख्य और योगके सिद्धान्तमें कोई भी पदार्थ बिना हुए उत्पन्न नहीं होता। जो कुछ वस्तु उत्पन्न होती है, वह उत्पन्न होनेसे पहले भी अपने कारणमें विद्यमान थी और लुप्त होनेके बाद भी विद्यमान रहेगी।
(१) धर्म-परिणाम—जब किसी धर्मीमें एक धर्मका लय
विभूतिपाद-३
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होकर दूसरे धर्मका उदय होता है, उसे 'धर्म-परिणाम' कहते हैं; जैसे नवें सूत्रमें चित्तरूप धर्मीके व्युत्थानसंस्काररूप धर्मका दब जाना और निरोधसंस्काररूप धर्मका प्रकट होना बतलाया गया है । यही धर्मोंमें विद्यमान रहनेवाले चित्तरूप धर्मीका धर्म-परिणाम है । इसी प्रकार ग्यारहवें सूत्रमें जो सर्वार्थतारूप धर्मका क्षय और एकाग्रतारूप धर्मका उदय बतलाया गया है, यह भी चित्तरूप धर्मीका धर्म-परिणाम है । इसी तरह मिट्टीमें पिण्डरूप धर्मका क्षय और घटरूप धर्मका उदय होना, फिर घटरूप धर्मका क्षय और ठीकरी (फूटे हुए घटके टुकड़े) रूप धर्मका उदय होना—सब प्रकारके धर्मोंमें विद्यमान रहनेवाले मिट्टीरूप धर्मीका धर्म-परिणाम है । इसी तरह अन्य समस्त वस्तुओंमें भी समझ लेना चाहिये ।
(२) लक्षण-परिणाम—यह परिणाम भी धर्म-परिणामके साथ-साथ हो जाता है । यह लक्षण-परिणाम धर्ममें होता है । वर्तमान धर्मका नष्ट हो जाना उसका अतीत लक्षण-परिणाम है, अनागत धर्मका प्रकट होना उसका वर्तमान लक्षण-परिणाम है और प्रकट होनेसे पहले वह अनागत लक्षणवाला रहता है । इन तीनोंको धर्मका 'लक्षण-परिणाम' कहते हैं । ग्यारहवें सूत्रमें जो चित्तके सर्वार्थता-धर्मका क्षय होना बतलाया गया है, वह उसका अतीत लक्षण-परिणाम है और जो एकाग्रतारूप धर्मका उदय होना बतलाया है, वह उसका वर्तमान लक्षण-परिणाम है । उदय होनेसे पहले वह अनागत लक्षण-परिणाममें था । इसी प्रकार दूसरी वस्तुओंके परिणामोंके विषयमें भी समझ लेना चाहिये ।
(३) अवस्था-परिणाम—जो वर्तमान लक्षणयुक्त धर्ममें