पातञ्जल योगदर्शन (भाष्य सहित)
Patanjali Yoga Darshan
महर्षि पतञ्जलि / हरिकृष्णदास गोयन्दका द्वारा
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स्थिरसुखमासनम् ॥४६॥
‘निश्चल (हलन-चलनसे रहित) सुखपूर्वक बैठनेका नाम ‘आसन’ है।’
व्याख्या—हठयोगमें आसनोंके बहुत भेद बतलाये गये हैं, परंतु यहाँ सूत्रकारने उनका वर्णन नहीं करके बैठनेका तरीका साधककी इच्छापर ही छोड़ दिया है। भाव यह है कि जो साधक अपनी योग्यताके अनुसार जिस रीतिसे बिना हिले-डुले स्थिरभावसे सुखपूर्वक बिना किसी प्रकारकी पीड़ाके बहुत समयतक बैठ सके, वही आसन उसके लिये उपयुक्त है। इसके सिवा, जिसपर बैठकर साधन किया जाता है, उसका नाम भी आसन है; अतः वह भी स्थिर और सुखपूर्वक बैठनेलायक होना चाहिये* ॥४६॥
प्रयत्नशैथिल्यानन्तसमापत्तिभ्याम् ॥४७॥
‘( उक्त आसन ) प्रयत्नकी शिथिलतासे और अनन्त ( परमात्मा ) में मन लगानेसे सिद्ध होता है।’
व्याख्या—शरीरको सीधा और स्थिर करके सुखपूर्वक बैठ जानेके बाद शरीरसम्बन्धी सब प्रकारकी चेष्टाओंका त्याग कर देना ही प्रयत्नकी शिथिलता है; इससे और परमात्मामें मन लगानेसे—इन दो उपायोंसे आसनकी सिद्धि होती है।
यहाँ बहुत-से टीकाकारोंने अनन्तका अर्थ शेषनाग और समापत्तिका अर्थ समाधि किया है। भोजराजाने अनन्तका अर्थ
*श्रीमद्भगवद्गीतामें जिस आसनपर बैठकर योगाभ्यास करनेके लिये कहा है, उसे स्थिर और अचल स्थापन करनेके लिये कहा है और उसपर बैठनेका तरीका इस प्रकार बतलाया है कि शरीर, गला और सिर-ये तीनों सीधे और स्थिर रहें, वहाँ भी किसी विशेष आसनका नाम नहीं दिया है (देखिये गीता अ० ६, श्लोक ११से १३ तक)।