पातञ्जल योगदर्शन (भाष्य सहित)
Patanjali Yoga Darshan
महर्षि पतञ्जलि / हरिकृष्णदास गोयन्दका द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२६ पातञ्जलयोगदर्शन
( ३ ) अङ्गमेजयत्व—शरीरके अङ्गोंमें कम्प होना 'अङ्गमेजयत्व' है।
( ४ ) श्वास—विना इच्छाके बाहरकी वायुका भीतर प्रवेश कर जाना अर्थात् बाहरी कुम्भकमें विघ्न हो जाना 'श्वास' है।
( ५ ) प्रश्वास—बिना इच्छाके ही भीतरकी वायुका बाहर निकल जाना अर्थात् भीतरी कुम्भकमें विघ्न हो जाना 'प्रश्वास' है।
ये पाँचों विक्षिप्त चित्तमें ही होते हैं, समाहित चित्तमें नहीं; इसलिये इनको 'विक्षेपसहभू' कहते हैं ॥३१॥
सम्बन्ध—उक्त विघ्नोंको दूर करनेका उपाय बतलाते हैं—
तत्प्रतिषेधार्थमेकतत्त्वाभ्यासः ॥३२॥
'उनको दूर करनेके लिये एक तत्त्वका अभ्यास ( करना चाहिये )। '
व्याख्या—उपर्युक्त दोनों प्रकारके विघ्नोंका नाश ईश्वर-प्रणिधानसे तो होता ही है, उसके सिवा यह दूसरा उपाय बतलाया गया है। भाव यह कि किसी एक वस्तुमें चित्तको स्थित करनेका बार-बार प्रयत्न करनेसे भी एकाग्रता उत्पन्न होकर विघ्नोंका नाश हो जाता है; अतः यह साधन भी किया जा सकता है ॥३२॥
सम्बन्ध—चित्तके अंदर राग-द्वेषादि मल रहनेके कारण मलिन चित्त स्थिर नहीं होता; अतः चित्तको निर्मल बनानेका सुगम उपाय बतलाते हैं—