पातञ्जल योगदर्शन (भाष्य सहित)
Patanjali Yoga Darshan
महर्षि पतञ्जलि / हरिकृष्णदास गोयन्दका द्वारा
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उत्पन्न करके उसको साधनसे विचलित करनेवाले ये नौ योगमार्गके विघ्न माने गये हैं।
( १ ) शरीर, इन्द्रियसमुदाय और चित्तमें किसी प्रकारका रोग उत्पन्न हो जाना 'व्याधि' है।
( २ ) अकर्मण्यता अर्थात् साधनोंमें प्रवृत्ति न होनेका स्वभाव 'स्त्यान' है।
( ३ ) अपनी शक्तिमें या योगके फलमें सन्देह हो जानेका नाम 'संशय' है।
( ४ ) योगसाधनोंके अनुष्ठानकी अवहेलना ( बेपरवाही ) करते रहना 'प्रमाद' है।
( ५ ) तमोगुणकी अधिकतासे चित्त और शरीरमें भारीपन हो जाना और उसके कारण साधनमें प्रवृत्तिका न होना 'आलस्य' है।
( ६ ) विषयोंके साथ इन्द्रियोंका संयोग होनेसे उनमें आसक्ति हो जानेके कारण जो चित्तमें वैराग्यका अभाव हो जाता है, उसे 'अविरति' कहते हैं।
( ७ ) योगके साधनोंको किसी कारणसे विपरीत समझना अर्थात् यह साधन ठीक नहीं है, ऐसा मिथ्या ज्ञान हो जाना 'भ्रान्तिदर्शन' है।
( ८ ) साधन करनेपर भी योगकी भूमिकाओंका अर्थात् साधनकी स्थितिका प्राप्त न होना—यह 'अलब्धभूमिकत्व' है; इससे साधकका उत्साह कम हो जाता है।