भारतकोश
पातञ्जल योगदर्शन (भाष्य सहित)

पातञ्जल योगदर्शन (भाष्य सहित)

Patanjali Yoga Darshan

महर्षि पतञ्जलि / हरिकृष्णदास गोयन्दका द्वारा

DevanagariHindipublished184 पृष्ठ

पृष्ठ 95, कुल 184 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 95

साधनपाद-२ ७७

आकाशादि किया है और समापत्तिका अर्थ चित्तका तद्रूप हो जाना किया है; किन्तु योगके अङ्गोंमें समाधि अन्तिम अङ्ग है, उसीके लिये आसन आदि अङ्गोंका अनुष्ठान है । आसनको समाधिका बहिरङ्ग साधन भी बतलाया गया है । अतः किसी प्रकारकी भी समाधिको आसनकी स्थिरताका उपाय बतलाना युक्तिसङ्गत नहीं होता । सज्जन विद्वान् अनुभवी महानुभाव इसपर विचार करें ॥४७॥

ततो द्वन्द्वानभिघातः ॥४८॥

'उस (आसनकी सिद्धि) से (शीत-उष्ण आदि) द्वन्द्वोंका आघात नहीं लगता ।'

व्याख्या—आसन सिद्ध हो जानेसे शरीरपर सर्दी-गर्मी आदि द्वन्द्वोंका प्रभाव नहीं पड़ता, शरीरमें उन सबको बिना किसी प्रकारकी पीड़ाके सहन करनेकी शक्ति आ जाती है । अतः वे द्वन्द्व चित्तको चञ्चल बनाकर साधनमें विघ्न नहीं डाल सकते ॥४८॥

सम्बन्ध—अब प्राणायामका सामान्य लक्षण बतलाते हैं—

तस्मिन् सति श्वासप्रश्वासयोर्गतिविच्छेदः प्राणायामः ॥४९॥

'आसन सिद्ध होनेके बाद श्वास और प्रश्वासकी गतिका रुक जाना 'प्राणायाम' है ।'

व्याख्या—प्राणवायुका शरीरमें प्रविष्ट होना श्वास है और बाहर निकलना प्रश्वास है । इन दोनोंकी गतिका रुक जाना अर्थात् प्राणवायुकी गमनागमनरूप क्रियाका बंद हो जाना ही प्राणायामका सामान्य लक्षण है ।