पातञ्जल योगदर्शन (भाष्य सहित)
Patanjali Yoga Darshan
महर्षि पतञ्जलि / हरिकृष्णदास गोयन्दका द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसमाधिपाद-१ २५
( ९ ) योगसाधनसे किसी भूमिमें चित्तकी स्थिति होनेपर भी उसका न ठहरना 'अनवस्थितत्व' है ।
इन नौ प्रकारके चित्त-विक्षेपोंको ही अन्तराय, विघ्न, योगके प्रतिपक्षी आदि नामोंसे कहा जाता है ॥३०॥
सम्बन्ध—इनके साथ-साथ होनेवाले दूसरे विघ्नोंका वर्णन करते हैं—
दुःखदौर्मनस्याङ्गमेजयत्वश्वासप्रश्वासा विक्षेप-सहभुवः ॥३१॥
'दुःख, दौर्मनस्य, अङ्गमेजयत्व, श्वास और प्रश्वास—ये पाँच विघ्न विक्षेपोंके साथ-साथ होनेवाले हैं।'
व्याख्या—( १ ) दुःख—आध्यात्मिक, आधिभौतिक और आधिदैविक—इस तरह दुःखके प्रधानतया तीन भेद माने गये हैं। काम-क्रोधादिके कारण, व्याधि आदिके कारण या इन्द्रियोंमें किसी प्रकारकी विकलता होनेके कारण जो मन, इन्द्रिय या शरीरमें ताप या पीड़ा होती है, उसको 'आध्यात्मिक दुःख' कहते हैं। मनुष्य, पशु, पक्षी, सिंह, व्याघ्र, मच्छर और अन्यान्य जीवोंके कारण होनेवाली पीड़ाका नाम 'आधिभौतिक दुःख' है। तथा सर्दी, गर्मी, वर्षा, भूकम्प आदि दैवी घटनासे होनेवाली पीड़ाका नाम 'आधिदैविक दुःख' है।
( २ ) दौर्मनस्य—इच्छाकी पूर्ति न होनेपर जो मनमें क्षोभ होता है, उसे 'दौर्मनस्य' कहते हैं।