पातञ्जल योगदर्शन (भाष्य सहित)
Patanjali Yoga Darshan
महर्षि पतञ्जलि / हरिकृष्णदास गोयन्दका द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसाधनपाद-२ ७१
सत्यप्रतिष्ठायां क्रियाफलाश्रयत्वम् ॥३६॥
'सत्यकी दृढ स्थिति हो जानेपर (योगीमें) क्रियाफलके आश्रयका भाव (आ जाता है)।'
व्याख्या— जब योगी सत्यका पालन करनेमें पूर्णतया परिपक्व हो जाता है, उसमें किसी प्रकारकी कमी नहीं रहती, उस समय वह योगी कर्तव्यपालन रूप क्रियाओंके फलका आश्रय बन जाता है। जो कर्म किसीने नहीं किया है, उसका भी फल उसे प्रदान कर देनेकी शक्ति उस योगीमें आ जाती है अर्थात् जिसको जो वरदान, शाप या आशीर्वाद देता है, वह सत्य हो जाता है ॥३६॥
अस्तेयप्रतिष्ठायां सर्वरत्नोपस्थानम् ॥३७॥
'चोरीके अभावकी दृढ स्थिति हो जानेपर (उस योगीके सामने) सब प्रकारके रत्न प्रकट हो जाते हैं।'
व्याख्या— जब साधकमें चोरीका अभाव पूर्णतया प्रतिष्ठित
अयं दीर्घायुषस्तस्य लोके विश्रुतकर्मणः ।
अगस्त्यस्याश्रमः श्रीमान् विनीतमृगसेवितः ॥
नात्र जीवेन्मृषावादी क्रूरो वा यदि वा शठः ।
नृशंसः पापवृत्तो वा मुनिरेष तथाविधः ॥
(सर्ग ११ । ८३, ८६, ९०)
तुलसीकृत रामायणके अयोध्याकाण्डमें भी आया है—
खग मृग बिपुल कोलाहल करहीं । बिरहित बैर मुदित मन चरहीं ॥
(वाल्मीकि-आश्रमवर्णन)
तथा—
बयरु बिहाइ चरहिं एक संगा । जहँ तहँ मनहुँ सेन चतुरंगा ॥
(चित्रकूट-वर्णन)